मंगल ग्रह पर मिला - आठ गुफाएं

मंगल ग्रह पर मिला - आठ गुफाएं

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 22 जनवरी ::

मानव सभ्यता की सबसे पुरानी जिज्ञासाओं में से एक रही है- “क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं?” इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए वैज्ञानिकों की दृष्टि सदियों से आकाश की ओर टिकी रही है। पृथ्वी से बाहर जिन ग्रहों पर जीवन की संभावना सबसे अधिक मानी गई है, उनमें मंगल ग्रह सबसे ऊपर रहा है। अब इस खोज को एक नई दिशा मिली है, जब चीन और इटली के वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह पर आठ विशाल गुफाओं की खोज की है। ये गुफाएं न केवल भूगर्भीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि मंगल पर प्राचीन जीवन की संभावना को भी नई मजबूती देती हैं। नासा के मार्स मिशन से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर “हेब्रस वैलेस” (Hebrus Valles) क्षेत्र में इन गुफाओं की पहचान की गई है।

मंगल ग्रह सूर्य से चौथा ग्रह है और इसे “लाल ग्रह” कहा जाता है। इसका लाल रंग लौह ऑक्साइड (जंग) के कारण है। यहाँ 24.6 घंटे का दिन, ध्रुवीय बर्फ, प्राचीन नदी घाटियां और मौसम में परिवर्तन की समानताओं के कारण मंगल को पृथ्वी के बाद जीवन के लिए सबसे उपयुक्त ग्रह माना गया है।

इन गुफाओं की खोज Mars Reconnaissance Orbiter (MRO) से प्राप्त हाई-रेजोल्यूशन इमेजरी और टोपोग्राफिक डाटा के विश्लेषण से हुई है। हेब्रस वैलेस मंगल के उत्तरी गोलार्ध में स्थित एक प्राचीन घाटी प्रणाली है, जिसे पहले ही पानी से बनी संरचना माना जाता रहा है। इसकी गहराई 10 मीटर, 100 मीटर से अधिक चौड़ी, खड़ी दीवारें और सीढ़ीनुमा संरचनाएं हैं।  इन गुफाओं के आसपास कोई ज्वालामुखीय लावा प्रवाह या उल्कापिंड टकराव के संकेत नहीं मिला है, जो इसे और अधिक रहस्यमय बनाता है।

गुफाओं के आसपास पाए गए खनिज में चूना पत्थर (Limestone) और जिप्सम (Gypsum) है और यह दोनों खनिज आमतौर पर पानी की उपस्थिति में बनता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि लगभग 3.5 अरब साल पहले मंगल ग्रह पर झीलें, नदियां और संभवतः समुद्र मौजूद था। यह चुंबकीय क्षेत्र का नष्ट होने, सौर हवाओं द्वारा वायुमंडल का उड़ जाने और तापमान में गिरावट के कारण सूख गया था।  संभावना है कि सतही जल समाप्त होने के बाद पानी भूमिगत गुफाओं और दरारों में सुरक्षित रहा हो।

मंगल पर कोई मजबूत वायुमंडल नहीं है। कोई वैश्विक चुंबकीय क्षेत्र नहीं है। ऐसे में सतह पर रेडिएशन अत्यंत घातक होता है। गुफाएं प्राकृतिक ढाल का काम कर सकती हैं। मंगल के धूल भरे तूफान महीनों तक चल सकता है। गुफाओं के भीतर वातावरण अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है।

पृथ्वी पर गहरी गुफाओं, समुद्र तल, ज्वालामुखीय चट्टानों में सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। यदि मंगल पर कभी जीवन था, तो उसके अवशेष गुफाओं की दीवारों, खनिज परतों, जमे हुए पानी में मिल सकता है।

बायोसिग्नेचर वह रासायनिक, खनिज या संरचनात्मक संकेत होता हैं, जो जीवन की उपस्थिति दर्शाता है। कार्बनिक अणु, आइसोटोपिक असंतुलन, सूक्ष्म जीवाश्म जैसी संरचनाएं होती हैं। 

वैज्ञानिक भविष्य में स्वायत्त रोबोट, उड़ने वाले ड्रोन और रेंगने वाले रोवर को इन गुफाओं में भेजने की योजना बना रहे हैं। जबकि तकनीकी चुनौतियां रहेगी अंधेरा, संचार बाधा और तापमान।

मंगल पर मानव बस्ती का सपना को नासा, स्पेसएक्स और चीन दीर्घकालिक मानव मिशन की योजना बना रहे हैं। गुफाएं क्यों उपयुक्त हैं? क्योंकि प्राकृतिक आश्रय, तापमान नियंत्रण और रेडिएशन सुरक्षा सुलभ है। इस खोज में चीन, इटली और नासा (अमेरिका) के वैज्ञानिकों ने मिलकर काम किया है।

यह खोज केवल मंगल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न उठाती है कि यदि मंगल पर जीवन संभव था, तो क्या ब्रह्मांड में और भी जगह जीवन हो सकता है? अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में इस खोज को “गेम चेंजर” और “मंगल अनुसंधान का नया मोड़” कहा गया है। यदि मंगल पर जीवन के प्रमाण मिलते हैं तो धर्म, दर्शन और विज्ञान तीनों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।

मंगल ग्रह पर खोजी गई ये आठ गुफाएं केवल भूगर्भीय संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि वे मानव इतिहास की सबसे बड़ी खोज का द्वार खोल सकती हैं। ये गुफाएं अतीत के मंगल की कहानी सुनाती हैं। एक ऐसा ग्रह जो कभी नीला, गीला और शायद जीवंत था।
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