ई-20 पेट्रोल महंगा क्यों ?

ई-20 पेट्रोल महंगा क्यों ?

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 13 जुलाई ::
 
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लंबे समय से कच्चे तेल के आयात पर निर्भर रहे हैं। देश अपनी कुल पेट्रोलियम जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम जनता पर पड़ता है। ऐसे में सरकार ने पेट्रोल में जैव ईंधन अर्थात एथेनॉल मिलाने की नीति को प्राथमिकता दी है।

इसी नीति के तहत भारत में ई-20 (E20) पेट्रोल की शुरुआत की गई, जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल का मिश्रण होता है। सरकार का उद्देश्य है कि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी, किसानों की आय बढ़ेगी, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और ऊर्जा के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर बनेगा।

एथेनॉल मिश्रण को लेकर लोगों के मन में उठ रहे सवालों के जवाब देने के लिए सरकार ने विस्तृत एफएक्यू (Frequently Asked Questions) जारी किया है। सबसे बड़ा प्रश्न यही था कि जब पेट्रोल में 20 प्रतिशत अपेक्षाकृत सस्ता एथेनॉल मिलाया जा रहा है तो पेट्रोल की कीमत कम क्यों नहीं हो रही? सरकार ने इस पर स्पष्ट किया कि एथेनॉल तैयार करने और खरीदने की वास्तविक लागत इतनी अधिक है कि ई-20 पेट्रोल की कुल लागत सामान्य पेट्रोल से कम नहीं बल्कि कई मामलों में अधिक हो जाती है।

एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है जिसे जैविक स्रोतों से तैयार किया जाता है। इसे जैव ईंधन (Biofuel) कहा जाता है। भारत में एथेनॉल मुख्यतः गन्ने का रस, शीरा (Molasses), मक्का, टूटे हुए चावल और अन्य कृषि उत्पाद से बनाया जाता है। एथेनॉल को पेट्रोल में मिलाने से पेट्रोल की खपत कम होती है और इंजन में अपेक्षाकृत स्वच्छ दहन होता है।

भारत ने एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2003 में की थी। प्रारंभिक वर्षों में इसकी गति धीमी रही, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें उल्लेखनीय तेजी आई है। सरकार ने चरणबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए हैं- 5 प्रतिशत मिश्रण, 10 प्रतिशत मिश्रण और 20 प्रतिशत मिश्रण। भारत ने 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले प्राप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है।

ई-20 पेट्रोल बाजार में आने के बाद लोगों के मन में अनेक प्रश्न उठने लगे हैं कि पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं हुआ? एथेनॉल वास्तव में कितना सस्ता है? क्या इससे इंजन खराब होगा? क्या सभी वाहन ई-20 पर चल सकते हैं? क्या माइलेज कम होगा? इन सभी सवालों का जवाब देने के लिए सरकार ने विस्तृत एफएक्यू जारी किया।

सामान्य धारणा यह थी कि एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता होता है, इसलिए 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने के बाद पेट्रोल की कीमत कम होनी चाहिए। लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है।

सरकार के अनुसार, एथेनॉल बनाने के लिए किसानों से गन्ना और चावल उचित मूल्य पर खरीदे जाते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लगातार बढ़ाया गया है। किसानों को लाभकारी मूल्य दिया जाता है। एथेनॉल उत्पादन में परिवहन, प्रसंस्करण और भंडारण की लागत भी शामिल होती है। तेल विपणन कंपनियां औसतन लगभग 71.86 रुपये प्रति लीटर की दर से एथेनॉल खरीदती हैं। इस कारण ई-20 पेट्रोल की कुल उत्पादन लागत सामान्य पेट्रोल से कम नहीं होती है।

भारत की जैव ईंधन नीति का एक प्रमुख उद्देश्य केवल ईंधन तैयार करना नहीं है बल्कि किसानों की आय बढ़ाना भी है। यदि सरकार एथेनॉल बहुत कम कीमत पर खरीदेगी तो किसान गन्ना उत्पादन कम कर देंगे। चीनी उद्योग प्रभावित होगा। जैव ईंधन कार्यक्रम कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए सरकार संतुलन बनाते हुए किसानों को उचित मूल्य उपलब्ध कराती है।

गन्ना किसानों को कई प्रकार के लाभ मिलते हैं- समय पर भुगतान, अतिरिक्त मांग, चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति में सुधार, एथेनॉल संयंत्रों का विस्तार और रोजगार के नए अवसर। पहले कई चीनी मिलें भुगतान में महीनों की देरी करती थी। एथेनॉल कार्यक्रम से उनकी नकदी स्थिति मजबूत हुई है।

सरकार टूटे हुए चावल तथा अधिशेष खाद्यान्न का उपयोग भी एथेनॉल उत्पादन में कर रही है। इसका उद्देश्य है- अतिरिक्त खाद्यान्न का उपयोग, किसानों को बाजार और जैव ईंधन उत्पादन बढ़ाना। हालांकि खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार समय-समय पर इस नीति में संशोधन भी करती रहती है।

क्या एथेनॉल वास्तव में पेट्रोल से सस्ता है? यह प्रश्न थोड़ा जटिल है। यदि केवल कच्चे उत्पाद की बात करें तो कुछ परिस्थितियों में एथेनॉल सस्ता दिखाई दे सकता है। लेकिन जब इसमें शामिल किए जाते हैं- कृषि लागत, एमएसपी, प्रसंस्करण, आसवन, भंडारण, परिवहन, गुणवत्ता नियंत्रण और कर, तो अंतिम लागत काफी बढ़ जाती है।

सरकार का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य केवल पेट्रोल सस्ता करना नहीं है। इसके प्रमुख लक्ष्य हैं ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण उद्योगों का विकास और आयातित तेल पर निर्भरता कम करना। 

E20 का अर्थ है- 20 प्रतिशत एथेनॉल + 80 प्रतिशत पेट्रोल। इसके अतिरिक्त अन्य मिश्रण भी होते हैं- E5, E10, E15 और E85 (कुछ देशों में)। 

सरकार और वाहन निर्माता धीरे-धीरे ई-20 अनुकूल इंजन विकसित कर रहे हैं। नए वाहनों में फ्यूल पाइप, रबर सील, इंजेक्शन सिस्टम और इंजन कैलिब्रेशन को ई-20 के अनुरूप बनाया जा रहा है।

पुरानी गाड़ियों का क्या होगा? यही सबसे बड़ी चिंता थी। कई पुराने वाहनों में धातु के वॉशर, पुराने प्रकार की रबर सील और फ्यूल पाइप लंबे समय तक अधिक एथेनॉल के संपर्क में आने पर प्रभावित हो सकते हैं।

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने वाहन निर्माताओं को निर्देश दिया है कि यदि सर्विसिंग के दौरान ई-20 पेट्रोल के कारण कुछ पुराने पार्ट्स बदलने की आवश्यकता हो, तो ऐसे आवश्यक पुर्जों, विशेषकर पुराने धातु या अनुपयुक्त वॉशर, को बिना अतिरिक्त शुल्क बदला जाए। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़ने देना और ई-20 के उपयोग को सहज बनाना है।

एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल की तुलना में कुछ कम होती है। इसी कारण से कुछ वाहनों में माइलेज थोड़ा कम हो सकता है। लेकिन आधुनिक ई-20 इंजन इस अंतर को काफी हद तक संतुलित कर देते हैं।

एथेनॉल मिश्रण से कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन कम हो सकता है। जीवाश्म ईंधन की खपत घटती है। नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ता है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाने में सहायता मिलती है। इसी कारण दुनिया के अनेक देश जैव ईंधन को बढ़ावा दे रहे हैं।

क्या पेट्रोल की कीमत भविष्य में कम हो सकती है? यह कई कारकों पर निर्भर करेगा कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें, एथेनॉल उत्पादन लागत, कृषि लागत, सरकारी कर, परिवहन व्यय और वैश्विक ऊर्जा बाजार। इसलिए केवल एथेनॉल मिश्रण बढ़ने से पेट्रोल की खुदरा कीमत कम होना निश्चित नहीं माना जा सकता।

एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम भारत की ऊर्जा नीति का एक महत्वपूर्ण और दीर्घकालिक कदम है। इसका उद्देश्य केवल पेट्रोल की कीमत कम करना नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय में वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण जैसे व्यापक लक्ष्यों को हासिल करना है। सरकार द्वारा जारी एफएक्यू ने यह स्पष्ट किया है कि किसानों से उचित मूल्य पर खरीदे गए गन्ने और चावल से तैयार एथेनॉल की लागत को देखते हुए ई-20 पेट्रोल सामान्य पेट्रोल से सस्ता नहीं पड़ता। फिर भी, दीर्घकाल में यह नीति भारत को आत्मनिर्भर, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ ऊर्जा व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
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