बच्चों में खेल के मैदान से दूरी और जरूरत से ज्यादा साफ-सफाई ने बढ़ाई चिंता
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 03 अक्टूबर ::
बच्चों को स्वस्थ रखना हर माता-पिता की पहली प्राथमिकता होती है। बीमारी से बचाने के लिए साफ-सफाई का ध्यान रखना, समय-समय पर हाथ धुलाना, पौष्टिक भोजन देना और संक्रमण से दूर रखना सामान्य और आवश्यक सावधानियां हैं। लेकिन जब यही सावधानियां अति में बदल जाती हैं तो प्रश्न उठता है कि क्या हम बच्चों को स्वस्थ रखने के प्रयास में कहीं उनके स्वाभाविक प्रतिरोधक तंत्र के विकास में बाधा तो नहीं डाल रहे? आज यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि बच्चों की जीवनशैली तेजी से बदल रही है। कभी बच्चे सुबह घर से निकलकर गलियों, मैदानों और पार्कों में घंटों खेलते थे। मिट्टी में खेलना, पेड़ों के आसपास घूमना, साइकिल चलाना, दौड़ना और दोस्तों के साथ शारीरिक गतिविधियों में शामिल होना उनके बचपन का स्वाभाविक हिस्सा था। आज वही बचपन मोबाइल फोन, टैबलेट, टीवी और वीडियो गेम की चमकती स्क्रीन के सामने सिमटता जा रहा है। दूसरी ओर, बच्चों को हर प्रकार के सूक्ष्मजीव से बचाने की कोशिश भी कई परिवारों की दिनचर्या का हिस्सा बन गई है। स्वच्छता निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन सामान्य वातावरण से पूरी तरह दूरी बनाना भी स्वस्थ जीवन का पर्याय नहीं है। विशेषज्ञों ने इसी बदलती जीवनशैली को लेकर चिंता जताई है। कानपुर में आयोजित ईएनटी विशेषज्ञों के राष्ट्रीय सम्मेलन यूपीएओआईसीओएन में बच्चों के स्वास्थ्य और बदलती दिनचर्या पर चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने इस दिशा में ध्यान आकर्षित किया है। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में बार-बार होने वाली सर्दी-खांसी और जुकाम को केवल संक्रमण के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उनकी जीवनशैली, शारीरिक सक्रियता, नींद, भोजन और सामान्य वातावरण के संपर्क को भी समझना जरूरी है।
बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए हाथ धोना बेहद महत्वपूर्ण है। खाना खाने से पहले, शौचालय के इस्तेमाल के बाद और गंदगी या संभावित संक्रमण के संपर्क में आने के बाद हाथ धोना स्वास्थ्य की बुनियादी आदतों में शामिल है। इससे अनेक संक्रमणों का जोखिम कम किया जा सकता है। लेकिन हर कुछ मिनट में हाथ धोना, हर वस्तु को बार-बार सैनिटाइज करना और बच्चे को सामान्य वातावरण से पूरी तरह अलग रखने की कोशिश अलग विषय है। मानव शरीर का प्रतिरोधक तंत्र बाहर की दुनिया के साथ संपर्क से भी सीखता है। सामान्य वातावरण में मौजूद विभिन्न सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आने पर प्रतिरक्षा तंत्र को बाहरी तत्वों को पहचानने और उनके प्रति प्रतिक्रिया विकसित करने के अवसर मिलते हैं। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि बच्चों को जानबूझकर गंदगी या संक्रमण के संपर्क में लाया जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि सामान्य, सुरक्षित और स्वाभाविक वातावरण से अनावश्यक दूरी भी न बनाई जाए। बच्चे को स्वस्थ रखने का अर्थ यह नहीं कि उसके आसपास ऐसा कृत्रिम वातावरण बना दिया जाए जहां मिट्टी, पौधे, धूल, दूसरे बच्चे या सामान्य घरेलू वातावरण का कोई संपर्क ही न हो। स्वच्छता और अतिस्वच्छता के बीच का अंतर समझना आज पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता पर चर्चा करते समय केवल हाथ धोने की आदत पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। आज की सबसे बड़ी चुनौती शायद बच्चों की निष्क्रिय जीवनशैली भी है। एक समय था जब माता-पिता बच्चों को घर से बाहर खेलने के लिए कहते थे। आज कई माता-पिता को बच्चों को मोबाइल से दूर करके बाहर खेलने के लिए समझाना पड़ता है। कार्टून, ऑनलाइन गेम, वीडियो, सोशल मीडिया सामग्री और मनोरंजन के अनेक डिजिटल विकल्प बच्चों का ध्यान लंबे समय तक स्क्रीन पर बनाए रखते हैं। परिणाम यह होता है कि बच्चे घंटों एक ही स्थान पर बैठे रहते हैं। दौड़ना, कूदना, साइकिल चलाना, गेंद खेलना और खुले वातावरण में समय बिताना कम होता जाता है। मुंबई के वरिष्ठ ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. असीम देसाई ने भी बच्चों में बार-बार सर्दी-खांसी और जुकाम के संदर्भ में बदलती दिनचर्या तथा जीवनशैली को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया है। यहां समस्या केवल मोबाइल की मौजूदगी नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब स्क्रीन बच्चे के दिन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेती है और उसकी जगह से खेल, नींद, पढ़ाई, बातचीत तथा शारीरिक गतिविधि पीछे हटने लगती है।
बच्चों के लिए खेल का अर्थ केवल समय बिताना नहीं है। खेल उनके शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दौड़ते समय शरीर सक्रिय होता है। गेंद खेलते समय आंख और हाथ के बीच तालमेल विकसित होता है। साइकिल चलाने से संतुलन बेहतर होता है। समूह में खेलने से सहयोग, अनुशासन और सामाजिक व्यवहार सीखने का अवसर मिलता है। शारीरिक सक्रियता शरीर के सामान्य स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है और प्रतिरक्षा तंत्र के बेहतर कामकाज में भी इसकी भूमिका है। इसके विपरीत लगातार बैठे रहने वाली जीवनशैली बच्चों के समग्र स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए बच्चों के स्वास्थ्य की चर्चा केवल इस सवाल तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि उन्होंने आज कितनी बार हाथ धोए। यह भी देखना होगा कि उन्होंने आज कितनी देर दौड़ लगाई, कितना खेला, कितनी नींद ली और भोजन में क्या खाया। बचपन को केवल किताब और स्क्रीन के बीच बंद कर देना, उसके स्वाभाविक विकास को सीमित करना है।
बच्चों में सर्दी, खांसी और जुकाम होना सामान्य बात हो सकती है। बच्चों का प्रतिरोधक तंत्र विकसित होने की प्रक्रिया में होता है और वे विभिन्न सामान्य संक्रमणों के संपर्क में आते हैं। इसलिए हर बार नाक बहने, छींक आने या खांसी होने पर माता-पिता का घबरा जाना भी उचित नहीं है। हालांकि लगातार, गंभीर या असामान्य लक्षण होने पर चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है। महत्वपूर्ण यह है कि हर बीमारी को केवल दवा से दबाने की प्रवृत्ति से बचा जाए। बच्चे की पूरी दिनचर्या को देखना चाहिए। क्या वह पर्याप्त सो रहा है? क्या वह रोज खेलता है? क्या वह पौष्टिक भोजन करता है? क्या वह लगातार स्क्रीन के सामने बैठा रहता है? क्या वह सामान्य वातावरण से पूरी तरह अलग रहता है? क्या घर में हर छोटी गतिविधि के बाद हाथ धुलवाए जाते हैं? इन सवालों के जवाब बच्चों के स्वास्थ्य की तस्वीर को समझने में मदद कर सकते हैं।
बच्चे को सर्दी-खांसी हुई और तुरंत दवा देना, यह आज अनेक परिवारों की सामान्य प्रतिक्रिया बन गई है। लेकिन हर बार दवा ही समाधान हो, ऐसा जरूरी नहीं है। बच्चे के स्वास्थ्य की बुनियाद उसकी जीवनशैली में होती है। संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वच्छता और स्वस्थ सामाजिक वातावरण उसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि डॉक्टर की सलाह या आवश्यक दवा को नजरअंदाज किया जाए। इसके विपरीत, चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देते हुए अनावश्यक दवा से बचना और जीवनशैली पर ध्यान देना अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण है। यदि बच्चे को बार-बार संक्रमण हो रहा है, लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं या बीमारी गंभीर दिखाई देती है तो चिकित्सक से परामर्श करना जरूरी है।
प्रतिरोधक क्षमता की चर्चा भोजन के बिना अधूरी है। बच्चों की थाली में केवल पेट भरने वाला भोजन नहीं, बल्कि विविध और पौष्टिक आहार होना चाहिए। दालें प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं। हरी और रंगीन सब्जियां विभिन्न पोषक तत्व उपलब्ध कराती हैं। फल आहार में विविधता और आवश्यक पोषक तत्व जोड़ते हैं। दूध और दही जैसे खाद्य पदार्थ कैल्शियम तथा अन्य पोषक तत्वों के स्रोत हो सकते हैं। साबुत अनाज और मेवे भी संतुलित आहार का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। बच्चों के भोजन में विविधता जितनी अधिक होगी, उनके शरीर को विभिन्न पोषक तत्व प्राप्त करने के अवसर उतने ही बेहतर होंगे। इसके साथ ही अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों और बहुत अधिक मीठे या नमकीन स्नैक्स की आदत पर भी नियंत्रण जरूरी है। बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता किसी एक खाद्य पदार्थ से नहीं बनती, यह संतुलित जीवनशैली का परिणाम है।
स्क्रीन टाइम का एक बड़ा असर बच्चों की नींद पर पड़ सकता है। देर रात तक मोबाइल देखना, वीडियो गेम खेलना या टीवी देखते रहना सोने का समय आगे खिसका सकता है। बच्चों के लिए पर्याप्त और नियमित नींद आवश्यक है। नींद शरीर और मस्तिष्क को आराम देने के साथ-साथ विकास तथा सामान्य स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि बच्चा देर रात तक जागता है और सुबह जल्दी उठता है तो उसकी नींद की अवधि कम हो सकती है। अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और पढ़ाई या खेल में कम रुचि जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं। इसलिए घर में स्क्रीन के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट समय-सारिणी बनाना उपयोगी हो सकता है। रात में सोने से पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन से दूरी की आदत पूरे परिवार के लिए लाभकारी हो सकती है।
बच्चों की बदलती जीवनशैली को सुधारने के लिए केवल बच्चों को दोष देना आसान है, लेकिन समाधान परिवार की दिनचर्या में छिपा है। यदि माता-पिता स्वयं लगातार मोबाइल पर व्यस्त हैं तो बच्चे से स्क्रीन छोड़ने की अपेक्षा करना कठिन होगा। इसलिए बदलाव पूरे परिवार से शुरू होना चाहिए। घर में कुछ सरल नियम बनाए जा सकते हैं भोजन के समय मोबाइल नहीं। सोने से पहले स्क्रीन से दूरी। रोजाना आउटडोर खेल के लिए निश्चित समय। सप्ताह में कुछ समय परिवार के साथ पार्क, मैदान या खुले स्थान पर बिताना। बच्चों को घर के छोटे-मोटे कामों में शामिल करना। भोजन में दाल, सब्जियां, फल, दूध-दही, साबुत अनाज और मेवों जैसे पौष्टिक विकल्पों को स्थान देना। हाथ धोने की सही आदत सिखाना, लेकिन उसे अनावश्यक भय का रूप न देना। इन छोटे बदलावों का प्रभाव बच्चे की पूरी जीवनशैली पर पड़ सकता है।
बच्चे प्रकृति से बहुत कुछ सीखते हैं। पेड़-पौधे, मिट्टी, धूप, हवा, बारिश, पक्षियों की आवाज और खुले मैदान का अनुभव किसी स्क्रीन से पूरी तरह नहीं मिल सकता। खुले वातावरण में खेलना बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय करता है। प्रकृति के साथ संपर्क उन्हें अपने आसपास की दुनिया को समझने का अवसर देता है। यह जरूरी नहीं कि हर दिन बच्चे को किसी बड़े पार्क में ले जाया जाए। घर की छत, आसपास का सुरक्षित मैदान, पार्क या कॉलोनी का खेल क्षेत्र भी उपयोगी हो सकता है। जरूरत केवल इतनी है कि बच्चे को बैठी हुई जिंदगी से बाहर निकाला जाए।
आधुनिक चिकित्सा ने स्वच्छता और संक्रमण नियंत्रण का महत्व स्पष्ट किया है। साफ पानी, साफ भोजन, हाथों की स्वच्छता और संक्रमण से बचाव ने अनेक बीमारियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। स्वास्थ्य केवल संक्रमण से बचने का नाम नहीं। स्वास्थ्य का अर्थ है सक्रिय शरीर, संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद, मानसिक संतुलन, सामाजिक संपर्क और स्वस्थ जीवनशैली। इसलिए बच्चों के स्वास्थ्य की नई परिभाषा में स्वच्छता के साथ सक्रियता और सुरक्षा के साथ स्वाभाविक वातावरण दोनों को जगह देनी होगी। बच्चे को हर कीटाणु से बचाने की कोशिश करने के बजाय उसे यह सिखाना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कब हाथ धोने हैं, कैसे स्वस्थ भोजन करना है, क्यों खेलना जरूरी है और क्यों पर्याप्त नींद लेनी चाहिए।
आज का अभिभावक पहले की तुलना में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर अधिक जागरूक है। लेकिन जागरूकता यदि चिंता में बदल जाए तो वही चिंता बच्चे की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है। हर खांसी गंभीर बीमारी नहीं होती। हर मिट्टी गंदगी नहीं होती। हर सूक्ष्मजीव खतरा नहीं होता। और हर बीमारी का समाधान केवल दवा नहीं होती। इसी तरह मोबाइल और टीवी अपने आप में शत्रु नहीं हैं। समस्या उनका अनियंत्रित और अत्यधिक इस्तेमाल है। तकनीक शिक्षा और मनोरंजन का साधन हो सकती है, लेकिन वह बच्चे के खेल, नींद और वास्तविक सामाजिक जीवन का विकल्प नहीं बननी चाहिए। इसके लिए उन्हें स्वच्छता सिखानी होगी, लेकिन स्वच्छता के नाम पर डर नहीं देना होगा। उन्हें पौष्टिक भोजन देना होगा, लेकिन भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं समझना होगा। उन्हें मोबाइल देना हो तो सीमित समय के लिए, लेकिन मैदान का रास्ता बंद नहीं करना होगा। उन्हें बीमारी से बचाना होगा, लेकिन सामान्य जीवन से काटना नहीं होगा।
एक स्वस्थ बचपन वह है जिसमें बच्चा सुबह समय पर उठता है, पौष्टिक भोजन करता है, स्कूल जाता है, दोस्तों के साथ खेलता है, कुछ समय प्रकृति के बीच बिताता है, परिवार से बातचीत करता है, पर्याप्त नींद लेता है और तकनीक का इस्तेमाल आवश्यकता तथा मनोरंजन के संतुलित साधन के रूप में करता है। वह गंदगी और स्वच्छता के बीच का अंतर समझता है। उसे पता होता है कि खाना खाने से पहले हाथ धोना क्यों जरूरी है। वह शौचालय के बाद हाथ साफ करता है। लेकिन उसे मिट्टी में खेलने से डर नहीं लगता। वह बीमारी होने पर चिकित्सक की सलाह लेता है, लेकिन हर छोटी तकलीफ को लेकर भयभीत नहीं होता और सबसे महत्वपूर्ण उसका बचपन स्क्रीन की चमक में नहीं, जीवन की वास्तविक गतिविधियों में बीतता है।
बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता को लेकर उठ रही चिंताएं हमें एक व्यापक संदेश देती हैं। स्वास्थ्य केवल दवाओं और संक्रमण से बचाव का विषय नहीं है। यह जीवनशैली से भी जुड़ा हुआ है। जरूरत से ज्यादा स्वच्छता, लगातार स्क्रीन टाइम, शारीरिक गतिविधि की कमी, अनियमित नींद और असंतुलित भोजन, इन सभी को मिलाकर देखना होगा। बच्चों को संक्रमण से बचाना जरूरी है, लेकिन उन्हें सामान्य जीवन से बचाना नहीं। हाथ धोना जरूरी है, लेकिन हर पल हाथ धोना नहीं। मोबाइल उपयोगी है, लेकिन मैदान का विकल्प नहीं। पौष्टिक भोजन जरूरी है, लेकिन केवल एक 'सुपरफूड' इसका समाधान नहीं। दवा जरूरी हो सकती है, लेकिन स्वस्थ दिनचर्या उसका विकल्प नहीं, बल्कि आधार है। आज आवश्यकता ऐसी परवरिश की है जिसमें साफ-सफाई हो, लेकिन अतिस्वच्छता नहीं, तकनीक हो, लेकिन अति नहीं, सुरक्षा हो, लेकिन डर नहीं और सबसे बढ़कर बचपन में खेल, प्रकृति और शारीरिक सक्रियता के लिए पर्याप्त जगह हो। क्योंकि मजबूत प्रतिरोधक क्षमता केवल शरीर के भीतर नहीं बनती है उसकी नींव बच्चे की पूरी जीवनशैली में रखी जाती है।
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