आपदा के दौरान बच्चों और महिलाओं से जुड़े मुद्दों की संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए यूनिसेफ और बिहार सरकार ने मीडिया पेशेवरों को किया जागरूक
12 जून 2026
पटना
बाढ़, सूखा, लू के प्रकोप जैसी जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाएं अब पहले की तुलना में अधिक बार और अधिक गंभीर रूप में सामने आ रही हैं। इन आपदाओं का सबसे अधिक असर बच्चों और महिलाओं पर पड़ता है। ऐसे में इन संकटों की संवेदनशील और जिम्मेदार रिपोर्टिंग बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि मीडिया की रिपोर्टिंग न केवल लोगों को जागरूक करती है, बल्कि कमजोर वर्गों की सुरक्षा और अधिकारों को भी प्रभावित कर सकती है। आपदा के दौरान बच्चों और महिलाओं से जुड़े मुद्दों की संवेदनशील रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यूनिसेफ और बिहार सरकार ने एक मीडिया संवेदीकरण कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (आईपीआरडी) के अधिकारियों तथा विभिन्न सरकारी विभागों के जनसंपर्क पदाधिकारियों ने भाग लिया। आपदा के समय आम लोगों तक सही और भरोसेमंद जानकारी पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सभी प्रमुख हितधारकों को इस मंच पर एक साथ लाया गया।
बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के संयुक्त सचिव श्री मोहम्मद नदीमुल गफ्फार सिद्दीकी ने राज्य की आपदा तैयारियों की जानकारी देते हुए कहा कि बाढ़, लू और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अन्य आपदाओं समेत हर तरह की आपात स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए राज्य सरकार ने पूर्व चेतावनी प्रणाली, आपदा पूर्व तैयारी और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को और मजबूत किया है। उन्होंने बताया कि विभाग द्वारा प्रखंड, जिला और राज्य स्तर पर आपदा से निपटने की क्षमता को सुदृढ़ बनाने के लिए लगातार समन्वित प्रयास किए जा रहे हैं।
श्री सिद्दीकी ने कहा कि आपदा प्रबंधन में सरकारी विभागों के साथ-साथ समुदाय और मीडिया की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। उन्होंने मीडिया से अपील की कि आपदा के समय केवल सत्यापित और तथ्यपरक सूचनाओं का ही प्रसार करें, ताकि अफवाहों और भ्रामक खबरों पर रोक लगाई जा सके। साथ ही उन्होंने राहत और बचाव कार्यों में जुटे अग्रिम पंक्ति के कर्मियों के प्रयासों और योगदान को भी प्रमुखता से सामने लाने का आग्रह किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यूनिसेफ बिहार की फील्ड ऑफिस प्रमुख डॉ. मोनिका नील्सन ने कहा कि यदि हम गौर से देखें तो हर जलवायु संकट की कहानी के केंद्र में बच्चे और महिलाएं हैं। लेकिन उनकी वास्तविक चुनौतियां अक्सर खबरों में जगह नहीं बना पातीं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि स्कूल हमेशा के लिए छोड़ने के खतरे का सामना कर रही एक किशोरी, स्वास्थ्य सुविधा से दूर रहने वाली गर्भवती महिला या फिर महीनों तक टीकाकरण से वंचित रहने वाला छोटा बच्चा—ये ऐसे मुद्दे हैं जो अक्सर रिपोर्टिंग से छूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला का उद्देश्य मीडिया को ऐसे मानवीय पहलुओं को समझने और उन्हें प्रभावी ढंग से रिपोर्ट करने के लिए व्यावहारिक जानकारी और जरूरी उपकरण उपलब्ध कराना है।
डॉ. नील्सन ने बिहार के मीडिया की सराहना करते हुए कहा कि पिछले कई वर्षों में राज्य के पत्रकारों ने बाल पोषण, टीकाकरण, नवजात शिशु स्वास्थ्य और बाल संरक्षण से जुड़े मुद्दों को लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा, “मीडिया ने उन आंकड़ों को इंसानी चेहरा दिया है, जो केवल रिपोर्टों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रह जाते। आपने बच्चों और परिवारों की वास्तविक कहानियों को समाज के सामने लाकर इन मुद्दों को अधिक मानवीय और प्रभावशाली बनाया है।”
तकनीकी सत्र में आपदा रिपोर्टिंग से जुड़े व्यावहारिक और नैतिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। मीडिया एवं संचार विशेषज्ञ सुश्री मीनती चकलानवीस ने प्रतिभागियों को संकट के समय रिपोर्टिंग की नैतिक जिम्मेदारियों से अवगत कराया। उन्होंने सूचित सहमति (इनफॉर्म्ड कंसेंट) प्राप्त करने, बच्चों की पहचान की गोपनीयता बनाए रखने एवं सनसनीखेज प्रस्तुति से बचने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी आपदा या आपातकालीन स्थिति में समाचार देने की होड़ में प्रभावित लोगों की गरिमा और सम्मान से समझौता नहीं होना चाहिए।
यूनिसेफ के वॉश (WASH) विशेषज्ञ श्री सुधाकर रेड्डी ने जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसका प्रभाव बच्चों, महिलाओं और वंचित समुदायों पर असमान रूप से अधिक पड़ता है। उन्होंने कहा कि बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़ और सूखे जैसी जलवायु संबंधी घटनाओं के कारण पेयजल स्रोत दूषित हो जाते हैं, जिससे जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। श्री रेड्डी ने जोर देकर कहा कि जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों, स्वास्थ्य, शिक्षा और समग्र विकास से जुड़े एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे के रूप में देखने की आवश्यकता है।
कार्यशाला का समापन एक जीवंत संवादात्मक सत्र के साथ हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने आपदा संचार, जलवायु जागरूकता और जन जवाबदेही सुनिश्चित करने में मीडिया की बदलती भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान पत्रकारों, संचार विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों ने अपने अनुभव साझा किए तथा संवेदनशील एवं प्रभावी रिपोर्टिंग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया।
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