अध्यात्म, भौतिकता और स्वार्थ का चक्रव्यूह

अध्यात्म, भौतिकता और स्वार्थ का चक्रव्यूह

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 16 जुलाई ::
 
मानव जीवन सदियों से दो प्रमुख धाराओं के बीच संतुलन खोजने का प्रयास करता रहा है- अध्यात्म और भौतिकता। एक ओर अध्यात्म है, जो मनुष्य को आत्मबोध, नैतिकता, करुणा, संयम और जीवन के गहरे अर्थ की ओर ले जाता है; दूसरी ओर भौतिकता है, जो जीवन की आवश्यकताओं, सुविधाओं, विज्ञान, तकनीक, आर्थिक प्रगति और सामाजिक विकास का आधार बनती है। सामान्यतः इन दोनों को एक-दूसरे का विरोधी माना जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों जीवन के पूरक पक्ष हैं।

अध्यात्म दिशा देता है और भौतिकता साधन। दिशा के बिना साधन विनाश का कारण बन सकते हैं और साधनों के बिना दिशा केवल कल्पना बनकर रह जाती है। इसलिए आदर्श स्थिति वही है जहाँ अध्यात्म और भौतिकता के बीच संतुलन स्थापित हो। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब इस संतुलन के बीच स्वार्थ, सत्ता, राजनीति, कट्टरता और वर्चस्व की मानसिकता प्रवेश कर जाती है। तब अध्यात्म आस्था से अधिक पहचान का हथियार बन जाता है और भौतिकता विकास से अधिक प्रभुत्व का माध्यम।

हाल के वर्षों में देश में घटित अनेक घटनाएँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि जब अध्यात्म और भौतिकता के बीच स्वार्थ का हस्तक्षेप होता है, तब समाज में तनाव, विभाजन और हिंसा की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। न्यायालयों में चल रहे अनेक विवाद, धार्मिक स्थलों को लेकर संघर्ष, सांप्रदायिक घटनाएँ और राजनीतिक ध्रुवीकरण इसी जटिल प्रक्रिया के परिणाम हैं।

अध्यात्म शब्द का अर्थ केवल पूजा-पाठ, मंदिर, मस्जिद, तीर्थयात्रा या धार्मिक कर्मकांड नहीं है। भारतीय दर्शन में अध्यात्म का मूल अर्थ है आत्मा का अध्ययन, स्वयं को जानना और जीवन के अंतिम सत्य की खोज। उपनिषदों में कहा गया है कि “आत्मानं विद्धि” अर्थात स्वयं को जानो।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अनियंत्रित मन है और सबसे बड़ा मित्र भी वही मन है यदि वह संयमित हो। अध्यात्म व्यक्ति को सिखाता है कि क्रोध पर नियंत्रण रखो। लोभ से दूर रहो। दूसरों के प्रति करुणा रखो। सत्य और न्याय का अनुसरण करो। अहंकार का त्याग करो। यदि इन मूल्यों को समाज में व्यापक रूप से अपनाया जाए तो हिंसा, घृणा और संघर्ष की संभावनाएँ स्वतः कम हो जाएँगी।

भौतिकता को अक्सर नकारात्मक रूप में देखा जाता है, जबकि ऐसा नहीं है। भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, परिवहन, तकनीक और आर्थिक समृद्धि, ये सभी भौतिक जीवन के अंग हैं। यदि अध्यात्म आत्मा की आवश्यकता है तो भौतिकता शरीर की आवश्यकता है। भूखे व्यक्ति को दर्शन नहीं, भोजन चाहिए। बीमार व्यक्ति को केवल उपदेश नहीं, दवा भी चाहिए। इसलिए भौतिक विकास को नकारा नहीं जा सकता।

भारत की प्राचीन परंपरा भी चार पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, की बात करती है। यहाँ अर्थ को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है जितना धर्म को। समस्या भौतिकता में नहीं, बल्कि अनियंत्रित भोगवाद में है। जब साधन लक्ष्य बन जाते हैं और नैतिकता पीछे छूट जाती है, तब संकट उत्पन्न होता है।

मानव सभ्यता का इतिहास इस संतुलन की खोज का इतिहास है। भगवान बुद्ध ने अत्यधिक भोग और अत्यधिक तपस्या दोनों को अस्वीकार करते हुए मध्यम मार्ग का सिद्धांत दिया। महात्मा गांधी ने आधुनिक विकास को नैतिक मूल्यों से जोड़ने की बात कही। स्वामी विवेकानंद ने कहा कि गरीब और भूखे व्यक्ति के लिए रोटी ही ईश्वर है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने विज्ञान और आध्यात्मिकता के समन्वय की आवश्यकता बताई। इन सभी विचारकों का निष्कर्ष एक ही था कि जीवन में साधन और मूल्य दोनों आवश्यक हैं।

धर्म और अध्यात्म का उद्देश्य मनुष्य को जोड़ना है, लेकिन इतिहास गवाह है कि अनेक बार इन्हीं के नाम पर समाज को बाँटा भी गया है। जब धर्म आस्था से अधिक पहचान बन जाता है, तब संघर्ष शुरू होता है। जब पूजा का स्थान राजनीति का मंच बन जाता है, तब अध्यात्म कमजोर पड़ जाता है। जब धार्मिक प्रतीकों का उपयोग वोट बैंक के लिए किया जाता है, तब धर्म का मूल उद्देश्य खो जाता है। यहीं से स्वार्थ का प्रवेश होता है। स्वार्थ व्यक्ति को यह विश्वास दिलाता है कि उसकी पहचान, उसका समूह या उसका समुदाय दूसरों से श्रेष्ठ है। यह भावना धीरे-धीरे कट्टरता और फिर संघर्ष में बदल जाती है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति का उद्देश्य समाज को संगठित करना और विकास के लिए नीतियाँ बनाना है। लेकिन जब राजनीति धार्मिक पहचान के आधार पर समर्थन जुटाने लगती है, तब सामाजिक संतुलन प्रभावित होने लगता है। धार्मिक मुद्दे अचानक चुनावी मुद्दे बन जाते हैं। आस्था और इतिहास की बहसें राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखी जाने लगती हैं। परिणामस्वरूप समाज में अविश्वास बढ़ता है।

वर्ष 2020 के दिल्ली दंगे आधुनिक भारत के सबसे दुखद अध्यायों में गिने जाते हैं। इन दंगों में अनेक लोगों की जान गई, संपत्तियाँ नष्ट हुईं और सामाजिक विश्वास को गहरी चोट पहुँची। इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या विशेष रूप से चर्चा का विषय बनी। न्यायालय के निर्णय में जिन परिस्थितियों और तथ्यों का उल्लेख किया गया, उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि भीड़ की मनोवृत्ति किस प्रकार सामान्य असहमति से आगे बढ़कर लक्षित हिंसा में बदल जाती है।

यह घटना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक थी जिसमें मनुष्य दूसरे मनुष्य को उसकी पहचान के आधार पर देखने लगता है। जब भीड़ का विवेक समाप्त हो जाता है, तब अध्यात्म मर जाता है। जब मनुष्य दूसरे मनुष्य को शत्रु समझने लगता है, तब मानवता हार जाती है। ऐसी घटनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर मानवता को प्राथमिकता देना कितना आवश्यक है।

भीड़ में व्यक्ति अक्सर अपनी व्यक्तिगत नैतिकता खो देता है। जिस व्यक्ति से अकेले में हिंसा की अपेक्षा नहीं की जा सकती, वही व्यक्ति भीड़ का हिस्सा बनकर हिंसक हो सकता है। इसके पीछे कई कारण होते हैं। सामूहिक उत्तेजना। अफवाहें। पहचान आधारित ध्रुवीकरण। राजनीतिक उकसावे और प्रतिशोध की भावना। अध्यात्म व्यक्ति को आत्मनियंत्रण सिखाता है, जबकि भीड़ व्यक्ति से उसका आत्मनियंत्रण छीन लेती है।

भोजशाला का विवाद लंबे समय से इतिहास, पुरातत्व, धार्मिक आस्था और कानूनी प्रक्रिया के बीच चर्चा का विषय रहा है। एक पक्ष इसे माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे धार्मिक उपयोग के अपने अधिकारों से जोड़कर देखता है। न्यायालयों का दायित्व ऐतिहासिक साक्ष्यों, संवैधानिक अधिकारों और विधिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय देना होता है। ऐसे मामलों में न्यायालय का कार्य किसी धर्म का पक्ष लेना नहीं, बल्कि संविधान का पालन करना होता है। इसी कारण से कई बार न्यायिक निर्णय विभिन्न पक्षों को अलग-अलग दृष्टिकोण से संतोषजनक या असंतोषजनक लग सकते हैं।

लोकतंत्र में आस्था का सम्मान आवश्यक है, लेकिन कानून का शासन उससे भी अधिक आवश्यक है। यदि प्रत्येक विवाद केवल भावनाओं के आधार पर तय होने लगे, तो न्याय व्यवस्था अस्थिर हो जाएगी। दूसरी ओर यदि आस्था और सांस्कृतिक संवेदनाओं की पूर्ण उपेक्षा की जाए, तो समाज में असंतोष बढ़ सकता है। इसलिए न्यायपालिका को अत्यंत संतुलित भूमिका निभानी पड़ती है।

विदेशों में संरक्षित भारतीय मूर्तियों और पुरावशेषों की वापसी केवल धार्मिक विषय नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रश्न भी है। भारत की प्राचीन मूर्तियाँ केवल पत्थर की कलाकृतियाँ नहीं हैं, वे हमारी सभ्यता, कला, दर्शन और इतिहास की जीवित स्मृतियाँ हैं। जब कोई प्रतिमा विदेश से वापस आती है, तब वह केवल एक वस्तु नहीं लौटती बल्कि राष्ट्रीय स्मृति का एक हिस्सा पुनः अपने घर लौटता है।

दिल्ली दंगे हो, धार्मिक विवाद हो या सांस्कृतिक विरासत से जुड़े प्रश्न। इन सबमें यदि कोई समान तत्व दिखाई देता है तो वह है स्वार्थ। स्वार्थ कई रूपों में सामने आता है- राजनीतिक स्वार्थ।सामुदायिक स्वार्थ। वैचारिक स्वार्थ। आर्थिक स्वार्थ। व्यक्तिगत स्वार्थ। यही स्वार्थ अध्यात्म को पहचान की राजनीति में बदल देता है और भौतिकता को वर्चस्व की दौड़ में।

आज मानव इतिहास तकनीकी दृष्टि से सबसे उन्नत दौर में है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल अर्थव्यवस्था, चिकित्सा विज्ञान और वैश्विक संचार ने जीवन को बदल दिया है। लेकिन इसके साथ ही मानसिक तनाव बढ़ा है। सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। धार्मिक कट्टरता बढ़ी है। सूचना युद्ध बढ़ा है। इसका कारण यह है कि भौतिक विकास की गति अध्यात्मिक परिपक्वता से कहीं अधिक तेज रही है।

भारतीय संस्कृति सदैव समन्वय की संस्कृति रही है। यहाँ शंकराचार्य का अद्वैत भी है, बुद्ध का मध्यम मार्ग भी है, महावीर की अहिंसा भी है, गुरु नानक का मानवतावाद भी है और कबीर का निर्भीक सत्य भी। इन सभी परंपराओं का संदेश एक ही है “मनुष्य पहले मनुष्य है, उसके बाद कुछ और”।

यदि समाज को स्वार्थ और कट्टरता से बचाना है तो शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का साधन बनाना होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नैतिक शिक्षा, संवैधानिक मूल्य, सहिष्णुता, संवाद की संस्कृति, आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा देना आवश्यक है।

मीडिया समाज का दर्पण माना जाता है। यदि मीडिया संतुलित, तथ्यपरक और जिम्मेदार होगा तो समाज में विश्वास बढ़ेगा। यदि मीडिया सनसनी, ध्रुवीकरण और भावनात्मक उत्तेजना को बढ़ावा देगा तो सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। सोशल मीडिया के युग में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

लोकतंत्र में न्यायपालिका अंतिम आशा का केंद्र होती है। उसका दायित्व केवल विवादों का समाधान करना नहीं है, बल्कि संविधान की आत्मा की रक्षा करना भी है। न्यायालयों के निर्णयों से असहमति हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान आवश्यक है।

मानव जीवन में अध्यात्म और भौतिकता दोनों आवश्यक हैं। अध्यात्म हमें दिशा देता है, जबकि भौतिकता हमें साधन प्रदान करती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन दोनों के बीच स्वार्थ, कट्टरता और सत्ता की राजनीति प्रवेश कर जाती है। दिल्ली दंगों जैसी घटनाएँ और धार्मिक-सांस्कृतिक विवाद हमें यह स्मरण कराते हैं कि यदि मनुष्य अपने भीतर की करुणा, विवेक और नैतिकता को खो देगा तो कोई भी भौतिक उपलब्धि उसे शांति नहीं दे सकेगी। वास्तविक प्रगति वही है जहाँ विकास के साथ संवेदना हो, आस्था के साथ सहिष्णुता हो, कानून के साथ न्याय हो और शक्ति के साथ जिम्मेदारी हो।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि अध्यात्म और भौतिकता में से किसी एक को चुना जाए, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि दोनों के बीच ऐसा संतुलन स्थापित किया जाए जिसमें मानवता सर्वोच्च मूल्य बनकर उभरे। जब साधन और दिशा एक साथ चलते हैं, तभी सभ्यता आगे बढ़ती है। लेकिन जब उनके बीच स्वार्थ का अंधकार प्रवेश कर जाता है, तब वही सभ्यता संघर्ष, विभाजन और अविश्वास के दलदल में फँस जाती है। इसलिए भविष्य का भारत और भविष्य का विश्व तभी सुरक्षित होगा जब अध्यात्म की करुणा और भौतिकता की प्रगति मिलकर मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें।
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