अक्टूबर में क्या इथेनॉल बनेगा भारत के परिवहन का नया ईंधन?
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 02 अक्टूबर ::
भारत में पेट्रोल की बढ़ती जरूरत, आयात पर निर्भरता, प्रदूषण और ऊर्जा सुरक्षा जैसे सवालों के बीच इथेनॉल एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में लगातार चर्चा में है। फिलहाल देश में ई20 यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर बहस जारी है। इसी बीच केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के उस बयान ने नई चर्चा को जन्म दिया है कि अक्टूबर में टोयोटा ऐसी कार पेश कर सकती है, जो 100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने में सक्षम होगी।यह केवल एक नए वाहन के बाजार में आने की खबर नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति और परिवहन व्यवस्था में संभावित बदलाव की ओर संकेत भी माना जा सकता है। खास बात यह है कि प्रस्तावित वाहन चलते समय बिजली भी पैदा करेगा। यानी एक ही तकनीक में वैकल्पिक ईंधन और विद्युत उत्पादन की दोहरी अवधारणा दिखाई देगी।
इथेनॉल को लेकर भारत में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से नीतिगत बदलाव हुए हैं। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का उद्देश्य केवल पेट्रोल की खपत कम करना नहीं है। इसके पीछे ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने, घरेलू कृषि क्षेत्र को बाजार उपलब्ध कराने और प्रदूषण कम करने जैसे कई लक्ष्य जुड़े हैं। ई20 का अर्थ है पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल का मिश्रण। देश में इस मिश्रण को लेकर वाहन चालकों के बीच कई सवाल उठे हैं। विशेषकर पुराने वाहनों के इंजन, माइलेज, रखरखाव और दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर चर्चाएं हुई है। सरकार का कहना है कि ई20 लागू करने से पहले वाहनों की इंजन क्षमता, ईंधन प्रणाली, टिकाऊपन और उत्सर्जन सहित विभिन्न मानकों पर परीक्षण किए गए। सरकार के अनुसार करोड़ों दोपहिया और पेट्रोल वाहन ई20 ईंधन पर चल रहे हैं और बड़े पैमाने पर इंजन खराब होने का कोई सत्यापित प्रमाण सामने नहीं आया है।
ई20 को लेकर सार्वजनिक विमर्श में दो अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई देते हैं। एक पक्ष इसे ऊर्जा सुरक्षा और स्वदेशी ईंधन की दिशा में आवश्यक कदम मानता है, जबकि दूसरा पक्ष वाहन के माइलेज, पुराने वाहनों की संगतता और उपभोक्ता लागत जैसे सवाल उठाता है। ऐसे समय में गडकरी का यह कहना महत्वपूर्ण है कि इथेनॉल के इस्तेमाल को लेकर अब तक वाहनों में बड़े स्तर पर कोई शिकायत सामने नहीं आई है। हालांकि किसी भी नई ईंधन तकनीक का मूल्यांकन केवल राजनीतिक या सार्वजनिक दावों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक स्वतंत्र परीक्षण, वास्तविक उपयोग के आंकड़ों और उपभोक्ता अनुभवों से होना चाहिए। यही कारण है कि ई20 की चर्चा के साथ-साथ अब 100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने वाली कार की संभावित पेशकश को भी गंभीर तकनीकी प्रयोग के रूप में देखना होगा।
यदि कोई वाहन केवल इथेनॉल पर चल सकता है, तो यह पेट्रोल आधारित पारंपरिक वाहन व्यवस्था से एक महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव होगा। वर्तमान में आम उपभोक्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वैकल्पिक ईंधन तभी बड़े पैमाने पर सफल हो सकता है, जब उसके लिए वाहन, ईंधन और वितरण, तीनों का मजबूत ढांचा मौजूद हो। 100 प्रतिशत इथेनॉल वाली कार इस दिशा में एक प्रयोगात्मक और व्यावसायिक दोनों प्रकार का संदेश दे सकती है। इससे यह सवाल भी उठेगा कि क्या भविष्य में भारत में केवल पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता के बजाय इथेनॉल, विद्युत और अन्य वैकल्पिक ईंधनों का मिश्रित परिवहन तंत्र विकसित किया जा सकता है?
प्रस्तावित टोयोटा वाहन की सबसे दिलचस्प विशेषता यह बताई गई है कि वह 100 प्रतिशत इथेनॉल पर चलने के साथ-साथ चलते समय बिजली भी पैदा करेगा। यदि यह तकनीक व्यावहारिक और बड़े पैमाने पर उपयोग योग्य साबित होती है, तो वाहन तकनीक में यह महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकता है। यहां यह समझना आवश्यक है कि इथेनॉल से बिजली पैदा करने की अवधारणा को पारंपरिक पेट्रोल कार के समान नहीं समझना चाहिए। आधुनिक वाहन तकनीक में इंजन, जनरेटर, बैटरी और विद्युत मोटर के संयोजन के जरिए ऊर्जा का अलग-अलग रूपों में उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार इथेनॉल आधारित वाहन और इलेक्ट्रिक तकनीक का मेल भविष्य के परिवहन का एक अलग मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
भारत में इथेनॉल की कहानी केवल ऑटोमोबाइल उद्योग की कहानी नहीं है। इसका सीधा संबंध कृषि अर्थव्यवस्था से भी है। देश में गन्ने से इथेनॉल उत्पादन लंबे समय से किया जा रहा है। इसके अलावा सरकार ने अन्य फीडस्टॉक और जैविक स्रोतों से भी इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया है। इसका अर्थ है कि इथेनॉल की मांग बढ़ने पर कृषि आधारित उद्योगों को अतिरिक्त बाजार मिल सकता है। गन्ना किसानों के लिए यह एक वैकल्पिक मांग पैदा करता है। चीनी मिलों के लिए भी इथेनॉल उत्पादन अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकता है। इस दृष्टि से इथेनॉल नीति को केवल पेट्रोल में मिलाए जाने वाले एक घटक के रूप में देखना अधूरा होगा। यह कृषि, ऊर्जा और परिवहन, तीनों क्षेत्रों को जोड़ने वाली नीति बन सकती है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर पड़ता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर तैयार होने वाला वैकल्पिक ईंधन ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो जाता है। इथेनॉल देश में उपलब्ध कृषि संसाधनों से तैयार किया जा सकता है। यदि इसका उत्पादन टिकाऊ तरीके से बढ़ाया जाता है और इसके लिए पर्याप्त कच्चा माल, पानी, भूमि तथा प्रसंस्करण क्षमता उपलब्ध रहती है, तो पेट्रोल की कुछ मांग को घरेलू जैव ईंधन से पूरा किया जा सकता है। यही कारण है कि इथेनॉल मिश्रण को ऊर्जा नीति का हिस्सा बनाया गया है।
इथेनॉल आधारित ईंधन के पक्ष में एक प्रमुख तर्क यह है कि इससे पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में कुछ परिस्थितियों में उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है। गडकरी ने भी इथेनॉल के इस्तेमाल से प्रदूषण कम होने की बात कही है। लेकिन यहां भी वास्तविक लाभ का आकलन केवल वाहन के एग्जॉस्ट से निकलने वाले उत्सर्जन से नहीं होना चाहिए। इथेनॉल के उत्पादन, परिवहन, प्रसंस्करण और कृषि उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। किस फीडस्टॉक से इथेनॉल बनाया गया, उसके उत्पादन में कितनी ऊर्जा और पानी लगा तथा पूरे जीवन-चक्र में कार्बन उत्सर्जन कितना रहा, इन सभी प्रश्नों का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है। इसलिए इथेनॉल के पर्यावरणीय लाभों को लेकर अंतिम निष्कर्ष व्यापक जीवन-चक्र विश्लेषण और स्वतंत्र आंकड़ों पर आधारित होना चाहिए।
वाहन खरीदने वाले आम भारतीय के लिए तकनीक से पहले प्रश्न होता है कि जेब पर कितना असर पड़ेगा? इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से अलग होती है। इसलिए केवल प्रति लीटर कीमत की तुलना से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। उपभोक्ता के लिए वास्तविक लागत इस बात पर निर्भर करेगी कि वाहन एक निश्चित मात्रा में इथेनॉल से कितनी दूरी तय करता है। यदि इथेनॉल की प्रति लीटर कीमत कम है, लेकिन खपत अपेक्षाकृत अधिक है, तो वास्तविक बचत अलग हो सकती है। इसलिए भविष्य में उपभोक्ता के लिए सबसे उपयोगी आंकड़ा होगा प्रति किलोमीटर वास्तविक ईंधन लागत। इसी कसौटी पर ई20, ई100, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों की तुलना अधिक स्पष्ट रूप से की जा सकेगी।
100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने वाली कार बाजार में आ भी जाए, तो अगला प्रश्न होगा कि इसे ईंधन मिलेगा कहां? भारत में पेट्रोल पंपों का विशाल नेटवर्क मौजूद है, लेकिन हर जगह ई100 की उपलब्धता सुनिश्चित करना अलग चुनौती होगी। इसके लिए उत्पादन केंद्रों से लेकर भंडारण, परिवहन, वितरण और खुदरा बिक्री तक पूरी आपूर्ति शृंखला विकसित करनी होगी। यदि वाहन उपलब्ध हो लेकिन ईंधन सीमित स्थानों पर ही मिले, तो आम उपभोक्ता के लिए उसका उपयोग कठिन रहेगा। इसलिए ई100 कार के साथ ई100 ईंधन का बुनियादी ढांचा भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
ऑटोमोबाइल उद्योग लगातार ऐसे इंजन और पावरट्रेन विकसित कर रहा है जो पारंपरिक पेट्रोल-डीजल के विकल्प उपलब्ध करा सकें। इलेक्ट्रिक वाहन, हाइब्रिड, फ्लेक्स-फ्यूल और वैकल्पिक ईंधन इसी परिवर्तन का हिस्सा है। 100 प्रतिशत इथेनॉल वाहन भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए अनुसंधान और विनिर्माण का नया क्षेत्र खोल सकते हैं। यदि भारत में ऐसी तकनीक का बड़े पैमाने पर विकास होता है, तो देश केवल वैकल्पिक ईंधन का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उससे जुड़ी वाहन तकनीक का निर्माता और निर्यातक भी बन सकता है।
इस सवाल का उत्तर अभी देना जल्दबाजी होगी। किसी भी नई तकनीक का भविष्य केवल उसके बाजार में आने से तय नहीं होता। उसकी सफलता लागत, विश्वसनीयता, ईंधन उपलब्धता, वाहन की उम्र, रखरखाव, उपभोक्ता सुविधा और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करती है। ई100 कार का आना निश्चित रूप से तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो सकता है, लेकिन इसके व्यापक प्रभाव का आकलन वास्तविक उपयोग के बाद ही संभव होगा। ई20 के अनुभव से मिले आंकड़े और ई100 तकनीक के प्रदर्शन को साथ रखकर भारत अपनी वैकल्पिक ईंधन नीति को अधिक वैज्ञानिक तरीके से आगे बढ़ा सकता है।
भारत के सामने आने वाले वर्षों में परिवहन ऊर्जा की मांग बढ़ने की संभावना है। ऐसे में केवल एक ईंधन पर निर्भर रहने के बजाय कई विकल्पों का विकास ऊर्जा सुरक्षा के लिए उपयोगी हो सकता है। इथेनॉल उनमें से एक महत्वपूर्ण विकल्प है। लेकिन इसके साथ इलेक्ट्रिक वाहन, हाइब्रिड तकनीक, सार्वजनिक परिवहन, जैव ईंधन और ऊर्जा दक्षता को भी समानांतर रूप से विकसित करना होगा। अक्टूबर में यदि 100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने वाली टोयोटा कार वास्तव में पेश होती है, तो यह केवल एक नए मॉडल का लॉन्च नहीं होगा। यह इस सवाल का भी परीक्षण होगा कि भारत कृषि आधारित जैव ईंधन को आधुनिक वाहन तकनीक से कितनी सफलतापूर्वक जोड़ सकता है।
ई20 को लेकर बहस अभी समाप्त नहीं हुई है। इसके लाभ और संभावित चुनौतियों पर विशेषज्ञों, वाहन निर्माताओं, उपभोक्ताओं और नीति-निर्माताओं के बीच चर्चा जारी रहनी चाहिए। लेकिन इसी बहस के बीच ई100 वाहन का प्रस्ताव एक नई संभावना जरूर खोलता है। भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में ऐसी तकनीकों की आवश्यकता है जो किफायती हो, पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ हो, किसानों और उद्योग को अवसर दें तथा उपभोक्ताओं के लिए व्यावहारिक साबित हो। इथेनॉल इन सभी कसौटियों पर कितना सफल होता है, इसका उत्तर समय और आंकड़े देंगे। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि पेट्रोल से ई20 और ई20 से ई100 तक की यात्रा केवल ईंधन में बदलाव की कहानी नहीं है। यह भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता, कृषि अर्थव्यवस्था और भविष्य की वाहन तकनीक के बीच बन रहे नए संबंध की कहानी है। सड़क पर दौड़ने वाली कार यदि खेतों में पैदा होने वाले ईंधन से चले और साथ ही बिजली भी बनाए, तो परिवहन का यह मॉडल भारत के लिए एक नई दिशा खोल सकता है। अब असली परीक्षा तकनीक की घोषणा नहीं है, बल्कि उसकी कीमत, उपलब्धता, विश्वसनीयता और वास्तविक प्रदर्शन की होगी।
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