अल नीनो के दुष्प्रभाव को कम करने में धान की सीधी बुवाई सहायक
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, इस वर्ष 'अल नीनो' भारतीय कृषि, विशेषकर खरीफ के मौसम के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अल नीनो के प्रभाव से मानसून के आगमन में देरी, असमान वर्षा एवं सूखे जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं, जिसका सीधा असर धान की पारंपरिक खेती पर पड़ता है। पारंपरिक विधि (कदवा अथवा रोपाई) में, धान की खेती के लिए पहले नर्सरी तैयार की जाती है और फिर मुख्य खेत में पानी भरकर 20-25 दिन के पौधों की रोपाई की जाती है। इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में पानी खर्च होता है। इस प्रकार की खेती में कम वर्षा होने की स्थिति में धान की फसल की लागत बढ़ने और उत्पादकता घटने का संकट बना रहता है। इसके विपरीत, धान की सीधी बुवाई (Direct Seeded Rice-DSR) तकनीक में बिना नर्सरी और बिना कदवा किए, सीधे मशीन (फसल अवशेष होने पर हैप्पी सीडर, रोटरी डिस्क ड्रिल, डबल डिस्क कोल्टार तथा स्टार व्हील एवं साफ खेतों में जीरो टिल ड्रिल या मल्टीक्रॉप जीरो टिल ड्रिल) द्वारा खेतों में पर्याप्त नमी होने पर बीजों की बुवाई कर दी जाती है। अल नीनो के दौरान, मानसूनी वर्षा की अनिश्चितता के चलते, जब जलाशयों और भूजल का स्तर नीचे चला जाता है, तब डीएसआर विधि धान की खेती को जीवनदान देने में सक्षम है। इस विधि में धान की उपज में कोई कमी नहीं आती, कादो न करने के कारण रोपनी का खर्च भी बच जाता है, भूमि खराब होने की नौबत भी नहीं आती और रबी की फसल भी अच्छी होती है। खेत में समय पर बुवाई होने से धान की पैदावार भी अच्छी होती है।
अल नीनो के खिलाफ डीएसआर एक प्रभावी ढाल: बलुई-दोमट मिट्टी से लेकर भारी चिकनी-मिट्टी में जहाँ पर भी धान की रोपाई की जाती है, वहां धान की सीधी बुवाई की जा सकती है। सामान्यत: धान की सीधी बुआई का उपयुक्त समय 15 से 30 जून तक होता है परंतु मानसूनी वर्षा में देरी होने पर इस विधि को 15 जुलाई तक भी अपनाया जा सकता है। सीधी बुवाई वाले धान में 80-120 किलोग्राम नेत्रजन, 40-60 किलोग्राम फोस्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। नेत्रजन की एक तिहाई तथा फोस्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा बुआई के समय ही प्रयोग करना चाहिए। चंकिू पोटाश मशीन के पाइप में चिपक सकता है इसलिए म्यूरेट ऑफ पोटाश को बुवाई के पहले खेत में छींट दें। नेत्रजन की शेष मात्रा को दो बराबर भागों में कल्ले फूटते समय एवं बाली निकलते समय प्रयोग करना चाहिए। इस विधि से उगाई गई अच्छी किस्में लगभग 40-50 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज देती हैं। यह तकनीक मुख्य रूप से चार तरीकों से अल-नीनो के प्रतिकूल प्रभावों को बेअसर करती है:
• जल की भारी बचत (30-40% तक): डीएसआर में शुरुआती 30-35 दिनों तक खेत में पानी भरकर रखने की आवश्यकता नहीं होती। केवल मिट्टी में बीजों की बुवाई एवं अंकुरण के लिए उचित नमी बनाए रखना पर्याप्त होता है। इससे कुल सिंचाई जल में 40 प्रतिशत तक की बचत होती है, जो कि इसे कम वर्षा की स्थिति एवं जिन स्थानों पर सिंचाई की सुविधा नहीं है, के लिए अत्यंत उपयोगी बना देता है।
• फसल चक्र का जल्दी पूरा होना (7-12 दिनों की बचत): रोपाई वाले धान की तुलना में डीएसआर से बोया गया धान 7 से 12 दिन पहले पककर तैयार हो जाता है। यह कम अवधि अल नीनो के कारण मानसून के जल्दी समाप्त होने की स्थिति में फसल को नष्ट होने अथवा सूखने से बचा लेती है। साथ ही, रबी फसल (जैसे गेहूं) के लिए खेत समय पर खाली हो जाता है।
• कम लागत और श्रम पर कम निर्भरता: मानसून में देरी होने पर सामान्यत: पारंपरिक खेती में मजदूरों की कमी हो जाती है और उनकी मजदूरी की दरें बढ़ जाती हैं। इसके विपरीत, डीएसआर में रोपाई और नर्सरी का खर्च पूरी तरह समाप्त हो जाता है, मजदूरों की भी कम आवश्यकता होती है। जिससे प्रति एकड़ खेती की लागत में कमी आती है।
• पौधों की गहरी जड़ें और सूखा सहनशीलता: चूंकि डीएसआर में पौधों को उखाड़कर दोबारा नहीं लगाया जाता, इसलिए उनकी जड़ें मिट्टी में अधिक गहराई तक जाती हैं। गहरी जड़ें जमीन के निचले स्तर से नमी सोखने में सक्षम होती हैं, जिससे फसल में सूखे को सहने की क्षमता बढ़ जाती है।
डीएसआर तकनीक की सफलता के लिए वैज्ञानिक सुझाव: अल नीनो के प्रभाव को न्यूनतम करने और डीएसआर से अधिकतम उपज लेने के लिए निम्नलिखित वैज्ञानिक सुझावों को अपनाने की सलाह दी जाती है:
• समतलीकरण: बीजों के एकसमान अंकुरण के लिए खेत का पूरी तरह समतल होना अनिवार्य है ताकि पानी और पोषक तत्व हर पौधे तक समान रूप से पहुंचें और कहीं भी जल-जमाव न हो। इसके लिए बुवाई से पूर्व लेजर लैंड लेवलिंग का उपयोग कर खेतों का समतलीकरण कर लें।
• उचित किस्मों का चयन एवं बीज उपचार: क्षेत्र विशेष के अनुसार, धान की कम अवधि और सूखा सहनशील किस्मों (जैसे-सहभागी धान, स्वर्ण श्रेया, स्वर्ण शक्ति, डीआरआर 42, सरयू-52, राजेन्द्र भगवती, पी.आर.एस.-10, एराइज-6129, एराइज तेज, आर.एच.-257, डी.आर.एच.-2366, डी.आर.एच.-834, पी.ए.सी.-807, स्वर्ण श्रेया) का चयन करें। चयनित प्रजाति के अनुसार बीज दर 20-25 किलोग्राम/हेक्टेयर-मोटा आकार का दाना, 25-30 किलोग्राम/ हेक्टेयर-मध्यम आकार का दाना ही रखें। बुवाई से पूर्व, बीज को 8-10 घंटे पानी में भिगोकर रखें, उसमें से खराब बीज (सड़ी) निकाल दे। इसके बाद 1.0 किलोग्राम बीज की मात्रा के लिए 0.2 ग्राम स्ट्रेप्टोसाईकलिन के साथ 2 ग्राम बेविस्टीन मिलाकर बीज उपचार करें और 2 घंटे छाया में सुखाकर ही बुआई करें।
• मशीन द्वारा बुवाई एवं पर्याप्त नमी: बीज की बुवाई सीड ड्रिल या डीएसआर मशीन से 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर ही करें अन्यथा ज्यादा गहराई होने पर अंकुरण एवं कल्लों की संख्या कम हो जाएगी। ध्यान रहे कि बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी (वर्षा जल से नम हुई भूमि पर यदि पैर दबने का निशान बने एवं ट्रैक्टर चल सके) होनी चाहिए। यदि सूखे खेत में बुवाई की गयी हो तो 12 घंटे के अंदर एक हल्की सिंचाई कर लें। फसल के जमाव के 20-25 दिन बाद तक खेत में नमी बनाकर रखना चाहिए। फूल आने की अवस्था तथा दाना बनने के समय खेत में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए।
• एकीकृत खरपतवार नियंत्रण: यह डीएसआर का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इस विधि में खेत में लगातार पानी खड़ा न रहने के कारण खरपतवार बड़ी समस्या बनते हैं। इसके समाधान के लिए बुवाई के 24-48 घंटे के भीतर (अंकुरण से पहले) पेंडिमेथालिन का 1333 मिली. प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में डालकर छिड़काव करें। इसके बाद, बुवाई के 25-30 दिनों पर बिस्पाइरीबैक सोडियम का 100 मिली. प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में डालकर छिड़काव करें।
निष्कर्ष
अल नीनो जैसी जलवायु चुनौतियों के बीच कृषि की निरंतरता बनाए रखने के लिए पारंपरिक पद्धतियों में बदलाव समय की मांग है। धान की सीधी बुवाई न केवल पानी की बचत करती है, बल्कि किसानों की आय को सुरक्षित रखने और कम मीथेन उत्सर्जन कर पर्यावरण को बचाने में भी मदद करती है।
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