यौन हिंसा के मामलों में तीन महीने में दिशानिर्देश तय करेगी राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल
•शीर्ष अदालत ने मामले के पक्षकार जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) को इन दिशानिर्देशों में सहायता करने के लिए कहा
•कासगंज मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ जेआरसी की याचिका पर आया आदेश
यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं व बच्चों के प्रति न्यायालयों को अधिक संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण बनाने के उद्देश्य से उठाए गए एक महत्वपूर्ण कदम में सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से एक विशेषज्ञ समिति गठित करने और ऐसे मामलों में न्यायिक प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने को कहा है। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाला बागली और एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादास्पद फैसले पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कहा गया था कि नाबालिग बच्ची के वक्ष पकड़ने और उसकी सलवार का नाड़ा खोलने को “बलात्कार” या “बलात्कार का प्रयास” नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ “तैयारी” है। बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए अनुरोध किया था कि इसके साथ ही इसी तरह के अन्य संवेदनहीन न्यायिक फैसलों का भी संज्ञान लिया जाए।
शीर्ष अदालत ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि पूर्व में इस तरह के प्रयासों के खास नतीजे नहीं निकले हैं। इसके मद्देनजर खंडपीठ ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने को कहा जो इस तरह के मामलों में न्यायाधीशों व न्यायिक प्रक्रिया को और संवेदनशील बनाने के लिए समग्र और विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करेगी। अदालत ने कहा कि अकादमी के निदेशक न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अनिरूद्ध बोस इस समिति की अध्यक्षता करेंगे। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि यह पूरी तरह त्रुटिपूर्ण और आपराधिक दंड विधान के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है।
यह मामला नवंबर 2021 में उत्तर प्रदेश के कासंगज का है जहां दो युवक 11 साल की नाबालिग बच्ची को जबरन घसीट कर एक पुलिया के नीचे ले गए और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। बच्ची की चीख पुकार सुन उधर से गुजर रहे दो राहगीर वहां पहुंचे जिसके बाद दोनों आरोपी मौके से भाग निकले। इस मामले में मार्च 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “यह कृत्य सिर्फ बलात्कार की ‘तैयारी’ है और यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि यह ‘बलात्कार का प्रयास’ या ‘बलात्कार’ है। बलपूर्वक छेड़खानी को बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता।” इस फैसले के नतीजे में आरोपों की गंभीरता काफी कम हो गई। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता की ओर से शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर की। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के मामलों में और अधिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश तय करने का अनुरोध भी किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समिति के दिशानिर्देश समग्र और व्यापक होने के साथ सबको समझ में आने वाली भाषा में होने चाहिए। समिति से तीन महीने में इस पर अपना विचार विमर्श पूरा कर रिपोर्ट सौंपने का अनुरोध किया गया है।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा, “यह फैसला यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय, गरिमा और संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के हमारे लंबे और दृढ़ संघर्ष का नतीजा है। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हैं जिसने न्यायिक तंत्र में भरोसा बहाल किया है और इस विश्वास को मजबूत किया है कि बच्चों एवं कमजोर व संवेदनशील पृष्ठभूमि के लोगों के खिलाफ अपराधों को गंभीरता और अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ देखा जाएगा।”
शीर्ष अदालत ने अनुरोध किया है कि दिशानिर्देश तय करते समय भारत की “भाषायी विविधता” को ध्यान में रखें। आदेश में कहा गया, “बहुत से शब्द व हाव भाव हैं जिन्हें सामान्यत: कानून की नजर में दंडनीय माना जा सकता है लेकिन फिर भी स्थानीय बोलियों में इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है। इसका कारण है कि उन्हें इस बात की समझ ही नहीं है कि ये शब्द या हाव भाव आक्रामकता के दायरे में आते हैं। यदि विशेषज्ञ समिति इन दिशानिर्देशों में विभिन्न भाषाओं में इस तरह के आपत्तिजनक शब्दों, मुहावरों या भावाभिव्यक्तियों को चिह्नित व संकलित करे ताकि उनकी अनदेखी नहीं हो सके तो यह एक सराहनीय काम होगा।” साथ ही अदालत ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि ये दिशानिर्देश भारी भरकम और विदेशी भाषाओं व न्याय शास्त्र से ली गई जटिल शब्दावलियों से मुक्त होंगे। ये दिशानिर्देश सरल भाषा में हो ताकि ये उन्हें समझ में आए जिनके हितों की हम रक्षा करना चाहते हैं।”
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