दुनिया के प्रमुख जेन-जी आंदोलन - बदलता भारत, जागरूक युवा और लोकतंत्र की नई दिशा
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 01 अगस्त ::
हर पीढ़ी अपने समय की चुनौतियों के अनुरूप समाज और राजनीति को नई दिशा देने का प्रयास करती है। स्वतंत्रता संग्राम की पीढ़ी ने आजादी का सपना साकार किया, उसके बाद की पीढ़ियों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने और आर्थिक विकास की नींव रखने में योगदान दिया। अब दुनिया जिस पीढ़ी की ओर सबसे अधिक उम्मीद से देख रही है, वह है जेनरेशन-ज़ेड (Generation Z या Gen-Z)। लगभग 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं की यह पीढ़ी डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक संपर्क के युग में पली-बढ़ी है। इनके सोचने, संवाद करने और अपनी बात रखने के तरीके पहले की पीढ़ियों से काफी अलग हैं।
दुनिया के अनेक देशों में बीते कुछ वर्षों के दौरान जेन-जी के नेतृत्व में बड़े आंदोलन देखने को मिले। इन आंदोलनों ने शिक्षा, रोजगार, जलवायु परिवर्तन, लोकतांत्रिक अधिकार, सामाजिक न्याय और सरकारी नीतियों जैसे विषयों को वैश्विक बहस का हिस्सा बनाया। कई स्थानों पर इन आंदोलनों ने सरकारों को अपने फैसले बदलने पर मजबूर किया, तो कई जगह आंदोलन हिंसा, आगजनी, पुलिस कार्रवाई और व्यापक सामाजिक तनाव में भी बदल गए।
भारत भी इस वैश्विक परिवर्तन से अछूता नहीं है। यहां भी युवाओं ने विभिन्न मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद की है। हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और पारदर्शिता की मांग ने लाखों युवाओं को एक साझा मंच पर ला खड़ा किया। लेकिन भारत के कुछ आंदोलनों ने एक अलग उदाहरण भी प्रस्तुत किया, जहां विरोध के साथ अनुशासन, रचनात्मकता और लोकतांत्रिक मर्यादा को बनाए रखने का प्रयास दिखाई दिया। जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन इसी संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे।
भारत विश्व का सबसे युवा देशों में से एक है। देश की बड़ी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय स्थिति भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाएं, समय पर रोजगार और समान अवसर मिले तो यही शक्ति देश के विकास की सबसे बड़ी आधारशिला बन सकती है। लेकिन जब युवाओं को लगे कि उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल रहा, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं या भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक लंबित रहती हैं, तब असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। लोकतंत्र में इस असंतोष को शांतिपूर्ण ढंग से व्यक्त करना नागरिकों का अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी। आज का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता है, बल्कि वह पारदर्शिता, जवाबदेही और समान अवसर की भी मांग करता है। वह सरकारों से यह अपेक्षा करता है कि नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और प्रतिभा के आधार पर चयन सुनिश्चित किया जाए।
जेन-जी को अक्सर "डिजिटल नेटिव" कहा जाता है। यह वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को अपने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा माना है। सूचना तक तत्काल पहुंच ने इनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है। आज किसी भी घटना की जानकारी कुछ ही मिनटों में देश-दुनिया तक पहुंच जाती है। छात्र संगठन, सामाजिक समूह और नागरिक मंच सोशल मीडिया के माध्यम से तेजी से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। यही कारण है कि किसी भी परीक्षा में गड़बड़ी, प्रश्नपत्र लीक या भर्ती में अनियमितता की खबर कुछ ही समय में राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाती है। हालांकि डिजिटल माध्यम अवसर प्रदान करते हैं, लेकिन इनके साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। अपुष्ट सूचनाएं, अफवाहें और भ्रामक सामग्री कभी-कभी तनाव बढ़ा सकती हैं। इसलिए डिजिटल साक्षरता और तथ्य आधारित संवाद पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत में हर वर्ष करोड़ों युवा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हैं। इनमें केंद्रीय और राज्य स्तरीय सेवाओं, बैंकिंग, रेलवे, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, विश्वविद्यालयों तथा अन्य सरकारी नौकरियों से संबंधित परीक्षाएं शामिल होती हैं। इन परीक्षाओं के साथ लाखों परिवारों की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। अनेक अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं, आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हैं और अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास करते हैं। ऐसे में यदि किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो जाए या परीक्षा रद्द करनी पड़े तो इसका सबसे बड़ा नुकसान ईमानदारी से तैयारी करने वाले छात्रों को होता है। पेपर लीक केवल परीक्षा की समस्या नहीं है, यह सामाजिक विश्वास, प्रशासनिक क्षमता और न्याय की भावना से भी जुड़ा विषय है। यही कारण है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार आज राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुका है।
किसी भी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होना केवल कानूनी अपराध नहीं है। यह लाखों मेहनती छात्रों के आत्मविश्वास और भरोसे को प्रभावित करता है। जब किसी परीक्षा को रद्द करना पड़ता है, तब छात्रों का समय, धन और मानसिक ऊर्जा तीनों प्रभावित होते हैं। पेपर लीक के दुष्परिणाम कई स्तरों पर दिखाई देते हैं- योग्य अभ्यर्थियों के साथ अन्याय की भावना। सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न। भर्ती प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब। छात्रों पर मानसिक और आर्थिक दबाव। समाज में भ्रष्टाचार के प्रति निराशा का वातावरण। इसलिए परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित और पारदर्शी बनाना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।
पिछले कुछ समय में सरकार ने परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण पहल तकनीक आधारित परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में की गई है। सरकार ने परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और आधुनिक बनाने के लिए विशेषज्ञों का एक उच्चस्तरीय कार्यबल गठित किया है। इस समिति का उद्देश्य ऐसी तकनीकी व्यवस्था विकसित करने के सुझाव देना है जिससे प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, डेटा संरक्षण और परीक्षा संचालन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। इस कार्यबल में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका तथा आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामकोटी जैसे अनुभवी विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं। इन विशेषज्ञों का अनुभव तकनीकी सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और उच्च शिक्षा, तीनों क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही, सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए कठोर कानूनी प्रावधान तथा त्वरित न्यायिक प्रक्रिया की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परीक्षा में धोखाधड़ी करने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई हो और ईमानदार अभ्यर्थियों का विश्वास बना रहे।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नागरिक सरकार की नीतियों से असहमति व्यक्त कर सकते हैं। संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार प्रदान करता है। लेकिन इस अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। जब आंदोलन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, हिंसा फैलाने या सामान्य जनजीवन को बाधित करने लगते हैं, तब उनका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। इसके विपरीत, यदि आंदोलन शांतिपूर्ण, अनुशासित और रचनात्मक तरीके से अपनी बात रखते हैं, तो वे समाज में व्यापक समर्थन प्राप्त कर सकते हैं। भारत में हाल के कुछ छात्र आंदोलनों ने इसी दिशा में एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया, जहां विरोध के साथ स्वच्छता, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और लोकतांत्रिक अनुशासन पर भी बल दिया गया।
भारत में परीक्षा सुधार केवल तकनीकी बदलाव का विषय नहीं है। यह युवाओं के विश्वास, प्रशासनिक पारदर्शिता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से जुड़ा व्यापक प्रश्न है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई तकनीक, कठोर कानून और संस्थागत सुधार किस प्रकार परीक्षा प्रणाली को अधिक विश्वसनीय बनाते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर देशभर में गंभीर चर्चा हुई है। कई परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने, परीक्षा रद्द होने और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी जैसी घटनाओं ने लाखों युवाओं के मन में चिंता पैदा की। वर्षों की मेहनत के बाद जब किसी परीक्षा को रद्द करना पड़ता है, तब केवल एक परीक्षा नहीं टलती, बल्कि लाखों अभ्यर्थियों के सपने, योजनाएं और भविष्य की समय-सीमा भी प्रभावित होती है।
पेपर लीक किसी एक राज्य या किसी एक परीक्षा तक सीमित समस्या नहीं रही। समय-समय पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र समय से पहले बाहर आने या संगठित गिरोहों द्वारा परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप सामने आते रहे हैं। ऐसी घटनाओं के पीछे कई कारण माने जाते हैं- प्रश्नपत्रों के मुद्रण और वितरण की पारंपरिक व्यवस्था में सुरक्षा संबंधी कमजोरियां। परीक्षा संचालन में शामिल विभिन्न स्तरों पर मानवीय हस्तक्षेप। संगठित आपराधिक गिरोहों की सक्रियता। डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग। कुछ मामलों में भ्रष्टाचार और मिलीभगत। इन कारणों से स्पष्ट हुआ कि केवल प्रशासनिक सतर्कता पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली को आधुनिक तकनीक के अनुरूप पुनर्गठित करना आवश्यक है।
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के बाद दुनिया भर में युवाओं की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी तेजी से बढ़ी है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और वैश्विक संपर्क ने युवाओं को स्थानीय मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने का अवसर दिया। परिणामस्वरूप अनेक देशों में जेन-जी के नेतृत्व वाले आंदोलन सामने आए। इन आंदोलनों के उद्देश्य अलग-अलग थे, लेकिन उनमें एक समानता थी- युवाओं ने अपने भविष्य, अधिकारों और अवसरों को लेकर खुलकर आवाज उठाई। हालांकि इन आंदोलनों का स्वरूप एक जैसा नहीं रहा। कहीं वे शांतिपूर्ण रहे, तो कहीं हिंसा, आगजनी और पुलिस कार्रवाई के कारण व्यापक विवाद का विषय बने। भारत में परीक्षा प्रणाली और युवाओं से जुड़े आंदोलनों को समझने के लिए इन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का अध्ययन उपयोगी है।
वर्ष 2023 में फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पेंशन सुधार नीति के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। सरकार द्वारा सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने के प्रस्ताव का श्रमिक संगठनों और युवाओं ने विरोध किया। इसी वर्ष 17 वर्षीय नाहेल की पुलिस गोलीबारी में मृत्यु के बाद स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई। बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए। कई शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए। घटनाओं के दौरान हजारों वाहनों में आग लगा दी गई। सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचा। दुकानों में तोड़फोड़ हुई। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई दिनों तक झड़पें होती रही। बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया। इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि लोकतांत्रिक विरोध और हिंसा के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
2019 में चिली की राजधानी सैंटियागो में मेट्रो किराए में मामूली वृद्धि की घोषणा हुई। शुरुआत में छात्रों ने इसका विरोध किया, लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन आर्थिक असमानता, सामाजिक न्याय और सरकारी नीतियों के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन में बदल गया। प्रदर्शनों के दौरान अनेक मेट्रो स्टेशनों को आग लगा दी गई। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था प्रभावित हुई। सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा। हिंसा और झड़पों में कई लोगों की मृत्यु हुई। राष्ट्रीय स्तर पर आपातकाल जैसी स्थिति बनी। यह आंदोलन इस बात का उदाहरण है कि यदि समय रहते संवाद स्थापित न हो, तो सीमित मुद्दा भी व्यापक सामाजिक असंतोष का रूप ले सकता है।
2019 में हांगकांग में प्रत्यर्पण विधेयक के विरोध में छात्रों और युवाओं ने बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया। शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे, लेकिन समय के साथ स्थिति जटिल होती गई। कई स्थानों पर बैरिकेड लगाए गए। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संघर्ष हुआ। पेट्रोल बम फेंके गए। सार्वजनिक परिवहन बाधित हुआ। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने दुनिया का ध्यान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन की ओर आकर्षित किया।
2024 में गाजा युद्ध के संदर्भ में अमेरिका के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, जैसे हार्वर्ड, कोलंबिया और यूसीएलए में छात्रों ने प्रदर्शन किए। इन आंदोलनों की विशेषता यह रही कि अधिकांश स्थानों पर छात्रों ने शांतिपूर्ण धरना, चर्चा और प्रतीकात्मक प्रदर्शन का मार्ग अपनाया। हालांकि कुछ परिसरों में पुलिस हस्तक्षेप हुआ। प्रदर्शनकारियों को हटाया गया। गिरफ्तारियां हुईं। प्रशासन और छात्रों के बीच तनाव बढ़ा। इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि लोकतांत्रिक देशों में भी विश्वविद्यालय परिसर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के महत्वपूर्ण केंद्र बने हुए हैं।
2024 में बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था के विरोध में छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ। प्रारंभिक विरोध धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक संकट का रूप लेने लगा। कई शहरों में आगजनी हुई। सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचा। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक संघर्ष हुए। सैकड़ों लोगों की मृत्यु की खबरें सामने आईं। इंटरनेट सेवाएं कई दिनों तक बाधित रही। इस आंदोलन ने यह दिखाया कि यदि असंतोष और प्रशासनिक प्रतिक्रिया के बीच संतुलन न बने, तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है।
2024–25 के दौरान नेपाल के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षा सुधार, भ्रष्टाचार और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों पर छात्रों ने कई चरणों में प्रदर्शन किए। अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ स्थानों पर पुलिस और छात्रों के बीच झड़पें हुईं। पथराव की घटनाएं सामने आईं। बल प्रयोग करना पड़ा। नेपाल का अनुभव बताता है कि लगातार संवाद और संस्थागत सुधार से अधिकांश आंदोलनों को शांतिपूर्ण दिशा दी जा सकती है।
2022 में श्रीलंका गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। ईंधन, खाद्यान्न और दवाओं की कमी ने आम नागरिकों का जीवन प्रभावित कर दिया। बड़ी संख्या में युवाओं ने 'अरगलया' आंदोलन में भाग लिया। शुरुआत में आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था। बाद के चरण में प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन में प्रवेश किया। कुछ सरकारी परिसरों पर कब्जा किया गया। कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं हुईं। यह आंदोलन बताता है कि लंबे आर्थिक संकट सामाजिक असंतोष को किस प्रकार व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदल सकते हैं।
जर्मनी में जेन-जी ने जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास जैसे मुद्दों पर व्यापक अभियान चलाए। इन आंदोलनों की प्रमुख विशेषताएं थी शांतिपूर्ण मार्च। जनजागरूकता अभियान। विद्यालय और विश्वविद्यालय आधारित कार्यक्रम। नीति-निर्माताओं से संवाद। हालांकि कुछ अवसरों पर सड़क जाम और पुलिस के साथ सीमित तनाव भी देखने को मिला।
ब्रिटेन में भी युवाओं ने जलवायु परिवर्तन, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर अनेक प्रदर्शन किए। अधिकांश कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहे। कुछ अवसरों पर सड़क अवरोध। यातायात प्रभावित होना। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को हटाना जैसी घटनाएं सामने आईं। फिर भी अधिकांश आंदोलनों में संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्राथमिकता दी गई।
इन सभी उदाहरणों का अध्ययन कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने लाता है, आज का युवा पहले की तुलना में अधिक जागरूक, तकनीकी रूप से सक्षम और संगठित है। उसकी अपेक्षाएं केवल रोजगार तक सीमित नहीं हैं; वह पारदर्शिता, समान अवसर और जवाबदेही भी चाहता है। जहां सरकारों ने समय रहते संवाद किया, वहां तनाव अपेक्षाकृत कम रहा। जहां संवाद कमजोर पड़ा, वहां कई आंदोलन हिंसक दिशा में बढ़ गए। जब सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है या हिंसा होती है, तब मूल मुद्दे की बजाय कानून-व्यवस्था चर्चा का केंद्र बन
दुनिया के जेन-जी आंदोलनों से यह स्पष्ट होता है कि आज की युवा पीढ़ी अपने अधिकारों, भविष्य और लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग है। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसकी मांगों पर नहीं, बल्कि उसके तरीकों पर भी निर्भर करती है। जहां संवाद, अनुशासन और लोकतांत्रिक मर्यादा बनी रही, वहां आंदोलनों ने अधिक सकारात्मक प्रभाव छोड़ा। वहीं, जहां हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा, वहां मूल मुद्दे कई बार पीछे छूट गए।
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