*पितरों को गया श्राद्ध में पिंडदान से   शांति मिलती है*

*पितरों को गया श्राद्ध में पिंडदान से शांति मिलती है*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 11 अक्तूबर ::

चार पुरुषार्थों में अंतिम मोक्ष की प्राप्ति का स्थान गया को माना जाता है। मुक्ति के चार साधनों में ब्रह्मज्ञान, गया श्राद्ध, गौगृह में मरण और कुरुक्षेत्र का वास को माना जाता है।  धर्म, अर्थ और काम की पूर्णता तभी सार्थक होता है, जब मोक्ष सुलभ हो।
कहा जाता है कि गया श्राद्ध में पिंडदान से पितरों को सब तरह से शांति मिलती है। 

श्राद्ध के देवता वसु, रुद्र और आदित्य को माना जाता है। मनुस्मृति के अनुसार, मनुष्य के तीन पूर्वज यानि पिता, पितामह (दादा) और प्रपितामह (परदादा) को पितृ देवों यानि वसु, रुद्र और आदित्य के समतुल्य माना गया है। श्राद्ध करते समय श्राद्ध कर्म के लिए उनके पूर्वजों का प्रतिनिधित्व माना जाता है।

श्राद्ध कर्म पितृपक्ष में मृतक के निधन की तिथि पर होता है, इसे नित्य कहा गया है। जब किसी विशेष पारिवारिक उत्सव आदि में श्राद्ध कर्म किया जाता है, तो उसे नैमित्तिक कहा गया है। मनौती के लिए कृतिका या रोहिणी नक्षत्र में श्राद्ध कर्म किया जाता है, उसे काम्य कहा गया है। श्राद्ध कर्म में उपयोग होने वाले पदार्थ दो प्रकार के होते है वह है उचित पदार्थ और वर्जित पदार्थ।

उचित पदार्थ में द्रव्य आते हैं, वह है तिल, चावल, जौ आदि। पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक में दूध, दही और घी आता है।  वहीं वर्जित पदार्थ में मसूर, राजमा, कोदो, चना, अलसी, नामक आदि का प्रयोग श्राद्ध कर्म में निषेध होता है। 

श्राद्ध कर्म में कुश, तिल और कौआ का बहुत महत्व होता है। कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश, कुश में क्रमबद्ध जड़, मध्य और अग्र भाग में रहते है। इसलिए यह कहा जाता है कि कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मानवों का और जड़ भाग पितरों के लिए होता है। मान्यता है कि कुश और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं और तिल पितरों को प्रिय होता है। इसे दुष्ट आत्माओं को दूर भगाने वाले पदार्थ माना जाता है।  यह भी मान्यता है की यदि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध करने पर दुष्ट आत्माएं उसे ग्रहण कर लेता है। वहीं मान्यता है कि मृत्यु के बाद पहला जन्म कौआ के रूप में होता है, इसलिए कौआ को दिया गया भोजन पीतरन ग्रहण करते है।  

श्राद्ध कर्म में स्थान का भी बहुत महत्व होता है। मान्यता है कि श्राद्ध कभी भी किसी दूसरों के घर में, दूसरों की भूमि में नहीं किया जा सकता है। श्राद्ध वैसे भूमि पर करना चाहिए जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व नहीं हो।
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