वैज्ञानिक-भगवान श्री कृष्ण संवाद                            डॉ. आशुतोष उपाध्यायप्रमुख, भूमि एवं जल प्रबंधन प्रभागभारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना – 800014

वैज्ञानिक-भगवान श्री कृष्ण संवाद डॉ. आशुतोष उपाध्यायप्रमुख, भूमि एवं जल प्रबंधन प्रभागभारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना – 800014

(1)
वैज्ञानिक:
जगत का नियम है परिवर्तन, यही प्रयोगों का सार। 
तारे बुझते, पर्वत घिसते, पल-पल बदल रहा संसार।
भगवान श्री कृष्ण:
जिसे तुम सत्य कह रहे हो, गीता भी तो वही कहती। 
क्षण-क्षण बदलती सृष्टि में, स्थिर केवल आत्मा रहती।

(2)
वैज्ञानिक:
जब एंट्रॉपी बढ़ती जाती है, ऊर्जा बिखराती राह। 
कुछ भी शाश्वत नहीं यहाँ, यही प्रकृति की चाह।
भगवान श्री कृष्ण:
जो आया है वह जायेगा, यही सृष्टि का विधान है। 
परिवर्तन के बीच अडिग, बस आत्मतत्त्व महान है।

(3)
वैज्ञानिक:
मनोविज्ञान भी कहता है, आसक्ति दुःख का मूल। 
अपेक्षा और यथार्थ में जितना अंतर, उतनी शूल।
भगवान श्री कृष्ण:
राग-द्वेष से मुक्त मन ही, जीवन का उत्सव है। 
जिसने मोह त्याग दिया, वही सच्चा मानव है।
(4)
वैज्ञानिक:
एक बात समझ न आई मुझको, गीता क्यों यह कहती?
"कर्म करो, नहीं फल की चिंता", यह कैसी रीति रहती?
विज्ञान तो कारण-प्रभाव के, अटल नियम पर टिका हुआ है।  
फल से विरक्ति का संदेश आपने, क्यों गीता में दिया हुआ है?
(5)
भगवान श्री कृष्ण:
मैंने कारण नहीं नकारा, न कर्म का विज्ञान। 
मैंने केवल तोड़ा है, स्वामित्व का अभिमान।
फल के ऊपर अधिकार नहीं, यह है जीवन का सत्य। 
कर्म करना तुम्हारा धर्म है, व फल प्रकृति का कृत्य।
(6)
वैज्ञानिक:
क्या दोनों में अंतर इतना? स्पष्ट करो यह बात।
भगवान श्री कृष्ण:
किसान बीज तो बो सकता है, वर्षा नहीं है उसके हाथ।
वैज्ञानिक प्रयोग तो कर सकता है, ब्रह्मांड नहीं है साथ।
जहाज पर नियंत्रण कप्तान का, पर समुद्र तो स्वतंत्र है।
नियंत्रण पर स्वामित्व का भ्रम, कभी न रखो निज माथ।
(7)
वैज्ञानिक:
तो क्या प्रयास सफलता की गारंटी कभी नहीं?

भगवान श्री कृष्ण:
प्रयास मात्र संभावना होती है, निश्चितता कभी नहीं होती।
कर्म व परिस्थितियों का संगम, सफलता का प्रसंग संजोती।
(8)
वैज्ञानिक:
तो वास्तव में अपना क्या है, यदि फल अपने बस में नहीं?
भगवान श्री कृष्ण:
संकल्प, पुरुषार्थ, नीयत, साहस, कब किससे यहाँ छिने हैं?
अनिश्चितता के इस अंधकार में, ये दीपक बन सदा जले हैं। 
(9)
वैज्ञानिक:
तो गीता विजय का सूत्र नहीं सिखाती?
भगवान श्री कृष्ण:
गीता व्यक्ति को सदा विजयी होने का, सूत्र नहीं सिखलाती।
विजय मिले या मिले हार, यह तो समय की गति बतलाती।
गीता हमको यह सिखलाती है, कि हार के बाद भी मत टूटो। 
हर बार उठो आत्मबल के सहारे, फिर से जुड़ों फिर से छूटो।
(10)
वैज्ञानिक:
विज्ञान कहे ‘तुम नियम समझो, कारण का सम्मान करो’। 
गीता कहे ‘ तुम कर्म करो, परिणाम पर अभिमान न धरो।
जब विज्ञान और अध्यात्म दोनों, एक ही पथ पर चलते हैं। 
तब कर्म बनता है साधना, और मानव सच में आगे बढ़ते हैं।
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