भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना *एल नीनो लेख श्रृंखला*
*सूखा परिस्थितियों से निपटने हेतु वर्षा जल प्रबंधन*
*लेखकगण: पवनजीत, आरती कुमारी, आशुतोष उपाध्याय एवं अनुप दास*
सूखा प्रभावी क्षेत्रों में वर्षा जल प्रबंधन के लिए जल संरक्षण, जल के कुशल उपयोग तथा जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों का एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है। छतों पर वर्षा जल संचयन, तालाब, परकोलेशन टैंक तथा ग्राम स्तरीय जलाशयों के माध्यम से वर्षा जल का संग्रहण एवं भंडारण किया जा सकता है। जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन के अंतर्गत कंटूर बंडिंग, टेरेसिंग, वनस्पति अवरोध, चेक डैम तथा गली प्लगिंग जैसी संरचनाएँ सतही अपवाह को कम करती हैं और भूजल पुनर्भरण को बढ़ाती हैं। रिचार्ज पिट, रिचार्ज कुएँ, इंफिल्ट्रेशन ट्रेंच तथा रिचार्ज शाफ्ट भूजल भंडारों को पुनर्भरित करते हैं। ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई, डेफिसिट सिंचाई, प्रिसिजन सिंचाई तथा वैज्ञानिक सिंचाई अनुसूची जल उपयोग दक्षता को बढ़ाती हैं। मल्चिंग, संरक्षण जुताई, फसल अवशेष संरक्षण, कवर फसलें तथा उठी हुई क्यारियों का उपयोग मृदा नमी संरक्षण में सहायक होता है। सूखा-सहिष्णु एवं अल्पावधि वाली फसल किस्में, फसल विविधीकरण, अंतरवर्तीय खेती तथा मौसमी पूर्वानुमानों के अनुसार बुवाई के समय का समायोजन भी प्रभावी रणनीतियाँ हैं। बहुउद्देशीय जल उपयोग प्रणालियाँ सिंचाई, मत्स्य पालन तथा सतही एवं भूजल के संयुक्त उपयोग को प्रोत्साहित करती हैं। साथ ही, मौसमी पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, वास्तविक-समय पर सूखा निगरानी तथा सिंचाई निर्णय-सहायक प्रणालियाँ बेहतर तैयारी एवं अनुकूलन क्षमता प्रदान करती हैं।
वर्षा जल प्रबंधन तकनीकियाँ
सूखा प्रभावी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त जल संरक्षण आधारित उपायों का मुखय उद्देश्य वर्षा जल का संचयन, भूजल पुनर्भरण, मृदा नमी संरक्षण तथा सिंचाई हेतु जल की उपलब्धता बढ़ाना है। ये तकनीकियाँ वर्षा आधारित क्षेत्रों में जल सुरक्षा बढ़ाकर कृषि उत्पादन एवं किसानों की आय में सुधार करती हैं।
1. चेक डैम: चेक डैम बरसाती नालों में जल प्रवाह की गति को कम कर वर्षा जल का संचयन तथा भूजल पुनर्भरण बढ़ाता है। यह मृदा कटाव को रोकता है, आसपास के कुओं और हैंडपंपों के जल स्तर में सुधार करता है तथा रबी एवं ग्रीष्मकालीन फसलों के लिए सिंचाई जल उपलब्ध कराकर कृषि भूमि में नमी बनाए रखता है।
2. तालाब: तालाब वर्षा जल का संग्रहण कर आवश्यकतानुसार सिंचाई हेतु जल उपलब्ध कराता है। यह सूखे के दौरान फसलों को जीवनरक्षक सिंचाई प्रदान करता है, और साथ ही यह मत्स्य पालन एवं बहुउद्देशीय जल उपयोग को भी बढ़ावा देता है तथा ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के साथ जल उपयोग दक्षता में सुधार करता है।
3. परकोलेशन टैंक: परकोलेशन टैंक वर्षा जल को एकत्र कर धीरे-धीरे भूमि में समाहित करता है। इससे भूजल स्तर में सुधार होता है, कुओं नलकूपों में जल उपलब्धता बढ़ती है तथा सिंचाई और पेयजल के लिए दीर्घकालिक जल स्रोत सुनिश्चित होते हैं।
4. कंटूर बंड एवं ग्रेडेड बंड: ये संरचनाएँ ढाल वाली भूमि में वर्षा जल के बहाव को नियंत्रित कर मृदा एवं नमी का संरक्षण करती हैं। इससे वर्षा जल का अधिक अवशोषण होता है, मृदा अपरदन कम होता है, भूजल पुनर्भरण में सहायता मिलती है तथा वर्षा आधारित कृषि की उत्पादकता और स्थिरता में वृद्धि होती है।
5. रिचार्ज पिट एवं रिचार्ज कुआँ: रिचार्ज पिट एवं रिचार्ज कुआँ वर्षा जल को सीधे भूजल स्तर तक पहुँचाकर भूजल पुनर्भरण को बढ़ाते हैं। इससे बोरवेल एवं कुओं का जल स्तर सुधरता है, जल उपलब्धता बढ़ती है तथा सिंचाई और पेयजल के लिए दीर्घकालिक जल स्रोत विकसित होते हैं।
6. गली प्लग: गली प्लग छोटी जलधाराओं एवं गहरी गलियों में जल प्रवाह को नियंत्रित कर बहाव की गति कम करता है। इससे मृदा अपरदन घटता है, वर्षा जल का अधिक अवशोषण होता है, मिट्टी में नमी बनी रहती है तथा भूजल पुनर्भरण बढ़कर कृषि एवं पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
7. छत वर्षा जल संचयन: छतों से वर्षा जल एकत्र कर टैंकों में संग्रहित या रिचार्ज संरचनाओं के माध्यम से भूजल में पहुँचाया जाता है। इससे घरेलू उपयोग के लिए जल उपलब्ध होता है, भूजल पुनर्भरण बढ़ता है, जल संकट के समय राहत मिलती है तथा जल संसाधनों का सतत एवं कुशल प्रबंधन सुनिश्चित होता है।
8. सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर): यह प्रणाली कम जल में अधिक सिंचाई दक्षता प्रदान करती है। इससे 30–60% तक जल की बचत होती है, फसल उत्पादन एवं जल उत्पादकता बढ़ती है तथा उर्वरकों का कुशल उपयोग संभव होता है। परिणामस्वरूप लागत घटती है और कृषि की लाभप्रदता एवं जल उपयोग दक्षता में सुधार होता है।
9. मल्चिंग: मल्चिंग में मिट्टी की सतह को फसल अवशेषों या प्लास्टिक से ढका जाता है, जिससे वाष्पीकरण कम होता है और मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है। यह खरपतवार नियंत्रण, मृदा तापमान संतुलन, जल संरक्षण तथा फसल वृद्धि में सुधार कर सूखे के प्रभाव को कम करने में सहायक होती है।
10. रेज्ड और सनकेन बेड प्रणाली: यह प्रणाली अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त जल का प्रबंधन कर सूखे के समय सिंचाई हेतु जल उपलब्ध कराती है (चित्र 1)। रेज्ड बेड पर सब्जियाँ एवं दलहन तथा सनकेन बेड में धान और बहुजलअयामि फ़सल की खेती की जाती है। इससे जल संचयन, फसल विविधीकरण, बहुउद्देशीय खेती और किसानों की आय में वृद्धि होती है।
चित्र 1: रेज्ड और सनकेन बेड प्रणाली के साथ टपक सिंचाई प्रणाली
निष्कर्ष: इन संरचनाओं का समन्वित उपयोग सूखा प्रभावित क्षेत्रों में दीर्घकालिक जल सुरक्षा एवं टिकाऊ कृषि के लिए सबसे प्रभावी रणनीतियों में से एक माना जाता है।
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