भ्रष्टाचार पर शिकंजा या ‘चलता है’ की संस्कृति?
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 01 अक्टूबर ::
भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी सरकार की लड़ाई केवल कानून बनाने या जांच एजेंसियां खड़ी करने से पूरी नहीं होती है। असली सफलता तब मानी जाती है, जब सरकारी व्यवस्था में काम कराने के लिए आम नागरिक को रिश्वत देने की जरूरत महसूस न हो और सरकारी पद पर बैठा व्यक्ति अपने अधिकार का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए करने से पहले कई बार सोचे। बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, विशेष निगरानी इकाई (SVU), आर्थिक अपराध इकाई (EOU), पुलिस, आयकर तथा न्यायालय जैसी संस्थाएं अपने-अपने स्तर पर सक्रिय हैं। आय से अधिक संपत्ति के मामलों में छापेमारी, रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तारी और संपत्तियों की जांच लगातार होती रही है। राज्य सरकार की ओर से भी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति पर जोर दिया जाता रहा है। लेकिन यहीं से एक असहज प्रश्न पैदा होता है कि यदि व्यवस्था इतनी सक्रिय है तो भ्रष्टाचार का आकर्षण अभी समाप्त क्यों नहीं हुआ?
सितंबर 2026 में उपलब्ध निगरानी ब्यूरो से संबंधित रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक 114 प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी थी। इनमें 104 मामले ट्रैप से जुड़े थे और 104 आरोपियों को रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया था। इन कार्रवाइयों में करीब 37.48 लाख रुपये रिश्वत की राशि तथा एक वाशिंग मशीन बरामद होने की जानकारी दी गई। इससे पहले सितंबर के आरंभ में ही निगरानी ब्यूरो द्वारा 104 प्राथमिकी और 96 ट्रैप मामलों का आंकड़ा सामने आया था। यानि कुछ ही सप्ताह में ट्रैप मामलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन आंकड़ों को केवल भ्रष्टाचार की मौजूदगी का प्रमाण मानना भी उचित नहीं होगा। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि शिकायतों पर कार्रवाई की क्षमता और जांच तंत्र की सक्रियता मौजूद है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि सामने आने वाले मामले भ्रष्टाचार की पूरी तस्वीर हैं या केवल उस हिस्से की, जो शिकायत, सत्यापन और ट्रैप के जरिए पकड़ में आता है। यहीं से समस्या की गहराई समझ में आती है।
28 सितंबर 2026 को पटना में एडीएम (आपूर्ति) रविंद्र कुमार दिवाकर और उनकी पत्नी, दानापुर की सब-रजिस्ट्रार कुमारी स्वीटी से जुड़े ठिकानों पर आय से अधिक संपत्ति के मामले में निगरानी की कार्रवाई ने फिर चर्चा तेज कर दी है। रिपोर्टों के अनुसार पटना और बेगूसराय में तलाशी के दौरान नकदी, महंगी घड़ियां, आभूषण और संपत्ति एवं निवेश से जुड़े दस्तावेज मिले हैं। विभिन्न रिपोर्टों में बरामद नकदी की राशि अलग-अलग बताई गई है और तलाशी/मूल्यांकन की प्रक्रिया जारी होने की बात कही गई है। कुछ रिपोर्टों में 70 लाख रुपये से अधिक नकद और 48 घड़ियों का उल्लेख है, जबकि अन्य प्रारंभिक रिपोर्टों में अलग रकम बताई गई है। इसलिए अंतिम बरामदगी और संपत्ति का आधिकारिक आंकड़ा जांच पूरी होने के बाद ही निश्चित माना जाना चाहिए। निगरानी के अनुसार दंपती पर ज्ञात आय के स्रोत से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज है। यह आरोप है, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं। संपत्ति के स्रोत, वैध आय और बरामद दस्तावेजों का सत्यापन जांच का हिस्सा है। लेकिन इस घटना ने समाज के सामने वही पुराना प्रश्न फिर खड़ा कर दिया है कि जिस व्यवस्था में अधिकारी और कर्मचारी जानते हैं कि निगरानी एजेंसियां सक्रिय हैं, वहां भ्रष्टाचार का जोखिम उठाने की मानसिकता आती कहां से है?
भ्रष्टाचार का पहला और सबसे स्पष्ट कारण लालच है। जरूरत और लालच में अंतर है। जरूरत सीमित होती है। लालच की कोई सीमा नहीं होती। जिस व्यक्ति के पास सम्मानजनक वेतन, सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार चलाने के पर्याप्त साधन हो, यदि वह इसके बाद भी रिश्वत लेकर धन, जमीन, फ्लैट, गहने, महंगी गाड़ियां या दूसरी संपत्तियां जोड़ना चाहता है, तो समस्या केवल आर्थिक नहीं रह जाती है। वह मानसिकता का प्रश्न बन जाती है। आज समाज में सफलता को कई बार संपत्ति के प्रदर्शन से मापा जाने लगा है। बड़ा मकान, महंगी गाड़ी, शानदार जीवनशैली, महंगे मोबाइल और विदेश यात्राएं सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक बनते जा रहे हैं। ऐसे वातावरण में सरकारी पद कुछ लोगों के लिए सेवा का माध्यम न रहकर अवसर बन जाता है।
भ्रष्टाचार हमेशा नोटों की गड्डियों से शुरू नहीं होता है। कई बार वह तुलना से शुरू होता है। “उसके पास इतना है, मेरे पास क्यों नहीं?” “उसने दो साल में मकान बना लिया, मैं पीछे क्यों रहूं?” “फलां अधिकारी के पास इतना पैसा है, मैं ईमानदार रहकर क्या कर रहा हूं?” यही मानसिकता धीरे-धीरे व्यक्ति को उस सीमा तक ले जाती है जहां वह नियमों से समझौता करने लगता है। समस्या तब और गंभीर होती है जब समाज भी सवाल पूछने के बजाय सफलता के परिणाम को स्वीकार कर लेता है। धन कहां से आया? यह प्रश्न पीछे चला जाता है। धन कितना है? यह प्रश्न आगे आ जाता है।
भ्रष्टाचार की चर्चा में एक दूसरा पक्ष भी सामने आता है वह है कथित ‘चढ़ावा’ या सुविधा शुल्क। कई नागरिकों की शिकायत रहती है कि बिना पैसे दिए फाइल आगे नहीं बढ़ती है, प्रमाणपत्र जल्दी नहीं बनता है, निरीक्षण में राहत नहीं मिलती है या काम कराने के लिए कई स्तरों पर अनौपचारिक भुगतान करना पड़ता है। लेकिन यहां अंतर करना जरूरी है। यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी द्वारा रिश्वत की मांग की जाती है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। दूसरी ओर, नागरिकों द्वारा स्वयं नियम तोड़ने, लाइन से बचने, अवैध काम कराने या जल्दी लाभ लेने के लिए पैसे की पेशकश करना भी इसी चक्र को मजबूत करता है। अर्थात भ्रष्टाचार की श्रृंखला में केवल लेने वाला ही नहीं, देने वाला तंत्र भी कभी-कभी सहभागी बन जाता है।
हमारा समाज कई क्षेत्रों में शॉर्टकट खोजने लगा है। लंबी प्रक्रिया से बचना है तो पैसा दीजिए। नियम पूरा नहीं करना है तो पैसा दीजिए। योग्यता की जगह प्रभाव चाहिए तो सिफारिश खोजिए। कानून की प्रक्रिया से बचना है तो कोई रास्ता निकालिए। जब नागरिक और व्यवस्था दोनों शॉर्टकट स्वीकार करने लगते हैं तो भ्रष्टाचार केवल सरकारी कार्यालय की समस्या नहीं रहता है। वह सामाजिक व्यवहार बन जाता है। इसीलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल निगरानी विभाग की लड़ाई नहीं हो सकती है।
भ्रष्टाचार के कारणों पर चर्चा करते समय स्थानांतरण और पदस्थापन की व्यवस्था पर भी प्रश्न उठते हैं। हर विभाग में कुछ पद स्वाभाविक रूप से अधिक संवेदनशील होते हैं। जहां बड़ी राशि के भुगतान, जमीन, निबंधन, खनन, परिवहन, निर्माण, आपूर्ति या ठेके से जुड़े निर्णय होते हैं, वहां भ्रष्टाचार का जोखिम भी अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है। ऐसे पदों पर तैनाती के लिए यदि स्पष्ट, पारदर्शी और रिकॉर्ड-आधारित व्यवस्था हो तो संदेह की गुंजाइश कम होगी। कौन अधिकारी कहां गया, कितने समय के लिए गया और क्यों गया, इन सवालों के उत्तर प्रशासनिक व्यवस्था में स्पष्ट होने चाहिए। यह किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं है, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता का प्रश्न है।
सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों से संपत्ति तथा आय संबंधी विवरण लेने की व्यवस्था का उद्देश्य भी यही है कि उनकी घोषित आय और संपत्ति के बीच असंगति सामने आने पर जांच की जा सके। लेकिन केवल विवरण जमा कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि घोषित आय, बैंक लेनदेन, संपत्ति खरीद, निवेश और जीवनशैली में बड़े अंतर दिखाई देने पर जोखिम-आधारित जांच व्यवस्था स्वतः सक्रिय हो। डिजिटल युग में डेटा का उपयोग करके ऐसी विसंगतियों को पहले ही पहचाना जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति की घोषित आय एक निश्चित सीमा में है लेकिन उसी अवधि में उसकी संपत्ति कई गुना बढ़ती है, तो सिस्टम को कम से कम यह पूछने की क्षमता होनी चाहिए कि वृद्धि का स्रोत क्या है।
निगरानी की सफलता को केवल गिरफ्तारियों से नहीं मापा जा सकता है, यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है। 100 गिरफ्तारियां होना निश्चित रूप से कार्रवाई का संकेत है। लेकिन भ्रष्टाचार नियंत्रण की वास्तविक सफलता का पैमाना इससे बड़ा होना चाहिए। हमें यह भी देखना होगा कि रिश्वत की शिकायतों में कमी आई या नहीं? सरकारी सेवाओं में समयबद्धता बढ़ी या नहीं? ऑनलाइन सेवाओं से आम नागरिक का संपर्क कम हुआ या नहीं? संवेदनशील पदों पर निगरानी कितनी मजबूत हुई? भ्रष्टाचार के मामलों में दोषसिद्धि कितनी हुई? संपत्ति जब्ती और न्यायिक प्रक्रिया कितनी प्रभावी रही? ईमानदार अधिकारियों को संस्थागत सुरक्षा कितनी मिली? क्योंकि भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य ज्यादा गिरफ्तारी नहीं, कम भ्रष्टाचार होना है।
हमारे सामाजिक जीवन की एक खतरनाक पंक्ति है कि “चलता है।” थोड़ी रिश्वत चलेगी। थोड़ा नियम टूटेगा।मथोड़ी सिफारिश चलेगी। थोड़ा भ्रष्टाचार चलेगा। यही “थोड़ा-थोड़ा” मिलकर व्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचाता है। एक कड़ी दूसरी कड़ी से जुड़ती जाती है। कहीं नागरिक नियम तोड़ता है, कहीं कर्मचारी सुविधा शुल्क मांगता है, कहीं अधिकारी दबाव बनाता है, कहीं बिचौलिया व्यवस्था तैयार करता है और कहीं राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण की आशंका पैदा होती है। यदि इस श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी टूट जाए तो पूरी यात्रा प्रभावित हो सकती है। इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को केवल छापेमारी तक सीमित करने के बजाय प्रक्रिया सुधार, डिजिटल पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक अनुशासन से जोड़ना होगा।
भारतीय लोकतंत्र में चुनाव और राजनीति के वित्तीय पक्ष पर चर्चा भी भ्रष्टाचार की व्यापक बहस का हिस्सा है। चुनाव लड़ने के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। राजनीतिक दलों को संगठन चलाने, प्रचार करने और चुनावी गतिविधियों के लिए धन चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में धन की आवश्यकता और अवैध धन के उपयोग के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। यही वह जगह है जहां पारदर्शी राजनीतिक वित्त व्यवस्था महत्वपूर्ण बनती है। यदि राजनीति में धन का स्रोत पारदर्शी होगा, तो सरकारी व्यवस्था पर भी अप्रत्यक्ष दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन इस विषय को केवल किसी एक दल या नेता तक सीमित करके देखने से समस्या का वास्तविक समाधान नहीं निकलेगा। व्यवस्था का सवाल व्यक्ति से बड़ा होता है।
हर व्यक्ति अपने परिवार की प्रतिष्ठा चाहता है। सरकारी अधिकारी हो या सामान्य कर्मचारी, कोई नहीं चाहता है कि उसके घर पर छापा पड़े, पड़ोसी चर्चा करें, समाचारों में नाम आए और परिवार को सामाजिक असहजता झेलनी पड़े। फिर भी कुछ लोग जोखिम क्यों उठाते हैं? क्योंकि भ्रष्टाचार में अक्सर व्यक्ति तत्काल लाभ को भविष्य के जोखिम से बड़ा मान लेता है। उसे लगता है कि “कुछ नहीं होगा।” “सब करते हैं।” “मैं पकड़ा नहीं जाऊंगा।” “जरूरत पड़ी तो सब संभाल लेंगे।” यही आत्मविश्वास भ्रष्टाचार का मनोवैज्ञानिक आधार बन सकता है। जब तक यह धारणा नहीं टूटेगी कि कानून से बच निकलना संभव है, तब तक केवल कानून की कठोरता पर्याप्त नहीं होगी।
बिहार को अब भ्रष्टाचार विरोधी नीति के अगले चरण पर विचार करना होगा। पहला चरण “शिकायत और ट्रैप” । दूसरा “आय से अधिक संपत्ति की जांच”। तीसरा “संपत्ति और धन के स्रोत का सत्यापन”। चौथा “न्यायिक प्रक्रिया” और पांचवां “ऐसी व्यवस्था तैयार करना जिसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश ही कम हो”। इसके लिए संवेदनशील विभागों में अधिक डिजिटल प्रक्रिया, कम मानवीय विवेकाधिकार, समयबद्ध सेवा, ऑनलाइन फाइल ट्रैकिंग, पारदर्शी पदस्थापन, संपत्ति विवरण की प्रभावी जांच और शिकायतकर्ता की सुरक्षा जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
आज बिहार के सामने प्रश्न यह नहीं है कि निगरानी सक्रिय है या नहीं। वह सक्रिय है, आंकड़े इसका संकेत देते हैं। प्रश्न यह है कि इतनी सक्रियता के बावजूद भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त क्यों नहीं हो रही? क्या कारण लालच है? क्या कारण दिखावे की सामाजिक प्रतिस्पर्धा है? क्या कारण शॉर्टकट की नागरिक मानसिकता है? क्या कारण पदस्थापन और प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता की कमी है? क्या कहीं बिचौलियों का तंत्र है? क्या कहीं राजनीतिक और चुनावी वित्त की अपारदर्शिता समस्या को बढ़ाती है? या फिर इन सभी कारणों का सम्मिलित प्रभाव है? शायद इसका उत्तर किसी एक शब्द में नहीं मिलेगा।
भ्रष्टाचार केवल नोट लेने का नाम नहीं है। यह उस मानसिकता का नाम है जिसमें पद को अधिकार नहीं, अवसर समझा जाता है, सेवा को कर्तव्य नहीं, सौदा समझा जाता है और नियम को व्यवस्था नहीं, बाधा समझा जाता है। निगरानी ब्यूरो की कार्रवाई, SVU और EOU की जांच, पुलिस की कार्रवाई और न्यायालय की प्रक्रिया आवश्यक है। लेकिन इनके साथ समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जो नागरिक नियम तोड़ने के लिए रिश्वत देता है, उसे भी सोचना होगा। जो कर्मचारी बिना पैसे काम रोकता है, उसे भी सोचना होगा। जो अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करता है, उसे भी सोचना होगा और जो समाज अवैध संपत्ति को सफलता का प्रतीक मानता है, उसे भी सोचना होगा। भ्रष्टाचार तब कमजोर होगा, जब रिश्वत लेने वाले को कानून का डर, रिश्वत देने वाले को नियम का सम्मान और ईमानदार व्यक्ति को व्यवस्था का भरोसा होगा। आज बिहार में जांच एजेंसियां लगातार कार्रवाई कर रही हैं। वर्ष 2026 के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि रंगे हाथ गिरफ्तारियां और आय से अधिक संपत्ति की जांच जारी है। लेकिन अंतिम लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि हर साल कितने अधिकारी पकड़े गए। अंतिम लक्ष्य होना चाहिए कि अगले वर्ष कितने कम लोगों को रिश्वत देने या लेने की जरूरत पड़ी। यही वह बिंदु होगा जहां “जीरो टॉलरेंस” केवल सरकारी नीति का वाक्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन सकेगा और तब शायद “चलता है” की जगह एक नई पंक्ति जन्म ले “गलत है, इसलिए नहीं चलेगा।”
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