एआईएसएफ पटना जिला का दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर मोकामा के बाटा वर्कर्स यूनियन कार्यालय में शुरू

एआईएसएफ पटना जिला का दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर मोकामा के बाटा वर्कर्स यूनियन कार्यालय में शुरू

आज दिनांक 13 जून 2026 को एआईएसएफ पटना जिला का दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर मोकामा स्थित बाटा वर्कर्स यूनियन कार्यालय में प्रारंभ हुआ। शिविर की शुरुआत झंडोत्तोलन के साथ हुई। एआईएसएफ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष कॉमरेड रविन्द्रनाथ राय ने झंडोत्तोलन कर प्रशिक्षण शिविर का शुभारंभ किया।
इसके पश्चात प्रशिक्षण शिविर का उद्घाटन मगध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति (वी.सी.) प्रो. कार्यानंद पासवान ने किया। उपस्थित छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आज देश में शिक्षा पर सबसे अधिक हमले हो रहे हैं। ऐसे समय में सभी छात्रों को एआईएसएफ से जुड़कर शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई को मजबूत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पढ़े-लिखे छात्र-युवाओं को राजनीति की समझ विकसित करते हुए समाज और देश के सवालों पर आगे आना होगा। आज शिक्षा को खरीदने-बेचने की वस्तु बनाया जा रहा है, जिसके खिलाफ समान और वैज्ञानिक शिक्षा व्यवस्था के लिए संघर्ष करने वाला एआईएसएफ एक महत्वपूर्ण छात्र संगठन है।
इसी सत्र में एआईएसएफ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष कॉमरेड रविन्द्रनाथ राय ने मार्क्सवाद विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि जहां असमानता है, वहां मार्क्सवाद की प्रासंगिकता बनी रहती है। आज के दौर में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है, इसलिए मार्क्सवाद की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि पूंजीवादी व्यवस्था और उसके बुद्धिजीवी लगातार जनता की तार्किक सोच पर हमला कर रहे हैं। नई सूचना क्रांति और आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग जनता को शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों से भटकाकर सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता और जातीयता की ओर मोड़ने के लिए किया जा रहा है। मार्क्सवाद ऐसा वैचारिक हथियार है, जिसके माध्यम से जनता अपनी वास्तविक समस्याओं और संघर्षों को समझकर आगे बढ़ सकती है।
इसी सत्र में जेएनयू की पूर्व छात्रा डॉ. राहीला प्रवीण ने सांप्रदायिकता विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान में सांप्रदायिकता को समझने के लिए इसकी ऐतिहासिक जड़ों को जानना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की व्याख्या की, तब उन्होंने इसे सांप्रदायिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। प्राचीन काल को "हिंदू काल", मध्यकाल को "मुस्लिम काल" और आधुनिक काल को "ब्रिटिश काल" के रूप में परिभाषित किया गया, जो उनकी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि आज जब देश में सांप्रदायिकता का उभार दिखाई दे रहा है, तब यह समझना जरूरी है कि कौन-सी ताकतें समाज को विभाजित कर सत्ता हासिल कर रही हैं। इसके खिलाफ संघर्ष के लिए छात्रों और युवाओं को अपनी लोकतांत्रिक एवं वैज्ञानिक चेतना को मजबूत करना होगा।
इसी प्रशिक्षण शिविर में छात्रों को संबोधित करते हुए तारेंद्र किशोर ने वैज्ञानिक सोच और अंधविश्वास विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि समाज के विकास के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। अंधविश्वास और रूढ़िवादी सोच समाज को पीछे धकेलती है, जबकि वैज्ञानिक सोच लोगों को तर्क, विवेक और सत्य के आधार पर निर्णय लेने की प्रेरणा देती है। उन्होंने छात्रों से वैज्ञानिक चेतना को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया।
प्रशिक्षण शिविर में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। शिविर का उद्देश्य छात्रों के बीच वैचारिक, राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों पर समझ विकसित करना तथा उन्हें लोकतांत्रिक संघर्षों के लिए तैयार करना है।

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