भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटनाएल नीनो लेख श्रृंखला

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटनाएल नीनो लेख श्रृंखला

एल नीनो की जानकारी और पक्की तैयारी से लहलहाएगी फसल

*लेखकगण: मनीषा टम्टा, संजीव कुमार, शिवानी एवं अनुप दास* 

कृषि की सफलता मौसम के मिजाज पर निर्भर करती है। बीते कुछ सालों में मौसम में कई बड़े बदलाव देखे गए है जैसे —अत्यधिक गर्मी एवं ठंड, सूखा, समय पर बारिश न होना, अत्यधिक अथवा कम वर्षा, इत्यादि। इन मौसमीय अनिश्चितताओं के कारण किसानों को कई बार भारी नुकसान झेलना पड़ता है। इस वर्ष मौसम से जुड़ी एक ऐसी ही बड़ी चुनौती “अल नीनो” की दस्तक ने फिर से कृषि को संकट के घेरे में खड़ा कर दिया है। इस दौर में किसानों को यह समझना जरूरी है कि आखिर यह “अल नीनो” क्या है, फसलों पर इसका क्या असर पड़ता है और किस तरह से फसलों को इसके दुष्प्रभाव से बचाया जा सकता है। 
“एल नीनो” कोई प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि भारत से मीलों दूर समुद्र में होने वाली एक हलचल है। यह प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से गर्म होने की प्रक्रिया है। जिसके चलते ट्रेड विंड्स (व्यापारिक पवनें) कमजोर हो जाती हैं, गर्म पानी पूर्व की ओर (पेरू के तट की तरफ) बढ़ने लगता है और दुनिया भर के मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है। ठीक इसके विपरीत, जब प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है, तो इस घटना को इसे “ला नीना” कहा जाता है। इस स्थिति में, भारत में सामान्य से अधिक बारिश होती है, जो हमारी फसलों के लिए वरदान साबित होती है। सदियों पहले दक्षिण अमेरिका के मछुआरों ने प्रशांत महासागर के गर्म होने के इस चक्र को पहचाना था और इसे अल नीनो (बालक ईसा) नाम दिया था। अल नीनो का मतलब केवल सूखा नहीं है, बल्कि वर्षा की अनिश्चितता से है। यह संकट आमतौर पर हर 2 से 7 साल में एक बार आता है और लगभग 9 से 12 महीने तक रहता है। 
भारत के संदर्भ में, जब भी एल नीनो सक्रिय होता है, तो इसका सीधा प्रभाव मानसूनी वर्षा पर पड़ता है। जो बादल भारत में अच्छी वर्षा करने वाले थे, वे कमजोर पड़ जाते हैं या रास्ता बदल लेते हैं। मानसून कमजोर हो जाने से सामान्य से कम वर्षा, आगमन में देरी, या सूखे जैसे हालात देखने को मिलते हैं। जब अल नीनो सक्रिय होता है, तब “हिन्द महासागर द्विध्रुव (आईओडी)” ही है जो रक्षक बनकर हमारे मानसून को बचाता है। यह भी एक समुद्री घटना ही है, जो हिंद महासागर के दो हिस्सों, पश्चिमी हिस्से (अरब सागर/अफ्रीका के पास) और पूर्वी हिस्से (इंडोनेशिया के पास) के बीच समुद्र की सतह के तापमान के अंतर को दर्शाती है। इसे “भारतीय नीनो” भी कहा जाता है। इसके दो मुख्य पहलू हैं; पॉजिटिव आईओडी होने पर भारत में शानदार वर्षा होती है, और नेगेटिव आईओडी होने पर भारत में मानसून कमजोर पड़ जाता है और सूखे की स्थिति गंभीर हो जाती है। एक मजबूत पॉजिटिव आईओडी, अल नीनो के सूखे वाले असर को काफी हद तक खत्म कर देता है। 
भारत में लगभग 75 से 80% वर्षा मानसून (जून से सितंबर) के दौरान होती है और इस समय देश में मुख्य तौर पर खरीफ की फसलें उगाई जाती हैं। इस समय वर्षा की मात्रा अथवा भौगोलिक वितरण में किसी भी प्रकार का बदलाव फसलों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, इस वर्ष मॉनसून के मौसम में देश में औसत बारिश सामान्य से थोड़ी कम (दीर्घकालिक औसत का लगभग 90%) रहने का अनुमान है। इस वर्ष आईओडी की स्थिति भी अब तक न्यूट्रल बनी हुई है, और मानसून के अंतिम महीनों में इसके पॉजिटिव होने की उम्मीद है, संभवतः अगस्त- सितम्बर के महीने पर वर्षा की स्थिति में कुछ सुधार हो। यद्पि दक्षिण-पश्चिम मानसून अब तक पूरे देश में पहुंच चुका है, लेकिन प्रभावी एल नीनो और अन्य मौसमी बदलावों के कारण वर्षा का वितरण बहुत असमान रहा है। अखिल भारतीय स्तर पर, जून की शुरुआत से जुलाई के पहले सप्ताह तक पूरे देश में सामान्य से लगभग 14% से 15% कम वर्षा दर्ज की गई है। बिहार में मानसून की रफ्तार इस बार काफी धीमी और चिंताजनक बनी हुई है। राज्य के अधिकांश हिस्सों में जून से लेकर शुरुआती जुलाई में सामान्य से काफी कम वर्षा (लगभग 51% कम) दर्ज की गई है, जिससे धान के बिचड़े (नर्सरी) लगाने, बचाने और रोपनी में किसानों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जब मानसून कमजोर होता है, तो फसलों पर इसका निम्न तरह से सीधा असर पड़ता है:
• समय पर वर्षा न होने के कारण से खरीफ की फसलों (जैसे धान, मक्का) की बुवाई में देरी होती है। पानी की कमी से सुखाड़ की स्थिति में पौधे शुरुआती दौर में ही दम तोड़ने लगते हैं। उचित प्रबंधन न होने पर पूरी फसल के नष्ट होने का भी संकट बना रहता है। 
• तापमान बढ़ने और नमी की कमी के कारण फसलों में रस चूसने वाले कीट (जैसे थ्रिप्स, एफिड्स) और कई तरह की बीमारियों का प्रकोप भी तेज हो जाता है।
• तालाबों और कुओं में पानी कम होने से भूजल का स्तर तेजी से गिरने लगता है, जिससे सिंचाई का खर्च बढ़ जाता है, और खेती की कुल लागत भी बढ़ जाती है।
• जब मुख्य फसलों की पैदावार घटती है, तो बाजार में अनाज और सब्जियों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।

एल नीनो से निपटने के लिए प्रभावी रणनीतियां: मौसम में बदलाव हमारे हाथ में नहीं, लेकिन सही तैयारी से हम अपनी फसलों को संभावित नुकसान से जरूर बचा सकते हैं। इसके लिए निम्नलिखित रणनीतियां अपनानी चाहिए:
• सही फसलों और किस्मों का चुनाव: वर्षा के आगमन में देरी अथवा कमी की स्थिति में धान की जगह ऐसी फसलें चुनें जिन्हें कम पानी चाहिए जैसे बाजरा, ज्वार, मक्का, मूंग या अरहर। क्षेत्र विशेष के अनुसार, धान की अल्पावधि (110-120 दिन) और सूखा सहिष्णु किस्मों को लगाएं जैसे- सहभागी धान, स्वर्ण श्रेया इत्यादि। 
• पानी का सदुपयोग एवं सिंचाई पद्धति: पानी की हर एक बूंद कीमती होती है इसलिए मिट्टी की सतह पर हल्की दरारें दिखने पर ही सिंचाई करें। टपक अथवा फव्वारा सिंचाई अपनाएं, इससे 50% तक पानी बचता है। यथासंभव धान की सीधी बुवाई तकनीक अपनाएँ, इसमें 40% तक पानी की बचत होती है। खेत को लगातार पानी से भरकर रखने के बजाय 'वैकल्पिक गीला और सूखा' (AWD) सिंचाई पद्धति अपनाएं। जब फसल बिल्कुल सूखने की कगार पर हो तब उसे बचाने के लिए थोड़ा सा पानी अवश्य दें।
• मिट्टी की नमी बनाए रखना एवं पोषक तत्व प्रबन्धन: खेत की बार-बार जुताई न करें। ज्यादा जुताई से मिट्टी के अंदर की बची-खुची नमी भी हवा में उड़ जाती है। इसके लिए कम जुताई या शून्य जुताई या सीधी बुवाई तकनीक अपनाएं। खेत की कतारों के बीच सूखी घास, पुआल या प्लास्टिक शीट (मल्चिंग) बिछा दें। इससे जमीन की नमी धूप से उड़ती नहीं है और लंबे समय तक बनी रहती है। रासायनिक खादों (जैसे यूरिया) के अत्यधिक उपयोग से बचें। उचित पोषक तत्व प्रबन्धन के लिए गोबर की खाद, केंचुआ खाद (वर्मीकंपोस्ट) का उपयोग करें। यह जैविक खाद मिट्टी की पानी रोकने की क्षमता को बढ़ाते हैं। 
• वर्षा जल संचय: खेत के एक छोटे से हिस्से में तालाब बनाएं। जब भी थोड़ी-बहुत बारिश हो, उसका पानी इसमें इकट्ठा करें। संकट के समय इस पानी से जीवन रक्षक सिंचाई द्वारा पूरी फसल को बचाया जा सकता है। वर्षा जल के संचय हेतु खेत की मेड़ों की ऊंचाई बढ़ा दें।

विशेष सलाह: अल नीनो एक चुनौती जरूर है, लेकिन हमें डरना नहीं है, बल्कि बदले मौसम के साथ सही रणनीति अपनानी है। हमेशा अपने मोबाइल, टेलिविज़न, अखबार और रेडियो पर प्रसारित मौसम विभाग की चेतावनियों और कृषि विज्ञान केंद्र/ अनुसंधान संस्थान द्वारा जारी संदेशों/ परामर्श को ध्यान से पढ़ें। एल नीनो के दौरान खेतों में अंधाधुंध यूरिया डालने से बचें, क्योंकि पानी की कमी में ज्यादा यूरिया फसल को जला सकता है। पोटैशियम (पोटाश) का सही मात्रा में छिड़काव करें, यह पौधों को सूखे से लड़ने की ताकत देता है। मौसम चाहे जैसा भी हो, अगर तैयारी पक्की है, तो नुकसान कम से कम होगा और फसल भी लहलहाएगी।

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