नीतीश कुमार की राजनीति - सत्ता का गणित और बदलता बिहार
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 07 मार्च ::
बिहार की राजनीति हमेशा से अप्रत्याशित घटनाओं और नाटकीय मोड़ों के लिए जानी जाती रही है। यहाँ की राजनीतिक जमीन पर सत्ता परिवर्तन, गठबंधन की राजनीति और अचानक होने वाले फैसले अक्सर चर्चा का विषय बनते रहे हैं। लेकिन हाल ही में पटना में जो राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, उसने न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीतिक हलचल को तेज कर दिया है।
एक ओर राज्यपाल के अचानक तबादले की खबर आई, तो दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में चल रही हलचल ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। दिन भर राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक हर कोई अपने-अपने तरीके से इस घटनाक्रम की व्याख्या करता दिखाई दिया।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी थी कि यदि परिस्थितियाँ थोड़ी और अनुकूल होती तो शायद शाम तक ही नए नेतृत्व को शपथ भी दिला दी जाती। इस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति की उस परंपरा को फिर से सामने ला दिया है जिसमें अचानक होने वाले राजनीतिक बदलाव आम बात माना जाता है।
इन सबके बीच एक नाम बार-बार चर्चा के केंद्र में रहा “नीतीश कुमार”। दो दशक से अधिक समय तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहने वाले इस नेता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारतीय राजनीति में उनकी चालें अब भी उतनी ही अप्रत्याशित हैं जितनी पहले थी।
पटना में सुबह से ही राजनीतिक गतिविधियों की हलचल देखी जा रही थी। सत्ता के गलियारों में आने-जाने वालों की संख्या अचानक बढ़ गई थी। राजनीतिक दलों के दफ्तरों में बैठकों का दौर चल रहा था और मीडिया चैनलों पर लगातार बहसें हो रही थीं।
राजनीतिक विश्लेषक इस बात को समझने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर अचानक यह हलचल क्यों तेज हो गई। इसी बीच राज्यपाल के तबादले की खबर ने इस राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया। राज्यपाल का तबादला सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है, लेकिन जब यह तबादला ऐसे समय में हो जब राज्य की राजनीति में उथल-पुथल की स्थिति हो, तो इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जाने लगता है।
पटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या यह महज प्रशासनिक निर्णय है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संकेत छिपा है। बिहार की राजनीति में एक शब्द अक्सर सुनने को मिलता है “नारद बंधु”। यह शब्द उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो राजनीतिक खबरों और अफवाहों को तेजी से फैलाते हैं। कल पटना में इन नारद बंधुओं की सक्रियता देखते ही बनती थी। हर गली, हर चौराहे और हर राजनीतिक दफ्तर में अलग-अलग खबरें उड़ रही थी।
कोई कह रहा था कि सत्ता परिवर्तन होने वाला है। कोई दावा कर रहा था कि नए मुख्यमंत्री की घोषणा बस होने ही वाली है। तो कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि शाम तक शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जा सकता है। हालाँकि इनमें से अधिकांश खबरें अपुष्ट थी, लेकिन राजनीतिक माहौल को गर्म रखने के लिए इतनी अफवाहें ही काफी थी।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सत्ता पक्ष की ओर से भी लगातार बयान दिए जा रहे थे। सरकार के नेताओं ने इन खबरों को महज अफवाह बताते हुए कहा कि राज्य की सरकार पूरी तरह स्थिर है और किसी तरह का संकट नहीं है। लेकिन विपक्ष ने इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। विपक्षी दलों के नेताओं ने सत्ता पक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकार के अंदर ही असंतोष की स्थिति है और यही कारण है कि राजनीतिक अस्थिरता की चर्चा हो रही है। विपक्ष के कुछ नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि बिहार की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश करने वाली है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू सामने आया, भाजपा विरोधी असंतुष्ट नेताओं की सक्रियता। राजनीतिक गलियारों में इन्हें अक्सर “तीरधारी” कहा जाता है, क्योंकि उनका संबंध जनता दल (यूनाइटेड) से जुड़ा माना जाता है, जिसका चुनाव चिह्न तीर है। इन असंतुष्ट नेताओं की बयानबाजी ने पूरे राजनीतिक माहौल को और रोचक बना दिया। कभी वे सत्ता पक्ष पर सवाल उठाते दिखाई दिए, तो कभी विपक्ष के साथ खड़े होते नजर आए। उनकी यह राजनीतिक गतिविधि कई लोगों के लिए मनोरंजन का विषय भी बन गई, क्योंकि कई बयान इतने विरोधाभासी थे कि उनका वास्तविक अर्थ समझना मुश्किल हो जाता था।
भारतीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में सरकारें बनती भी हैं और गिरती भी हैं। नेता आते भी हैं और जाते भी हैं। लेकिन कुछ नेता ऐसे होते हैं जो लंबे समय तक राजनीति के केंद्र में बने रहते हैं। बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का नाम ऐसे ही नेताओं में शामिल है। पिछले दो दशकों में बिहार की राजनीति में जितने भी बड़े बदलाव हुए, उनमें किसी न किसी रूप में नीतीश कुमार की भूमिका जरूर रही है।
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर कई मायनों में अनोखा रहा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत समाजवादी राजनीति से की थी और धीरे-धीरे बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए। वर्ष 2005 में जब उन्होंने पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तब राज्य की स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण थी। कानून व्यवस्था की खराब स्थिति, खराब बुनियादी ढांचा और आर्थिक पिछड़ापन, ये सभी समस्याएँ उस समय बिहार के सामने थीं। लेकिन नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य ने कई क्षेत्रों में बदलाव दिखने लगा।
नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में “सुशासन” का नारा दिया। उन्होंने सड़क निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में कई योजनाएँ शुरू कीं। विशेष रूप से लड़कियों के लिए साइकिल योजना और पोशाक योजना जैसी पहल ने बिहार में शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन योजनाओं के कारण बड़ी संख्या में लड़कियाँ स्कूल जाने लगीं और बिहार के सामाजिक ढांचे में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिला।
नीतीश कुमार को भारतीय राजनीति में गठबंधन का माहिर खिलाड़ी भी माना जाता है। उन्होंने समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन किया और परिस्थितियों के अनुसार अपने राजनीतिक फैसले बदले। कभी वे भाजपा के साथ रहे, कभी उन्होंने महागठबंधन का हिस्सा बनकर चुनाव लड़ा और फिर बाद में राजनीतिक समीकरण बदलते ही उन्होंने अपनी रणनीति भी बदल दी। इस वजह से कई लोग उन्हें राजनीति का “चाणक्य” भी कहते हैं।
राजनीति में लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहने के बावजूद नीतीश कुमार का निजी जीवन बेहद सादा माना जाता है। यह बात अक्सर चर्चा में आती है कि इतने लंबे राजनीतिक करियर के बावजूद उनके पास निजी संपत्ति बहुत अधिक नहीं है। कहा जाता है कि उनका कुल नगद और बैंक बैलेंस एक लाख रुपये से भी कम रहा है। हालाँकि राजनीतिक हलकों में इस आंकड़े को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन यह बात लगभग सभी स्वीकार करते हैं कि नीतीश कुमार की जीवन शैली अपेक्षाकृत सादगी भरी है।
हाल के वर्षों में नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर भी चर्चा होती रही है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार जैसे बड़े और जटिल राज्य की जिम्मेदारी संभालना आसान नहीं है, खासकर तब जब स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ भी सामने हो। लेकिन इसके बावजूद नीतीश कुमार ने लंबे समय तक राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई है।
राजनीति से इतर एक और पहलू है जो इस चर्चा में सामने आता है, पिता की भूमिका। किसी भी पिता की इच्छा होती है कि उसका परिवार और उसका वंश उसके किए हुए कार्यों को आगे बढ़ाए। भारतीय समाज में यह भावना बहुत सामान्य मानी जाती है। राजनीति में भी कई बार यह देखा गया है कि नेता अपने परिवार के किसी सदस्य को सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने का अवसर देते हैं।
भारतीय राजनीति में राजनीतिक विरासत का विषय हमेशा चर्चा में रहा है। नेहरू-गांधी परिवार से लेकर कई क्षेत्रीय दलों तक, राजनीतिक परिवारों की परंपरा भारत की राजनीति का हिस्सा रही है। ऐसे में यदि कोई नेता अपने परिवार के किसी सदस्य को आगे बढ़ाना चाहता है तो इसे पूरी तरह असामान्य भी नहीं माना जाएगा।
पटना में हुआ हालिया राजनीतिक घटनाक्रम एक बार फिर यह याद दिलाता है कि बिहार की राजनीति कितनी गतिशील और अप्रत्याशित है। यहाँ की राजनीति में अचानक होने वाले फैसले, गठबंधन की बदलती दिशा और नेताओं की रणनीतिक चालें अक्सर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं। नीतीश कुमार जैसे नेता इस राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में रहे हैं और उनकी राजनीतिक शैली आज भी विश्लेषकों के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई है। आने वाले समय में बिहार की राजनीति किस दिशा में जाएगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा। लेकिन इतना तय है कि पटना की राजनीतिक हलचल ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीति कभी स्थिर नहीं रहती है बल्कि वह लगातार बदलती रहती है।
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