ढैंचा है मृदा का रक्षक : श्री हरि सहनी

ढैंचा है मृदा का रक्षक : श्री हरि सहनी

 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा ‘खेत बचाओ अभियान’ के अंतर्गत दिनांक 30 जून 2026 को आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में श्री हरि सहनी जी, माननीय सदस्य, बिहार विधान परिषद ने किसानों से मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, हरित खाद के उपयोग तथा समेकित कृषि प्रणाली अपनाने का आह्वान किया। 
अपने संबोधन में श्री हरि सहनी जी  ने कहा कि ढैंचा मृदा का रक्षक तथा सर्वश्रेष्ठ हरित खाद फसल है। इसकी जड़ों में बनने वाली गांठें वायुमंडलीय नाइट्रोजन का प्राकृतिक रूप से स्थिरीकरण करती हैं। धान की रोपाई से पूर्व ढैंचा की फसल को खेत में पलटने से मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन उपलब्ध होती है, जिससे यूरिया की आवश्यकता लगभग 30 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। उन्होंने कहा कि ढैंचा के कोमल पौधों को खेत में मिलाने से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जल धारण क्षमता में सुधार होता है तथा लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है, जिससे मृदा की उर्वरता और उत्पादकता में दीर्घकालिक वृद्धि होती है।
उन्होंने कहा कि पूर्व में किसान गोबर एवं गोमूत्र का उपयोग प्राकृतिक खाद के रूप में करते थे, जिससे मृदा का जैविक स्वास्थ्य बेहतर बना रहता था। किंतु पशुपालन में कमी आने से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ऐसे समय में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री द्वारा प्रारंभ किया गया ‘खेत बचाओ अभियान’ मृदा संरक्षण एवं टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
साथ ही, उन्होंने किसानों को समेकित कृषि प्रणाली अपनाने की सलाह देते हुए कृषि, पशुपालन एवं मत्स्य पालन को एक-दूसरे का पूरक बताया। उन्होंने कहा कि पशुओं से प्राप्त जैविक अपशिष्ट का उपयोग तालाबों के प्राकृतिक उर्वरीकरण में किया जा सकता है, जिससे प्राकृतिक भोजन (नेचुरल फिश फूड) की उपलब्धता बढ़ती है और बाहरी फीड पर होने वाला खर्च कम हो जाता है। उन्होंने देशी पशु नस्लों के संरक्षण एवं संवर्धन पर भी बल देते हुए कहा कि ये कम लागत वाली, स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल तथा समेकित कृषि प्रणाली के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने किसानों से हरित खाद, जैविक पोषक स्रोतों एवं वैज्ञानिक टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण ही कृषि की दीर्घकालिक उत्पादकता, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा किसानों की आर्थिक समृद्धि का आधार है।
कार्यक्रम में संस्थान के वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों तथा 45 किसानों ने भाग लिया। इस अवसर पर प्रतिभागियों को मृदा संरक्षण, हरित खाद के उपयोग, संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन तथा समेकित कृषि प्रणाली के विभिन्न वैज्ञानिक पहलुओं की विस्तृत जानकारी प्रदान की गई।

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