धान की कम अवधि और सूखा-रोधी किस्मों का चयन: अल नीनो के दुष्प्रभाव को कम करने में प्रभावी रणनीति

धान की कम अवधि और सूखा-रोधी किस्मों का चयन: अल नीनो के दुष्प्रभाव को कम करने में प्रभावी रणनीति


इस वर्ष वैश्विक स्तर पर 'अल नीनो' परिघटना सक्रिय है। इसका सीधा असर हमारे मानसून पर पड़ता है, परिणामस्वरूप मानसून के आगमन में बदलाव, सामान्य से कम वर्षा होना या लंबे समय तक सूखा रहने की आशंका बढ़ जाती है। भारत में खेती मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। ऐसे में पारंपरिक लंबी अवधि वाली फसलें लगाने से अच्छी उपज न मिल पाने, फसल के सूखने अथवा नष्ट होने का संकट बना रहता है। इस गंभीर चुनौती से निपटने का सबसे सटीक और वैज्ञानिक तरीका है—कम अवधि और सूखा-रोधी किस्मों का चयन। चूंकि धान इस क्षेत्र की मुख्य खरीफ फसल है, इसलिए पारंपरिक बीजों की जगह क्षेत्र विशेष के अनुसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद या कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित इन किस्मों को अपनाएं: 
किस्म का नाम अवधि (दिन) संभावित उपज (टन/हेक्टेयर) खेती के लिए अनुकूल भूमि खेती के लिए अनुशंसित राज्य
वंदना 95-100 3.5-4.5 वर्षा आधारित ऊपरी भूमि झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़
अंजलि 90-95 3.5-4.0 वर्षा आधारित ऊपरी भूमि बिहार, ओडिशा, झारखंड, असम और छत्तीसगढ़
शुष्क सम्राट 110-115 3.5-4.0 वर्षा आधारित ऊपरी भूमि & मध्यम निचली भूमि पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और ओडिशा
सहभागी धान 110-115 4.0-4.5 वर्षा आधारित ऊपरी भूमि & मध्यम निचली भूमि ओडिशा, बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल
डीआरआर धान 42 
115-120 4.5-5.0 वर्षा आधारित मध्यम या ऊपरी भूमि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड
सबौर हर्षित धान 120-125 4.5-5.0 वर्षा आधारित मध्यम या ऊपरी भूमि बिहार
स्वर्ण श्रेया 115-120 4.0-4.5 वर्षा आधारित मध्यम निचली भूमि और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्र (एरोबिक स्थिति) छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और बिहार
स्वर्ण शक्ति धान 115-120 4.5-5.0 सीमित सिंचाई वाले क्षेत्र (एरोबिक पारिस्थितिकी) बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र
स्वर्ण सूखा धान 110-115 3.5-4.0 वर्षा आधारित ऊपरी और मध्यम निचली भूमि उत्तर प्रदेश और झारखंड
स्वर्ण पूर्वी धान 1 115-120 4.5-5.0 सीमित सिंचाई वाले क्षेत्र (एरोबिक पारिस्थितिकी) झारखंड
स्वर्ण पूर्वी धान 4 115-120 4.5-5.0 सीमित सिंचाई वाले क्षेत्र (एरोबिक पारिस्थितिकी) बिहार, झारखंड, गुजरात और हरियाणा
स्वर्ण पूर्वी धान 5 110-115 4.0-4.5 वर्षा आधारित ऊपरी और मध्यम निचली भूमि बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल
सी.आर. धान 808 90-95 3.5-4.0 सीधे बोई गई फसल और सूखा बिहार, झारखंड
बिरसा विकास धान 110 95 3.0-3.5 वर्षा आधारित क्षेत्र झारखंड
बिरसा धान-108 70 5.0-5.2 वर्षा आधारित क्षेत्र झारखंड
तुरंता धान 70-75 2.0 - 3.0 वर्षा आधारित क्षेत्र बिहार
डीआरआर 44  
115-120 4.9 वर्षा आधारित और सिंचित निचली भूमि बिहार, हरियाणा, उत्तराखंड 
सी.आर. धान 40 90-100 3.0-3.5 असिंचित ऊंची जमीन (सीधी बुवाई) झारखंड
हजारी धान 115-120 3.0-3.5 असिंचित एवं नीची मध्यम जमीन झारखंड
एन.डी.आर.97 105-110 2.5-3.0 असिंचित ऊंची एवं नीची जमीन उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल  
एन.डी.आर.118 95-100 2.5-3.0 असिंचित ऊंची एवं नीची जमीन उत्तर प्रदेश, बिहार
बिरसा धान-109 85-90 2.5-3.0 असिंचित ऊंची जमीन झारखंड

अल नीनो के इस वैश्विक चुनौतीपूर्ण समय में धान की कम अवधि एवं सूखा रोधी किस्मों का चयन और वैज्ञानिक सूझबूझ ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच हैं। यह किस्में न केवल पानी बचाएंगी, बल्कि उत्पादन भी अच्छा देंगी और साथ ही रबी की फसलों जैसे गेहूं, चना या सरसों की समय पर बुआई का मौका भी देंगी। किसान इन प्रजातियों के बीजों को निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र/ अनुसंधान संस्थान/ विश्वविधालय/ राज्य सरकार से संपर्क कर प्राप्त कर सकते हैं।

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