पेट्रोल की बढ़ोतरी तीन रुपये - सत्ता, विपक्ष और वैश्विक मंच का नया चक्रव्यूह

पेट्रोल की बढ़ोतरी तीन रुपये - सत्ता, विपक्ष और वैश्विक मंच का नया चक्रव्यूह

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 16 मई ::

भारतीय राजनीति में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिनका आर्थिक प्रभाव जितना होता है, राजनीतिक प्रभाव उससे कहीं अधिक दिखाई देता है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में तीन रुपये की बढ़ोतरी भी कुछ ऐसा ही विषय बन चुकी है। आम आदमी के लिए यह बढ़ोतरी घर के बजट में एक और बोझ हो सकती है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए यह मुद्दा अवसरों और रणनीतियों का नया दरवाजा खोल देता है। राजनीति में महंगाई केवल अर्थशास्त्र का विषय नहीं होती है, यह जनभावनाओं, विपक्षी हमलों और सत्ता की रणनीतिक क्षमता की परीक्षा भी होती है।

चार वर्षों के बाद पेट्रोलियम कीमतों में वृद्धि हुई तो इसका असर सिर्फ बाजारों तक सीमित नहीं रहा। संसद के गलियारों, टीवी स्टूडियो, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और राजनीतिक मंचों पर इसकी गूंज सुनाई देने लगी। विपक्ष को ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसके हाथ एक ऐसा हथियार लग गया हो जिसका उपयोग वह आने वाले समय में लगातार करता रहेगा। दूसरी ओर सत्ता पक्ष ने भी अपनी रणनीतिक शैली के अनुरूप इस विषय को संभालने का प्रयास किया।

लोकतंत्र में विपक्ष का कार्य केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है बल्कि जनता की समस्याओं को मुखर करना भी होता है। किंतु लंबे समय से विपक्ष जिस बड़े मुद्दे की तलाश में था, पेट्रोलियम मूल्य वृद्धि ने उसे कुछ हद तक वह अवसर दे दिया।

विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि सरकार महंगाई को नियंत्रित करने में सफल नहीं रही। हालांकि सरकार वैश्विक परिस्थितियों, युद्ध, आपूर्ति संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव को इसका कारण बताती रही है। लेकिन जनता की नजर अक्सर इन वैश्विक कारणों से ज्यादा अपने दैनिक खर्चों पर रहती है।

पेट्रोल और डीजल की कीमतों में थोड़ी सी वृद्धि भी सिर्फ वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहती। इसका प्रभाव परिवहन लागत, खाद्य पदार्थों की कीमतों और रोजमर्रा के उपभोग पर पड़ता है। इसलिए विपक्ष को यह अवसर मिला कि वह इस वृद्धि को सीधे जनता के आर्थिक संकट से जोड़ सके। 

यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में कहा जाने लगा कि तीन रुपये की वृद्धि से यदि जनता पर कुछ प्रभाव पड़ा हो या नहीं, विपक्ष के राजनीतिक भाग्य के द्वार अवश्य खुल गए।

भारतीय राजनीति में यदि रणनीति और चुनावी गणित की बात होती है तो वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में भारतीय जनता पार्टी को सबसे कुशल संगठनों में गिना जाता है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा केवल चुनाव नहीं लड़ती बल्कि एक व्यापक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक रणनीति तैयार करती है। इसी कारण पार्टी ने शून्य से शुरुआत कर आज राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत स्थिति बनाई।

ऐसे संवेदनशील आर्थिक निर्णयों में भी समय, परिस्थितियां और राजनीतिक प्रभाव का आकलन किया जाता है। पेट्रोलियम कीमतों में बढ़ोतरी जैसा निर्णय अचानक नहीं होता है। इसके पीछे आर्थिक दबाव, कर व्यवस्था, राजस्व जरूरत और अंतरराष्ट्रीय बाजार जैसे कई तत्व काम करते हैं। इसी कारण से आलोचक व्यंग्य करते हैं कि तीन रुपये बढ़ाने के लिए भी एक राजनीतिक चक्रव्यूह रचा गया होगा।

राजनीति में समय का चयन भी एक कला होती है। जब घरेलू स्तर पर राजनीतिक हमले बढ़ने लगे तो प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा को लेकर भी विपक्ष सक्रिय हो गया। पांच देशों की छह दिवसीय यात्रा को विपक्ष ने प्रश्नों के दायरे में रखने का प्रयास किया। सवाल उठे कि देश के भीतर महंगाई पर चर्चा हो रही है और इसी समय विदेश यात्रा क्यों?

सत्ता पक्ष की अपनी दलील होती है। विदेश यात्राएं केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं होती हैं बल्कि निवेश, कूटनीतिक साझेदारी, सुरक्षा सहयोग और वैश्विक संबंधों से जुड़ी होती हैं। लेकिन राजनीति में प्रतीक और संदेश भी महत्वपूर्ण होते हैं। जनता का एक वर्ग हमेशा यह देखता है कि कठिन परिस्थितियों में नेतृत्व देश के भीतर अधिक सक्रिय दिख रहा है या वैश्विक मंचों पर। यहीं से बहस शुरू होती है और विपक्ष को नए राजनीतिक सवाल मिल जाते हैं।

भारतीय राजनीति अब केवल नीतियों की लड़ाई नहीं रही। यह शब्दों, व्यंग्यों और प्रतीकों का युद्ध भी बन चुकी है। "शहजादे" जैसे शब्द केवल संबोधन नहीं है बल्कि राजनीतिक संदेश बन चुके हैं। पिछले वर्षों में भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत टिप्पणियां, व्यंग्यात्मक उपनाम और कटाक्ष चुनावी अभियानों का हिस्सा बन गए हैं।

जैसे ही कोई नया मुद्दा सामने आता है, राजनीतिक दल अपने-अपने शब्दकोष खोल देते हैं। आरोपों का दौर शुरू होता है और जनता के सामने विचारों से अधिक संवाद शैली चर्चा में आ जाती है। यही कारण है कि किसी आर्थिक विषय पर चर्चा शुरू होकर वह धीरे-धीरे व्यक्तिगत हमलों और राजनीतिक व्यंग्य तक पहुंच जाती है।

यदि भारतीय राजनीति में संगठन निर्माण का अध्ययन किया जाए तो भाजपा का उदाहरण विशेष रूप से सामने आता है। एक समय ऐसा था जब पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में सीमित प्रभाव रखती थी। लेकिन धीरे-धीरे उसने वैचारिक आधार, कैडर नेटवर्क, चुनावी प्रबंधन और संचार तंत्र को मजबूत किया।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा की सफलता केवल नेतृत्व का परिणाम नहीं है बल्कि बूथ स्तर तक की रणनीतिक संरचना का परिणाम भी है। विपक्ष लंबे समय तक यह समझने का प्रयास करता रहा कि भाजपा किस प्रकार राजनीतिक कथानक को नियंत्रित कर लेती है। जब विपक्ष "राग मल्हार" गाता रह गया, तब भाजपा ने अपनी राजनीतिक जमीन लगातार विस्तारित की।

यदि घरेलू राजनीति से बाहर निकलकर वैश्विक मंच की ओर देखें तो वहां भी शक्ति संघर्ष का एक अलग नाटक दिखाई देता है। आज पूरी दुनिया जानती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध आदर्शवाद से कम और राष्ट्रीय हितों से अधिक संचालित होते हैं।

अमेरिका और चीन वर्तमान समय के दो सबसे प्रभावशाली वैश्विक केंद्र हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी संघर्ष, सैन्य शक्ति प्रदर्शन और कूटनीतिक तनाव लगातार बढ़ते रहे हैं। एक ओर व्यापारिक सहयोग दिखाई देता है तो दूसरी ओर रणनीतिक अविश्वास भी बना रहता है। इस स्थिति को कई लोग दोमुंही वैश्विक राजनीति कहते हैं जहां मंच पर मित्रता और बंद कमरों में प्रतिस्पर्धा चलती रहती है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दुनिया में मित्रता स्थायी नहीं होती, हित स्थायी होते हैं। जब राष्ट्र अपने आर्थिक या सामरिक हितों की रक्षा करते हैं तो कई बार उनके व्यवहार में आदर्शों से अधिक व्यावहारिकता दिखाई देती है। बीजिंग के मंच पर जो राजनीतिक गतिविधियां दिखाई देती हैं, उन्हें कुछ विश्लेषक इसी दृष्टिकोण से देखते हैं। यहां सहयोग भी है, प्रतिस्पर्धा भी और अवसरवाद भी। इसी कारण से वैश्विक राजनीति को समझना कठिन हो जाता है। जो देश कल विरोध में था वह आज साझेदार बन जाता है और जो आज सहयोगी है वह कल प्रतिस्पर्धी हो सकता है।

पुरानी कहावत है कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती है। अमेरिका और चीन के संबंधों पर यह बात कई बार लागू होती दिखाई देती है। दोनों विश्व व्यवस्था को अपने दृष्टिकोण से आकार देना चाहते हैं। एक तकनीकी नेतृत्व चाहता है तो दूसरा आर्थिक विस्तार। एक सैन्य गठबंधन मजबूत करता है तो दूसरा नए व्यापारिक नेटवर्क खड़े करता है। ऐसे में सहयोग और संघर्ष साथ-साथ चलते हैं। विश्व राजनीति में यह प्रतिस्पर्धा आगे और तीखी हो सकती है।

राजनीति चाहे घरेलू हो या वैश्विक, उसका प्रभाव आम नागरिक पर पड़ता है। पेट्रोल की कीमत बढ़ती है तो घर का बजट प्रभावित होता है। विदेश नीति बदलती है तो रोजगार और निवेश प्रभावित होते हैं। महंगाई बढ़ती है तो जीवन स्तर प्रभावित होता है। इसलिए जनता केवल राजनीतिक नारों से अधिक परिणाम देखना चाहती है।

राजनीतिक दल आएंगे, आरोप लगाएंगे, यात्राएं होगी, मंच सजेंगे, भाषण दिए जाएंगे। लेकिन अंत में नागरिक यह पूछेगा कि उसके जीवन में क्या बदलाव आया। शायद यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है कि अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है और राजनीति के इस विशाल रंगमंच में बाकी सब बदलता रहता है, लेकिन जनता का प्रश्न हमेशा वही रहता है कि आखिर लाभ किसका हुआ और बोझ किसने उठाया?
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