विचारधारा, सत्ता और मनुष्य के भीतर बदलता समाज

विचारधारा, सत्ता और मनुष्य के भीतर बदलता समाज

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 25 जून ::

वह कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जिन्होंने राजनीति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना प्रभावशाली बना दिया है कि वह अब केवल शासन की व्यवस्था न रहकर मनुष्य की सोच, व्यवहार और संबंधों को नियंत्रित करने लगी है। वास्तव में राजनीति का यह बढ़ता प्रभाव अचानक नहीं आया। यह एक लंबी सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम है। समाज में जब असुरक्षा बढ़ती है, जब लोगों को अपनी पहचान खतरे में महसूस होने लगती है, जब आर्थिक असमानताएँ बढ़ती हैं और जब सूचना के स्रोत पक्षपाती हो जाते हैं, तब राजनीति केवल एक व्यवस्था नहीं रहती बल्कि लोगों की भावनात्मक पहचान बन जाती है। यहीं से समस्या शुरू होती है।

मनुष्य हमेशा किसी न किसी समूह से जुड़कर जीना चाहता है। परिवार, जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, संस्कृति और राष्ट्र, ये सभी उसकी पहचान के महत्वपूर्ण आधार हैं। राजनीति इन पहचानों को संगठित कर सकती है और समाज को दिशा भी दे सकती है। किन्तु जब राजनीति इन पहचानों का उपयोग समाज को जोड़ने के बजाय बाँटने के लिए करने लगती है, तब वह खतरनाक हो जाती है।

आज दुनिया के अनेक देशों में पहचान की राजनीति तेजी से बढ़ रही है। लोगों को यह समझाया जा रहा है कि उनका सबसे बड़ा परिचय उनका धर्म, जाति, भाषा या राजनीतिक समूह है। परिणामस्वरूप मनुष्य की व्यापक मानवीय पहचान सिकुड़कर छोटे-छोटे खाँचों में बँटती जा रही है। एक समय था जब लोग कहते थे कि “मैं पहले इंसान हूँ, फिर कुछ और।” लेकिन आज कई लोग कहते हैं कि “मैं पहले इस विचारधारा का समर्थक हूँ, फिर इंसान।” यही बदलाव सबसे चिंताजनक है।

लोकतंत्र में विपक्ष और मतभेद आवश्यक हैं। यदि समाज में केवल एक ही विचार रह जाए तो प्रगति रुक जाएगी। विचारों का संघर्ष लोकतंत्र को मजबूत बनाता है। लेकिन वर्तमान समय में विरोधियों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है। राजनीतिक विमर्श में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। लोग यह मानने लगे हैं कि यदि कोई उनके विचारों से सहमत नहीं है तो वह गलत ही नहीं, बल्कि खतरनाक भी है। इस सोच का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि संवाद समाप्त हो जाता है। जब संवाद समाप्त होता है तो समझ भी समाप्त हो जाती है और जब समझ समाप्त हो जाती है तो केवल संघर्ष बचता है। समाज का इतिहास बताता है कि संघर्ष की शुरुआत विचारों से नहीं, बल्कि संवाद की मृत्यु से होती है।

परिवार समाज की पहली पाठशाला है। यहीं व्यक्ति सहनशीलता, प्रेम और संवाद सीखता है। लेकिन आज राजनीति ने परिवारों के भीतर भी गहरी दरारें पैदा कर दी हैं। भाई-भाई के बीच मतभेद हैं। पिता और पुत्र अलग-अलग राजनीतिक ध्रुवों पर खड़े दिखाई देते हैं। पति-पत्नी तक राजनीतिक मुद्दों पर एक-दूसरे के प्रति कटु हो जाते हैं। यह स्वाभाविक नहीं है। मतभेद होना स्वस्थ है, लेकिन मतभेद का संबंधों को समाप्त कर देना अस्वस्थ है। जब परिवार राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर टूटने लगें, तो यह केवल राजनीतिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक संकट है।

शिक्षा का उद्देश्य स्वतंत्र सोच विकसित करना होता है। विद्यालय और विश्वविद्यालय वह स्थान होते हैं जहाँ युवा विभिन्न विचारों को समझना सीखते हैं। किन्तु आज अनेक स्थानों पर शिक्षा भी राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार होती दिखाई देती है। छात्रों को विचारों का अध्ययन कम और विचारधाराओं के पक्ष-विपक्ष में खड़ा होना अधिक सिखाया जा रहा है। इसका परिणाम यह होता है कि युवा प्रश्न पूछने के बजाय नारे दोहराने लगते हैं। जब शिक्षा जिज्ञासा खो देती है तो समाज भविष्य खो देता है। ज्ञान का उद्देश्य किसी विचारधारा का सैनिक बनाना नहीं, बल्कि विवेकशील नागरिक बनाना है।

किसी भी लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। उसे समाज की आँख और कान कहा जाता है। मीडिया का दायित्व है कि वह सत्य को सामने लाए, सत्ता से प्रश्न पूछे और जनता को निष्पक्ष जानकारी प्रदान करे। लेकिन जब मीडिया स्वयं राजनीतिक खेमों में विभाजित हो जाए, तब समाज भ्रमित होने लगता है। आज अनेक लोग समाचार नहीं, बल्कि अपनी पसंद का दृष्टिकोण खोजते हैं। वे उन स्रोतों को ही सुनना चाहते हैं जो उनकी पूर्व धारणाओं की पुष्टि करें। इसे मनोविज्ञान में “कन्फर्मेशन बायस” कहा जाता है। अर्थात् हम वही सुनना चाहते हैं जो हमें पहले से सही लगता है। यहीं से सत्य की जगह सुविधा लेने लगती है।

राजनीति का एक उद्देश्य सार्वजनिक हित होता है, लेकिन जब व्यक्तिगत हित सार्वजनिक हित पर हावी हो जाता है तो राजनीति अवसरवाद में बदल जाती है। आज समाज में अक्सर यह देखने को मिलता है कि लोग सिद्धांतों से अधिक लाभ को महत्व देने लगे हैं। यदि किसी विचार से व्यक्तिगत लाभ मिल रहा है तो वह सही है। यदि हानि हो रही है तो वही विचार गलत हो जाता है। इस प्रकार राजनीति नैतिकता के बजाय अवसरवाद की संस्कृति को जन्म देती है। धीरे-धीरे यह संस्कृति पूरे समाज में फैल जाती है। लोग सत्य के नहीं, लाभ के पक्षधर बनने लगते हैं और जब समाज लाभ को नैतिकता से ऊपर रख देता है, तब भ्रष्टाचार केवल व्यवस्था में नहीं बल्कि मानसिकता में भी प्रवेश कर जाता है।

आज सूचना सबसे बड़ी शक्ति बन चुकी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों की भावनाओं को प्रभावित करने की अभूतपूर्व क्षमता रखते हैं। राजनीतिक दल, संगठन और प्रभावशाली समूह इस शक्ति का उपयोग जनमत निर्माण के लिए करते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब तथ्य से अधिक भावनाओं का उपयोग किया जाता है। क्रोध, भय, घृणा और असुरक्षा जैसी भावनाएँ लोगों को अधिक तेजी से प्रभावित करती हैं। इसलिए अक्सर ऐसे संदेश अधिक फैलते हैं जो लोगों को उत्तेजित करें। परिणामस्वरूप समाज में संतुलित सोच कम होती जाती है और भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ बढ़ती जाती हैं। यही कारण है कि आज लोग किसी विषय को समझने से पहले उस पर प्रतिक्रिया दे देते हैं।

किसी भी युग की सबसे बड़ी आवश्यकता नैतिक साहस होती है। नैतिक साहस का अर्थ है अपने पक्ष की गलती को भी गलती कहने का साहस। लेकिन वर्तमान समय में यह गुण दुर्लभ होता जा रहा है। लोग विरोधी पक्ष की छोटी-सी गलती पर भी तीखी प्रतिक्रिया देते हैं, जबकि अपने पक्ष की बड़ी गलतियों को भी अनदेखा कर देते हैं। यह प्रवृत्ति केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती। यह व्यक्ति के चरित्र का हिस्सा बन जाती है। धीरे-धीरे वह सत्य से नहीं, सुविधा से संचालित होने लगता है। यहीं से नैतिक पतन की शुरुआत होती है।

विश्व इतिहास के अनेक महान चिंतकों ने राजनीति और नैतिकता के संबंध पर गहन विचार किया है। महात्मा गांधी ने राजनीति को नैतिकता से जोड़ने पर बल दिया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि सामाजिक आचरण भी है। स्वामी विवेकानंद ने मनुष्य को किसी भी विचारधारा से ऊपर रखा। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंध राष्ट्रवाद और संकीर्ण सोच से सावधान रहने को कहा। इन सभी महापुरुषों की एक समान चिंता थी कि यदि मनुष्य विचारधाराओं का दास बन गया तो उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी। आज उनका यह संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।

वर्तमान संकट का समाधान राजनीति से भागने में नहीं है। समाधान राजनीति को उसके उचित स्थान पर रखने में है। यह समझना होगा कि किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक विचार आवश्यक हैं, लेकिन वे मानवता से बड़े नहीं हो सकते।  असहमति का सम्मान करना सीखना होगा। यह स्वीकार करना होगा कि कोई भी व्यक्ति या विचारधारा पूर्ण नहीं होती। सत्य को पक्ष से ऊपर रखना होगा। बच्चों को यह सिखाना होगा कि विचारों पर बहस की जा सकती है, लेकिन इंसानों से घृणा नहीं की जा सकती।

आज समाज को किसी नई विचारधारा की नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण की आवश्यकता है। फिर से करुणा, सहनशीलता, संवाद और सत्यनिष्ठा को महत्व देना होगा। यह समझना होगा कि राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाएँ एक होनी चाहिए। जब तक इंसान, इंसान के दुख को महसूस करता रहेगा, तब तक समाज जीवित रहेगा। लेकिन जिस दिन राजनीतिक पहचान मानवीय संवेदनाओं पर पूरी तरह हावी हो जाएगी, उस दिन समाज केवल भीड़ बनकर रह जाएगा।

इतिहास में अनेक साम्राज्य आए और चले गए। असंख्य विचारधाराएँ जन्मी और समाप्त हो गईं। लेकिन मानवता का मूल्य कभी समाप्त नहीं हुआ। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सी विचारधारा सही है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या अपने भीतर के इंसान को बचाए रख पाए हैं? यदि उत्तर “हाँ” है, तो लोकतंत्र भी सुरक्षित है, समाज भी सुरक्षित है और भविष्य भी सुरक्षित है। लेकिन यदि राजनीति ने भीतर की करुणा, सत्यनिष्ठा और संवेदनशीलता को समाप्त कर दिया है, तो कोई भी राजनीतिक विजय वास्तव में विजय नहीं होगी। क्योंकि अंततः सभ्यता की पहचान सत्ता से नहीं, बल्कि मानवता से होती है।
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