मोबाइल की कतार और भविष्य की तलाश

मोबाइल की कतार और भविष्य की तलाश

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 21 सितम्बर ::

मानव जीवन की किसी भी अवस्था का फर्क केवल चेहरे पर दिखाई नहीं देता है, बल्कि वह उसके व्यक्तित्व, सोच, व्यवहार और प्राथमिकताओं पर भी लिखा जाता है। उम्र के साथ चेहरे की रेखाएं बदलती है, बालों का रंग बदलता है, चाल में परिवर्तन आता है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन मनुष्य की सोच में होता है। जीवन का हर पड़ाव अपने साथ कुछ नया लेकर आता है। इन पड़ावों में युवावस्था सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह वह समय है जब शरीर में ऊर्जा होती है, आंखों में सपने होते हैं, मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है और भविष्य को अपनी इच्छानुसार आकार देने की आकांक्षा होती है। लेकिन इसी उम्र में दिखावे की चाह, उत्तेजना, प्रतिस्पर्धा, अधीरता और तनाव भी अपने चरम पर होते हैं। युवावस्था वास्तव में संभावनाओं का मौसम है। सवाल यह है कि इन संभावनाओं का इस्तेमाल किस दिशा में किया जा रहा है? देर रात से सुबह तक देश के कुछ शहरों में महंगे स्मार्टफोन खरीदने के लिए युवाओं की लंबी कतारें देखकर मन में सहज ही एक सवाल उठता है कि क्या यही जुनून शिक्षा, रोजगार, शोध, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के लिए भी दिखाई देगा? शायद नहीं। यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष या किसी ब्रांड के खिलाफ नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें आवश्यकता और आकर्षण के बीच की सीमा धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही है।

जब कोई युवा 1.80 लाख रुपये से लेकर 3.30 लाख रुपये या उससे अधिक कीमत के फोन को हासिल करने के लिए घंटों कतार में खड़ा रहता है, तो पहली नजर में यह उसकी पसंद, आर्थिक क्षमता और तकनीक के प्रति उत्साह का विषय लग सकता है। किसी वस्तु को खरीदना अपने आप में गलत नहीं है। यदि किसी के पास संसाधन हैं और वह अपनी पसंद की वस्तु खरीदना चाहता है, तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है। लेकिन जब किसी वस्तु का मूल्य उसकी वास्तविक उपयोगिता से आगे बढ़कर सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाए, तब विचार करना जरूरी हो जाता है। क्या वास्तव में इतना महंगा फोन हमारे काम को उतना ही बेहतर बनाता है, जितना उसकी कीमत बढ़ी हुई होती है? क्या उसकी अतिरिक्त सुविधाएं हमारी पढ़ाई, रोजगार, व्यवसाय, शोध या रचनात्मकता में उतना परिवर्तन ला रही हैं? या फिर हम उस वस्तु को इसलिए चाहते हैं क्योंकि वह हमारे हाथ में दूसरों से अलग दिखाई देती है? यहीं से जरूरत और दिखावे की दौड़ के बीच का अंतर सामने आता है।

आज के समय में तकनीक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। मोबाइल फोन केवल बातचीत का साधन नहीं रहा। बैंकिंग, शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य सेवाएं, सरकारी सुविधाएं, डिजिटल भुगतान, समाचार, मनोरंजन और दुनिया भर की जानकारी हमारी हथेली में उपलब्ध है। इसलिए तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीक हमारे जीवन को आसान बनाने के बजाय हमारी इच्छाओं को नियंत्रित करने लगे। एक सामान्य आवश्यकता के लिए खरीदा गया फोन कुछ वर्षों में बदलना समझ में आता है। लेकिन हर नए मॉडल के आने के साथ पुराने को बेकार समझ लेना उपभोक्तावादी मानसिकता का संकेत हो सकता है। आज मोबाइल फोन केवल उपकरण नहीं रह गया है। वह कई लोगों के लिए पहचान, प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रदर्शन का माध्यम बन चुका है। फोन की कीमत बढ़ती है तो कई बार आत्मविश्वास भी उसके साथ बढ़ता हुआ दिखाई देता है। यह स्थिति विचार करने योग्य है। क्या हमारी पहचान हमारी प्रतिभा से बनेगी या हमारे हाथ में पकड़े उपकरण से?

युवावस्था में ऊर्जा सबसे बड़ी पूंजी होती है। पैसा खो जाए तो कमाया जा सकता है। अवसर चला जाए तो दूसरा अवसर तलाशा जा सकता है। लेकिन समय एक बार चला गया तो वापस नहीं आता है। युवा यदि प्रतिदिन कुछ घंटे किसी नई तकनीक को सीखने में लगाता है, तो वह अपने भविष्य को मजबूत कर सकता है। यदि वही समय किसी शोध, कौशल, भाषा, साहित्य, विज्ञान, उद्यमिता या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगाया जाए, तो उसका परिणाम वर्षों तक दिखाई दे सकता है। यदि कोई युवा रोज एक घंटा किसी नई चीज को सीखता है, तो एक वर्ष में उसके पास 365 घंटे का अतिरिक्त ज्ञान हो सकता है। लेकिन यदि वही समय केवल स्क्रीन देखने, सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने और दूसरों की जीवनशैली से अपनी तुलना करने में निकल जाए, तो अंततः हाथ में केवल समय की कमी रह जाती है। यही कारण है कि युवाओं के जुनून की दिशा महत्वपूर्ण है। जुनून होना पर्याप्त नहीं है, जुनून की दिशा सही होना भी जरूरी है।

कल्पना कीजिए कि देश के किसी शहर में रात से युवाओं की लंबी कतार लगी है। लेकिन इस बार कतार किसी महंगे फोन के लिए नहीं, बल्कि किसी विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा के लिए है। किसी दूसरे शहर में युवा किसी शोध प्रयोगशाला के बाहर अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कहीं हजारों युवा रोजगार मेले में अपनी योग्यता के साथ खड़े हैं। कहीं स्टार्टअप शुरू करने वाले युवा निवेश और मार्गदर्शन की तलाश में हैं। कहीं पुस्तकालयों में देर रात तक पढ़ने वाले छात्र दिखाई दे रहे हैं। कहीं वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में युवा शोधकर्ता देश की किसी समस्या का समाधान खोज रहे हैं। ऐसी कतारें किसी भी समाज की दिशा बदल सकती हैं। फोन खरीदने की कतार कुछ समय बाद समाप्त हो जाती है। लेकिन ज्ञान, कौशल और नवाचार की कतारें आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदल सकती है। इसलिए प्रश्न कतार का नहीं है। प्रश्न है कि कतार किस मंजिल की ओर जा रही है?

आज का युवा केवल अपनी जरूरत से खरीदारी नहीं करता है। उसके खरीद निर्णयों पर विज्ञापन, सोशल मीडिया, सेलिब्रिटी संस्कृति और मित्र समूह का भी प्रभाव पड़ता है। किसी के पास नया फोन आता है तो दूसरे के भीतर भी वैसा ही फोन पाने की इच्छा पैदा होती है। फिर उससे बेहतर मॉडल की चाह पैदा होती है। देखते-देखते जरूरत प्रतिस्पर्धा में बदल जाती है। यह प्रतिस्पर्धा केवल फोन तक सीमित नहीं रहती है। कपड़े, कार, बाइक, मकान, छुट्टियां, रेस्तरां और जीवनशैली तक प्रदर्शन का माध्यम बनने लगते हैं। समस्या वस्तुओं में नहीं है। समस्या तब है जब वस्तुएं व्यक्ति के आत्म-मूल्य का पैमाना बन जाएं। महंगी वस्तु होना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन महंगी वस्तु के कारण स्वयं को उपलब्ध मान लेना भ्रम हो सकता है। युवा की वास्तविक पहचान उसके ज्ञान, चरित्र, कौशल, संवेदनशीलता और समाज के प्रति योगदान से बनती है।

जीवन का अनुभव मनुष्य को धीरे-धीरे यह सिखाता है कि हर चमक मूल्यवान नहीं होती है। युवावस्था में संभावनाएं बहुत अधिक दिखाई देती है। हर नई चीज आकर्षित करती है। हर उपलब्धि बड़ी लगती है। लेकिन समय बीतने के साथ मनुष्य समझता है कि जीवन में हर चीज हासिल करना आवश्यक नहीं है। कुछ चीजें छोड़नी पड़ती हैं ताकि महत्वपूर्ण चीजों के लिए समय बचाया जा सके। उम्र बढ़ने के साथ सोच में ठहराव आता है, व्यवहार में परिपक्वता आती है और अनुभव में गहराई आती है। तब व्यक्ति समझने लगता है कि जीवन का सुख केवल अधिक पाने में नहीं, बल्कि सही चीज पाने और उसका सही उपयोग करने में भी है। युवा अवस्था में जहां प्रश्न होता है कि "मेरे पास क्या है?" वहीं परिपक्वता पूछती है कि "मेरे पास जो है, उसका मैंने क्या किया?" यही अंतर जीवन की दिशा बदल सकता है।

मोबाइल फोन हमारी जिन्दगी का हिस्सा है और आने वाले समय में तकनीक की भूमिका और बढ़ेगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शिक्षा, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी और डिजिटल अर्थव्यवस्था युवाओं के लिए नई संभावनाएं खोल रहे हैं। ऐसे समय में तकनीक को केवल मनोरंजन और प्रदर्शन तक सीमित करना अपनी ही संभावनाओं को छोटा करना है। जिस फोन से हम घंटों वीडियो देख सकते हैं, उसी फोन से दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के व्याख्यान सुन सकते हैं। जिस इंटरनेट पर हम मनोरंजन खोजते हैं, उसी पर करोड़ों किताबों, शोधपत्रों और पाठ्यक्रमों तक पहुंच बनाई जा सकती है। जिस कैमरे से हम सेल्फी लेते हैं, उसी से कोई युवा अपना व्यवसाय, कला या रचनात्मक काम दुनिया तक पहुंचा सकता है। इसलिए सवाल फोन का नहीं है। सवाल यह है कि फोन हमारा मालिक है या हमारा साधन?

यह भी समझना होगा कि युवाओं को केवल उपदेश देकर बदला नहीं जा सकता। उन्हें अवसर चाहिए। बेहतर शिक्षा चाहिए। गुणवत्तापूर्ण रोजगार चाहिए। शोध के लिए संसाधन चाहिए। खेल, कला और उद्यमिता के लिए मंच चाहिए। यदि हम युवाओं से कहते हैं कि वे अपना समय देश के निर्माण में लगाएं, तो देश और समाज को भी उनके लिए रास्ते बनाने होंगे। एक युवा के हाथ में महंगा फोन देखकर उसे दोष देना आसान है। लेकिन यह पूछना अधिक महत्वपूर्ण है कि उस युवा के हाथ में ऐसी कौन-सी पुस्तक, प्रयोगशाला, प्रशिक्षण या रोजगार का अवसर पहुंचा, जिससे वह अपनी क्षमता का विस्तार कर सके? युवा ऊर्जा को सही दिशा देने की जिम्मेदारी केवल युवाओं की नहीं, परिवार, शिक्षा व्यवस्था, उद्योग, समाज और सरकार, सभी की है।

दुनिया तेजी से बदल रही है। आने वाले समय में देशों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल संसाधनों की नहीं होगी। प्रतिस्पर्धा ज्ञान, तकनीक, शोध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवाचार और मानव पूंजी की होगी। जिस देश के युवा सीखने, प्रयोग करने और नई चीजें बनाने में आगे होंगे, वही देश भविष्य की अर्थव्यवस्था में मजबूत स्थिति बनाए रख पाएगा। इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि उसके युवा महंगे फोन खरीदते हैं या नहीं। बड़ी चुनौती यह है कि क्या वही युवा महंगे उपकरणों का इस्तेमाल महंगी समस्याओं के समाधान के लिए करेंगे? क्या कोई युवा मोबाइल पर मनोरंजन देखने के साथ-साथ कोई नई भाषा सीखेगा? क्या वह किसी ऑनलाइन पाठ्यक्रम से नया कौशल हासिल करेगा? क्या वह अपने गांव की समस्या का डिजिटल समाधान खोजेगा? क्या वह कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा या रोजगार से जुड़ी कोई नई पहल करेगा? क्या वह शोध के क्षेत्र में जाएगा? क्या वह रोजगार मांगने के साथ रोजगार देने की क्षमता भी विकसित करेगा? यही वे प्रश्न हैं जो भविष्य तय करेंगे।

युवाओं के भीतर जुनून होना समाज के लिए सौभाग्य है। समस्या जुनून में नहीं, उसकी दिशा में है। महंगे फोन के लिए रातभर खड़े रहने वाला युवा यदि किसी लक्ष्य के लिए भी उतनी ही दृढ़ता से खड़ा हो जाए, तो वह स्वयं का भविष्य बदल सकता है। जो युवा नवीनतम तकनीक पाने के लिए उत्साहित है, वही तकनीक बनाने वाला वैज्ञानिक भी बन सकता है। जो युवा सोशल मीडिया पर लाखों लोगों तक पहुंच बना सकता है, वही समाज में सकारात्मक विचारों का संचार भी कर सकता है। जो युवा किसी ब्रांड के नए उत्पाद का इंतजार कर सकता है, वही किसी नए भारतीय उत्पाद या स्टार्टअप का निर्माता भी बन सकता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि उपभोक्ता बनने के साथ-साथ निर्माता बनने की आकांक्षा भी पैदा हो।

किसी महंगे फोन को खरीदना अपराध नहीं है। तकनीक का आनंद लेना भी गलत नहीं है। आधुनिक सुविधाओं का उपयोग करना समय की आवश्यकता है। लेकिन जीवन का मूल्य उन वस्तुओं से निर्धारित नहीं होना चाहिए जिन्हें हम खरीद सकते हैं। एक महंगा फोन कुछ वर्षों बाद पुराना हो जाएगा। उसका नया मॉडल बाजार में आ जाएगा। लेकिन किसी युवा द्वारा अर्जित ज्ञान, विकसित कौशल, किया गया शोध, बनाया गया व्यवसाय और समाज के लिए किया गया योगदान लंबे समय तक उसके साथ रहेगा। इसलिए आज जब किसी शहर में महंगे फोन के लिए युवाओं की लंबी कतार दिखाई दे, तो उसे देखकर केवल आश्चर्य करने के बजाय स्वयं से एक प्रश्न करना चाहिए कि क्या हमारे देश में कभी ऐसी कतार भी लगेगी, जिसमें युवा ज्ञान हासिल करने, शोध करने, रोजगार पैदा करने और भारत को नई ऊंचाई देने के लिए घंटों प्रतीक्षा करने को तैयार हो? शायद उस दिन भारत की युवा शक्ति का वास्तविक अर्थ दिखाई देगा। क्योंकि देश का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि हमारे युवाओं की जेब में कौन-सा फोन है। देश का भविष्य इस बात से तय होगा कि उस फोन को चलाने वाले हाथों में कितना कौशल है, उन आंखों में कितनी दूरदृष्टि है और उन दिमागों में देश के लिए कितना सृजन छिपा है। तकनीक हमारे हाथ में रहे, हमारी सोच पर नहीं। दिखावा हमारे जीवन का उद्देश्य न बने और युवावस्था की ऊर्जा केवल बाजार की कतारों में नहीं, भारत के भविष्य की निर्माण-शालाओं में भी दिखाई दे, यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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