कृषि परामर्श: झारखंड में एल नीनो के प्रभाव को कम करने हेतु उपाय

कृषि परामर्श: झारखंड में एल नीनो के प्रभाव को कम करने हेतु उपाय

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), रांची केंद्र के पूर्वानुमान के अनुसार जुलाई माह के दौरान झारखंड के अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा तथा सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है। इससे खरीफ मौसम की शुरुआत में सूखे का खतरा बढ़ सकता है। इस परिस्थिति में किसानों को निम्नलिखित उपाय अपनाने की सलाह दी जाती है:
1. फसल प्रबंधन एवं विविधीकरण
• कम अवधि वाली एवं सूखा सहनशील धान की किस्मों जैसे – स्वर्ण श्रेया, स्वर्ण उन्नत, सहभागी, लालट, IR-64, नवीन, बिरसा धान-108 का चयन करें।
• ऊपरी भूमि या जल की कमी वाले क्षेत्रों में वैकल्पिक फसलों का चयन करें: सीधी बुवाई वाली धान (Direct Seeded Rice) के साथ अरहर, मक्का एवं मूंगफली को वैकल्पिक फसलों के रूप में अपनाएँ।
• अरहर: बहार, बिरसा अरहर-1, UPAS-120, BR-65, नरेंद्र अरहर-1, IPA-203 (इन्हें खेत की मेड़ों पर भी उगाया जा सकता है)
• मक्का: बिरसा मक्का-1, बिरसा विकास मक्का-1 एवं 2
• रागी (मड़ुआ): बिरसा मड़ुआ-1, बिरसा मड़ुआ-2 बिरसा मड़ुआ-3
• अन्य विकल्प: सोयाबीन, मूंगफली, उड़द, तिल एवं मोटे अनाज (मिलेट्स)
• अंतरवर्तीय खेती अपनाएँ: मक्का + अरहर (2:1), मक्का + लोबिया (1:1), मक्का + उड़द (1:2), अरहर + उड़द (1:2), अरहर + मूंगफली
• पर्याप्त वर्षा या सिंचाई उपलब्ध होने पर सीधी बुवाई वाली धान अपनाएँ तथा बीज दर में 15–20% वृद्धि करें।
• समय एवं पानी की बचत हेतु मैट-टाइप (चटाई विधि) या डेपोग नर्सरी तैयार करें।
• विलंबित रोपाई की स्थिति में सामुदायिक नर्सरी स्थापित करें।
• बेहतर अंकुरण हेतु बीज प्राइमिंग (बीजों को रातभर पानी में भिगोना) करें।
• बुवाई से पूर्व बीजों का उपचार करें:
 बाविस्टिन @ 2 ग्राम/किग्रा बीज, 
 जैव उर्वरक (PSB) का उपयोग करें
2. जल प्रबंधन
• खेत की मेड़ों का निर्माण एवं मरम्मत तुरंत करें ताकि जल का रिसाव रोका जा सके।
• वर्षा जल संचयन एवं संरक्षण हेतु मेड़ों की ऊँचाई बढ़ाएँ।
• मल्चिंग एवं अंतःसस्य (interculture) क्रियाओं द्वारा खेत में नमी संरक्षण (In-situ moisture conservation) करें।
3. पोषक तत्व प्रबंधन
• नाइट्रोजन उर्वरक को एक साथ देने के बजाय 3–4 भागों में (स्प्लिट डोज) दें।
• पोषक तत्वों की हानि कम करने हेतु नीम-लेपित यूरिया का प्रयोग करें।
• सूखी मिट्टी में कभी भी यूरिया का प्रयोग न करें।
• वर्षा या सिंचाई के तुरंत बाद अनुशंसित मात्रा का लगभग 75% उर्वरक दें।
4. खरपतवार प्रबंधन
• बुवाई/रोपाई के तुरंत बाद /अंकुरण-पूर्व खरपतवारनाशी का प्रयोग करें:
 पेंडीमेथालिन @ 1.25 किग्रा सक्रिय तत्व/हेक्टेयर
 प्रेटिलाक्लोर @ 0.75 किग्रा सक्रिय तत्व/हेक्टेयर
• अंकुरण के बाद (15–20 दिन बाद) खरपतवार नियंत्रण हेतु:
• बिस्पायरीबैक-सोडियम @ 75 ग्राम सक्रिय तत्व/हेक्टेयर
• जहाँ संभव हो, यांत्रिक निराई के लिए कोनो-वीडर का उपयोग करें।
• खरपतवार नियंत्रण एवं नमी संरक्षण हेतु फसल अवशेषों द्वारा मल्चिंग (पलवार) करें।

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