भारत का विपक्ष लगता है अपने सबसे कमजोर दौर में है?

भारत का विपक्ष लगता है अपने सबसे कमजोर दौर में है?

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 15 मई ::
 
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता है, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन से संचालित होता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मजबूत सरकार जितनी आवश्यक होती है, उतना ही आवश्यक एक सशक्त, जिम्मेदार और वैचारिक विपक्ष भी होता है। लेकिन हालिया पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत का विपक्ष अपने इतिहास के सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है? यह प्रश्न केवल सीटों और हार-जीत का नहीं है। यह उस राजनीतिक और वैचारिक संकट का प्रश्न है जिसमें आज विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस, फंसे हुए दिखाई देते हैं। भाजपा लगातार अपनी संगठनात्मक शक्ति, नेतृत्व, चुनावी रणनीति और राष्ट्रवादी विमर्श के आधार पर मजबूत होती जा रही है, जबकि विपक्ष बिखराव, नेतृत्व संकट, क्षेत्रीय अहंकार और वैचारिक अस्पष्टता से जूझ रहा है। आज स्थिति यह है कि जहाँ भाजपा अधिकांश राज्यों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर चुकी है, वहीं विपक्षी गठबंधन अब भी आपसी अविश्वास और अंतर्विरोधों में उलझा हुआ है। यही कारण है कि कई राज्यों में सरकार गठन तक प्रभावित हो रहा है और विपक्ष की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं।

लोकतंत्र केवल “बहुमत की सरकार” नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है विचारों की विविधता, सत्ता की जवाबदेही और जनता के हितों की रक्षा। यदि किसी देश में विपक्ष कमजोर हो जाए तो धीरे-धीरे सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ने लगता है। एक मजबूत विपक्ष कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाता है। सरकार की नीतियों की समीक्षा करना। संसद और विधानसभाओं में जनता की आवाज उठाना। वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करना। सरकार को निरंकुश बनने से रोकना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा करना। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विपक्ष की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहाँ भाषा, संस्कृति, धर्म, जाति और क्षेत्रीय विविधताएँ अत्यंत व्यापक हैं। यदि विपक्ष कमजोर होता है तो लोकतंत्र धीरे-धीरे “एकदलीय प्रभुत्व” की ओर बढ़ सकता है।

भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान राजनीतिक वर्चस्व अचानक नहीं बना है। इसके पीछे दशकों की संगठनात्मक मेहनत, वैचारिक प्रशिक्षण और मजबूत कैडर आधारित राजनीति रही है। भाजपा ने तीन स्तरों पर खुद को मजबूत किया है। पहला- नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा चेहरा दिया जो चुनावों में निर्णायक साबित हुआ। भाजपा ने नेतृत्व को केंद्रीकृत करते हुए उसे जनभावनाओं से जोड़ा। दूसरा- भाजपा ने राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, विकास और मजबूत भारत की राजनीति को लगातार आगे बढ़ाया। चाहे कोई सहमत हो या असहमत, लेकिन भाजपा की विचारधारा स्पष्ट दिखाई देती है। तीसरा- भाजपा का बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क है। कार्यकर्ताओं का विशाल आधार और चुनावी प्रबंधन की दक्षता उसे अन्य दलों से अलग बनाती है। इसके विपरीत विपक्षी दलों में इन तीनों स्तरों पर कमजोरी स्पष्ट दिखती है।

यदि भारतीय विपक्ष की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण किया जाए तो सबसे बड़ा प्रश्न कांग्रेस की भूमिका पर उठता है। क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को चुनौती देने की क्षमता यदि किसी दल में ऐतिहासिक रूप से रही है, तो वह कांग्रेस ही है। लेकिन आज कांग्रेस खुद अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। कांग्रेस लंबे समय से नेतृत्व को लेकर असमंजस में दिखाई देती है। पार्टी में निर्णय प्रक्रिया अक्सर अस्पष्ट रहती है। कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं या निष्क्रिय हो चुके हैं। राहुल गांधी ने कई मुद्दों पर आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाई है, लेकिन अभी भी पार्टी उन्हें लेकर पूर्णतः एकमत नहीं दिखती। दूसरी ओर क्षेत्रीय नेताओं को पर्याप्त स्वतंत्रता और सम्मान नहीं मिलने की शिकायत भी लगातार सामने आती रही है।

एक समय कांग्रेस का संगठन गाँव-गाँव तक फैला हुआ था। लेकिन अब कई राज्यों में पार्टी का कैडर लगभग समाप्त हो चुका है। उत्तर प्रदेश में पार्टी हाशिये पर है। बिहार में क्षेत्रीय दलों पर निर्भर है। बंगाल में लगभग समाप्तप्राय है। दिल्ली में अस्तित्व संकट में है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में प्रभाव सीमित हो चुका है। कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह कई राज्यों में “मुख्य विपक्ष” की भूमिका भी खो चुकी है।

1990 के दशक के बाद भारतीय राजनीति गठबंधन युग में प्रवेश कर गई। क्षेत्रीय दल मजबूत हुए और कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रभुत्व कमजोर होने लगा। आज स्थिति यह है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में द्रमुक, बिहार में राजद-जदयू, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, तेलंगाना में क्षेत्रीय दल और ओडिशा में बीजद जैसे दल अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस से कहीं अधिक प्रभावशाली हैं। यही कारण है कि विपक्षी एकता की बात होते ही सबसे बड़ा प्रश्न नेतृत्व का खड़ा हो जाता है।

भाजपा के खिलाफ लगभग सभी विपक्षी दल चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर पा रहे। उदाहरण के लिए बंगाल में कांग्रेस और वाम दल, तृणमूल के खिलाफ लड़ते हैं। पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी प्रतिद्वंद्वी हैं। केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल आमने-सामने हैं। उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का तालमेल अस्थायी दिखता है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर “एकजुट विपक्ष” का दावा जमीन पर कमजोर पड़ जाता है।

जहाँ विपक्षी दल भाजपा के खिलाफ एकता की बात करते हैं, वहीं कई राज्यों में उनके भीतर का संघर्ष सामने आ जाता है। केरल इसका बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, नेतृत्व विवाद और संगठनात्मक मतभेद कई बार सरकार गठन और रणनीति दोनों को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि जनता के बीच यह संदेश जाता है कि विपक्ष खुद स्थिर नहीं है।

यह प्रश्न अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है। भाजपा लगातार चुनाव जीत रही है और विपक्ष कमजोर हो रहा है। ऐसे में कुछ राजनीतिक विश्लेषक आशंका जताते हैं कि भारत धीरे-धीरे “एक प्रमुख दल” की राजनीति की ओर बढ़ सकता है। हालांकि भारत का सामाजिक और राजनीतिक ढांचा इतना विविध है कि पूरी तरह एकदलीय व्यवस्था की संभावना कम दिखाई देती है। लेकिन यदि विपक्ष लगातार कमजोर होता गया तो सत्ता संतुलन अवश्य प्रभावित होगा।

भारतीय राजनीति में कांग्रेस भी कभी ऐसी ही स्थिति में थी। स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक कांग्रेस का लगभग एकछत्र राज रहा। विपक्ष कमजोर था और कांग्रेस ही राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र थी। लेकिन समय के साथ जनता ने विकल्प तलाशा। 1977 में पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। उसके बाद गठबंधन राजनीति का दौर आया। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है, जनता अंततः संतुलन स्थापित कर देती है। आज वही स्थिति भाजपा के संदर्भ में चर्चा का विषय बन रही है।

विपक्ष के पास ऐसा सर्वमान्य चेहरा नहीं है जो पूरे देश में भाजपा को सीधी चुनौती दे सके। विपक्ष कई बार केवल “भाजपा विरोध” तक सीमित दिखाई देता है। लेकिन जनता केवल विरोध नहीं, बल्कि स्पष्ट विकल्प चाहती है। भाजपा के मुकाबले अधिकांश विपक्षी दल बूथ स्तर पर कमजोर हैं। चुनावी राजनीति अत्यंत संसाधन आधारित हो चुकी है। विपक्ष इस मामले में पीछे दिखाई देता है। भाजपा ने डिजिटल राजनीति में बढ़त बनाई है। विपक्ष अब भी एक प्रभावी वैकल्पिक नैरेटिव स्थापित करने में संघर्ष कर रहा है।

वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखा जाए तो विपक्ष के लिए सबसे बड़ा हथियार “एकता” ही दिखाई देता है। लेकिन यह केवल सीट शेयरिंग तक सीमित नहीं होना चाहिए। विपक्ष को तीन स्तरों पर एकजुट होना होगा। पहला- उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि वे भारत के लिए किस प्रकार का राजनीतिक और आर्थिक मॉडल प्रस्तुत करना चाहते हैं। दूसरा- राज्यों में तालमेल और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय आवश्यक होगा। तीसरा- व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर साझा रणनीति बनानी होगी।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस को कमजोर मानते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला करने के लिए अब भी कांग्रेस की आवश्यकता महसूस की जाती है। कारण स्पष्ट हैं कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेटवर्क अब भी मौजूद है। पार्टी का ऐतिहासिक आधार है। कई राज्यों में उसका वोट प्रतिशत निर्णायक है। अल्पसंख्यक, उदारवादी और पारंपरिक वोटरों का एक वर्ग आज भी कांग्रेस के साथ है। लेकिन कांग्रेस को अपनी भूमिका पुनर्परिभाषित करनी होगी।

युवा नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं को मजबूत करना होगा। “बड़ी पार्टी” वाली मानसिकता छोड़नी होगी। राष्ट्रवाद, विकास, सामाजिक न्याय और आर्थिक नीति पर स्पष्ट दृष्टिकोण देना होगा। पार्टी के भीतर संवाद और निर्णय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना होगा। यदि विपक्ष लगातार कमजोर होता गया तो इसका प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। संसद में बहस कमजोर होगी, नीतियों की समीक्षा कम होगी, संस्थाओं पर संतुलन घटेगा और राजनीतिक विविधता प्रभावित होगी। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों का मजबूत होना आवश्यक है।

भारतीय मतदाता अब पहले की तुलना में अधिक जागरूक और निर्णायक हो चुका है। जनता केवल जाति और धर्म के आधार पर वोट नहीं देती है, बल्कि नेतृत्व, स्थिरता, विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी महत्व देती है। भाजपा ने इन मुद्दों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। विपक्ष को यदि जनता का विश्वास वापस जीतना है तो उसे केवल आलोचना नहीं, बल्कि विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना होगा। आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति तीन संभावित दिशाओं में जा सकती है। पहला- यदि विपक्ष कमजोर रहा तो भाजपा और अधिक राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है। दूसरा- राज्य आधारित दल मिलकर भाजपा को चुनौती दे सकते हैं। तीसरा- यदि कांग्रेस संगठनात्मक सुधार करती है तो वह फिर से राष्ट्रीय राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभा सकती है।

भारत का लोकतंत्र केवल किसी एक दल की जीत या हार से तय नहीं होता है। इसकी वास्तविक शक्ति राजनीतिक संतुलन, वैचारिक विविधता और जनता की भागीदारी में निहित है। आज भाजपा मजबूत है, संगठित है और चुनावी राजनीति में बढ़त बनाए हुए है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र में स्थायी वर्चस्व कभी स्थिर नहीं रहता। इतिहास गवाह है कि जनता समय-समय पर नए विकल्प खोजती है। विपक्ष के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं है, बल्कि उसका अपना बिखराव है। यदि विपक्ष अपने अंतर्विरोधों को नियंत्रित कर ले, राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के बीच संतुलन बना ले तथा साझा न्यूनतम कार्यक्रम के साथ आगे बढ़े, तो भारतीय राजनीति में फिर से प्रतिस्पर्धात्मक संतुलन स्थापित हो सकता है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं होगा जब भारतीय राजनीति में भाजपा का वर्चस्व उसी प्रकार स्थापित हो जाएगा जैसे कभी कांग्रेस का हुआ करता था। फर्क सिर्फ इतना होगा कि तब सवाल भाजपा की ताकत का नहीं, बल्कि विपक्ष की विफलता का होगा।
            ---------------

0 Response to "भारत का विपक्ष लगता है अपने सबसे कमजोर दौर में है?"

एक टिप्पणी भेजें

Ads on article

Advertise in articles 1

advertising articles 2

Advertise under the article