नाबार्ड एवं बिहार सरकार के प्रयास से बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों: नालंदा का बावन बूटी, गया का पथरकट्टी एवं भोजपुर के पीढ़िया पेंटिंग, को मिला भौगोलिक संकेतक (GI) टैग
13 जून 2026, पटना (बिहार)
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) तथा बिहार सरकार के संयुक्त प्रयासों से बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक एवं हस्तशिल्प विरासत को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त हुई है। बिहार के तीन विशिष्ट पारंपरिक उत्पादों—नालंदा बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, गया पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट तथा भोजपुर पिढ़िया पेंटिंग—को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। यह उपलब्धि राज्य के शिल्पकारों, बुनकरों एवं ग्रामीण उत्पादक समुदायों के लिए गर्व का विषय है।
GI टैग किसी उत्पाद की विशिष्टता, गुणवत्ता और भौगोलिक पहचान को कानूनी संरक्षण प्रदान करता के अंतर्गत किया जाता है। GI टैग प्रदान करने का कार्य भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री, चेन्नई द्वारा किया जाता है।
बिहार के इन तीन उत्पादों के GI पंजीकरण की प्रक्रिया में Human Welfare Association (HWA), वाराणसी के महासचिव, पद्मश्री डॉ. रजनीकांत का महत्वपूर्ण मार्गदर्शन एवं तकनीकी सहयोग प्राप्त हुआ। नाबार्ड ने उत्पादक समूहों, शिल्पकार संगठनों तथा स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर इन उत्पादों के दस्तावेजीकरण, पंजीकरण और GI टैग प्राप्त करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नालंदा जिले की प्रसिद्ध बावन बूटी बिहार की प्राचीन बुनकरी परंपरा का एक अद्वितीय उदाहरण है। इस विशिष्ट वस्त्रकला में कपड़े पर 52 प्रकार के पारंपरिक बौद्ध एवं सांस्कृतिक प्रतीकों (बूटी) को हाथकरघे पर बुना जाता है। इस कला का विकास मुख्य रूप से बसवन बिगहा और आसपास के क्षेत्रों में हुआ, जहाँ पीढ़ियों से बुनकर परिवार इस परंपरा का संरक्षण करते आ रहे हैं।
इसी प्रकार, गया जिले के पत्थरकट्टी गाँव की पत्थर शिल्पकला लगभग 300 वर्षों से अपनी उत्कृष्टता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के कारीगर स्थानीय काले ग्रेनाइट पत्थरों से भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, देवी-देवताओं तथा अन्य कलात्मक प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। यह भी माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर के निर्माण में यहाँ के ग्रेनाइट पत्थरों का उपयोग किया गया था।
वहीं, भोजपुर क्षेत्र की पिढ़िया पेंटिंग बिहार की लोक चित्रकला की एक विशिष्ट शैली है, जिसे मुख्यतः महिलाएँ पारंपरिक पर्व-त्योहारों और सामाजिक अवसरों पर बनाती रही हैं। इस कला में प्राकृतिक रंगों एवं पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से लोक जीवन, पारिवारिक संबंधों, धार्मिक आस्थाओं तथा ग्रामीण संस्कृति का सजीव चित्रण किया जाता है।
इन तीनों उत्पादों को GI टैग प्राप्त होने से बिहार के हस्तशिल्प एवं हथकरघा क्षेत्र को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। इससे स्थानीय कारीगरों, बुनकरों तथा महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार एवं आय के नए अवसर सृजित होंगे। साथ ही, यह उपलब्धि ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को भी सशक्त बनाएगी। यह उपलब्धि बिहार की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण तथा राज्य के पारंपरिक उद्योगों को प्रोत्साहन देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगी।
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