वर्क फ्रॉम होम - क्या घर से काम करने की संस्कृति युवाओं को बना रही है चिड़चिड़ा और अकेला?

वर्क फ्रॉम होम - क्या घर से काम करने की संस्कृति युवाओं को बना रही है चिड़चिड़ा और अकेला?

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 16 जून ::

कोरोना महामारी ने दुनिया की कार्य संस्कृति को पूरी तरह बदल दिया। जिस "वर्क फ्रॉम होम" (घर से काम) को कभी एक विशेष सुविधा माना जाता था, वह महामारी के दौरान लाखों लोगों की मजबूरी बन गया। महामारी समाप्त होने के बाद भी अनेक कंपनियों ने इस व्यवस्था को जारी रखा क्योंकि इससे कार्यालय खर्च कम हुए और कर्मचारियों को भी आने-जाने की परेशानी से राहत मिली। लेकिन अब धीरे-धीरे इसके दूसरे पहलू भी सामने आने लगे हैं।

हाल ही में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका साइंस में प्रकाशित एक शोध ने दावा किया है कि वर्क फ्रॉम होम कर्मचारियों, विशेषकर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। इस अध्ययन के अनुसार घर से काम करने वाले लोगों में अकेलापन, तनाव, चिंता और चिड़चिड़ापन तेजी से बढ़ रहा है। यह निष्कर्ष केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत सहित दुनिया के कई देशों में इसी तरह की स्थितियां देखने को मिल रही हैं।

यह अध्ययन अमेरिका के 5.80 लाख से अधिक कर्मचारियों पर किया गया। शोध का नेतृत्व येल विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की शोधकर्ता एम्मा जांग और रूरके ओ'ब्रायन ने किया। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2011 से 2024 के बीच कर्मचारियों पर हुई पांच बड़ी स्टडीज का विश्लेषण किया। अध्ययन में उन कर्मचारियों की तुलना की गई जो पूरी तरह या आंशिक रूप से घर से काम करते हैं और उन कर्मचारियों की जो प्रतिदिन कार्यालय जाकर काम करते हैं। निष्कर्षों ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि रिमोट वर्क करने वाले लोगों में मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव की समस्या अधिक पाई गई। शोध के अनुसार महामारी के बाद अमेरिका में मानसिक परेशानी के मामलों में जो वृद्धि हुई, उसका लगभग एक-तिहाई हिस्सा वर्क फ्रॉम होम संस्कृति से जुड़ा हो सकता है।

मनुष्य मूल रूप से एक सामाजिक प्राणी है। वह दूसरों के साथ बातचीत, मेलजोल और सामाजिक संबंधों के माध्यम से मानसिक संतुलन बनाए रखता है। लेकिन जब कर्मचारी दिनभर घर के भीतर लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन तक सीमित रह जाते हैं, तो उनका सामाजिक संपर्क कम होने लगता है। शोध में पाया गया कि घर से काम करने वाले लोग हर कार्य दिवस में औसतन 1.1 घंटे अधिक अकेले बिताते हैं। इतना ही नहीं, उनके पूरे दिन घर से बाहर न निकलने की संभावना भी चार गुना अधिक होती है। कई कर्मचारियों ने स्वीकार किया कि वे लगातार कई दिनों तक किसी मित्र, सहकर्मी या पड़ोसी से प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलते। परिणामस्वरूप वे अपनी भावनाएं साझा नहीं कर पाते और धीरे-धीरे मानसिक दबाव बढ़ने लगता है।

वर्क फ्रॉम होम का प्रभाव सभी आयु वर्गों पर समान नहीं है। युवा कर्मचारियों पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक देखा गया है। इसके पीछे कई कारण हैं। युवा अपने करियर की शुरुआत में नेटवर्किंग, टीमवर्क और सामाजिक अनुभवों के माध्यम से सीखते हैं। कार्यालय का वातावरण उन्हें नए लोगों से मिलने, विचार साझा करने और पेशेवर कौशल विकसित करने का अवसर देता है। लेकिन जब पूरा काम ऑनलाइन हो जाता है, तो यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है। नए कर्मचारी अपने सहकर्मियों से भावनात्मक संबंध नहीं बना पाते। वे खुद को टीम का हिस्सा महसूस नहीं करते। इससे उनमें असुरक्षा और अकेलेपन की भावना बढ़ती है। यही कारण है कि अनेक युवा कर्मचारियों में चिड़चिड़ापन, तनाव और प्रेरणा की कमी देखने को मिल रही है।

वर्क फ्रॉम होम का एक बड़ा नुकसान अत्यधिक स्क्रीन टाइम भी है। कार्यालय में काम करने के दौरान कर्मचारी सहकर्मियों से आमने-सामने बात करते हैं, बैठकों में भाग लेते हैं और बीच-बीच में कुछ समय के लिए अपनी सीट से उठते भी हैं। इसके विपरीत घर से काम करने वाले कर्मचारियों का अधिकांश समय लैपटॉप, मोबाइल और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म पर बीतता है। लगातार स्क्रीन के सामने बैठने से आंखों पर दबाव पड़ता है, नींद प्रभावित होती है और मानसिक थकान बढ़ती है। आज "ज़ूम फटीग" या "वीडियो मीटिंग थकान" एक नई समस्या बनकर उभरी है। लगातार ऑनलाइन मीटिंग्स में शामिल होने से मस्तिष्क पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे व्यक्ति जल्दी थक जाता है और उसका मूड खराब रहने लगता है।

वर्क फ्रॉम होम का एक और बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि काम और निजी जीवन के बीच की सीमाएं मिटने लगती हैं। कार्यालय से घर लौटने के बाद व्यक्ति मानसिक रूप से काम से अलग हो जाता है। लेकिन जब घर ही कार्यालय बन जाए तो यह विभाजन समाप्त हो जाता है। कई कर्मचारी देर रात तक ईमेल देखते रहते हैं या कार्य संबंधी संदेशों का जवाब देते रहते हैं। परिणामस्वरूप उन्हें पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता। लंबे समय तक ऐसा होने पर तनाव बढ़ता है और व्यक्ति मानसिक रूप से थका हुआ महसूस करने लगता है।

यह समस्या केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। भारत में भी आईटी, सॉफ्टवेयर और बीपीओ क्षेत्रों में रिमोट वर्क व्यापक रूप से अपनाया गया है। डेलॉयट इंडिया, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निमहंस) तथा अन्य संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययनों में भी इसी तरह के निष्कर्ष सामने आए हैं। भारत में किए गए सर्वेक्षणों के अनुसार, 35 प्रतिशत कर्मचारियों ने स्वीकार किया कि वे अक्सर अकेलापन महसूस करते हैं। 47 प्रतिशत कर्मचारियों ने कहा कि उन्हें वास्तविक दुनिया से कटाव महसूस होता है। बड़ी संख्या में कर्मचारियों ने चिंता और अवसाद जैसे लक्षणों की शिकायत की। सामाजिक संपर्क की कमी को मानसिक तनाव का प्रमुख कारण बताया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय समाज पारंपरिक रूप से सामूहिक और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित है। ऐसे में सामाजिक संपर्क की कमी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर अधिक प्रभाव डाल सकती है।

हालांकि वर्क फ्रॉम होम के कई नकारात्मक पहलू सामने आए हैं, लेकिन यह कहना गलत होगा कि यह व्यवस्था पूरी तरह खराब है। कई कर्मचारियों को इससे लाभ भी मिला है। उदाहरण के लिए यात्रा में समय और धन की बचत। परिवार के साथ अधिक समय बिताने का अवसर। महिलाओं के लिए कार्य और परिवार के बीच संतुलन बनाने में सहायता। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर। कुछ अंतर्मुखी व्यक्तियों ने भी बताया कि वे घर के शांत वातावरण में अधिक उत्पादक महसूस करते हैं। इसलिए समस्या वर्क फ्रॉम होम में नहीं, बल्कि उसके असंतुलित और लंबे समय तक इस्तेमाल में है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में "हाइब्रिड वर्क मॉडल" सबसे प्रभावी विकल्प हो सकता है। इसमें कर्मचारी सप्ताह के कुछ दिन कार्यालय और कुछ दिन घर से काम करते हैं। इस मॉडल के फायदे हैं कर्मचारियों को सामाजिक संपर्क मिलता है। टीम भावना और सहयोग बना रहता है। यात्रा का बोझ कम होता है। मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है। दुनिया की कई बड़ी कंपनियां अब इसी मॉडल को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।

यदि कोई व्यक्ति घर से काम कर रहा है तो उसे अपने मानसिक स्वास्थ्य की विशेष देखभाल करनी चाहिए। इसके लिए कुछ सरल उपाय अपनाए जा सकते हैं. काम शुरू और समाप्त करने का निश्चित समय तय करें। प्रतिदिन कुछ समय टहलने या दोस्तों से मिलने के लिए निकाले। सहकर्मियों और मित्रों से नियमित बातचीत करें। काम के बीच-बीच में छोटे ब्रेक लें। शारीरिक गतिविधियां मानसिक तनाव को कम करने में मदद करती हैं। यदि तनाव या अवसाद लंबे समय तक बना रहे तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए।

वर्क फ्रॉम होम आधुनिक कार्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है और इसके कई लाभ भी हैं। लेकिन हालिया शोध यह संकेत दे रहे हैं कि यदि इसे संतुलित तरीके से न अपनाया जाए तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन सकता है। अकेलापन, सामाजिक अलगाव, बढ़ता स्क्रीन टाइम और काम-जीवन संतुलन का बिगड़ना विशेष रूप से युवाओं को प्रभावित कर रहा है।

भविष्य की कार्य संस्कृति का लक्ष्य केवल उत्पादकता बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि कर्मचारियों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की रक्षा करना भी होना चाहिए। यदि कंपनियां और कर्मचारी मिलकर संतुलित कार्य मॉडल अपनाएं, तो तकनीक और मानवीय संबंधों के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। यही स्वस्थ और टिकाऊ कार्य संस्कृति की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।
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