BRICS सम्मेलन के बहाने वैश्विक मंच पर उभरता भारत
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 13 सितम्बर ::
भारत अब दुनिया के साथ केवल कदम मिलाकर चलने की कोशिश नहीं कर रहा है, बल्कि दुनिया की दिशा तय करने की क्षमता के साथ आगे बढ़ रहा है। यह वह भारत है जिसकी आवाज अब केवल उसके 140 करोड़ से अधिक नागरिकों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली स्वर बन चुकी है। भारत मंडपम में आयोजित दो दिवसीय 18वें BRICS सम्मेलन में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से भारत की धरती पर पधारे अतिथियों का स्वागत महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। यह भारत की उस सनातन परंपरा का अभिनंदन है, जिसने हजारों वर्षों से संसार को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया है अर्थात पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
भारत की सभ्यता में अतिथि का स्थान सदैव विशेष रहा है। ‘अतिथि देवो भवः’ केवल हमारी संस्कृति का वाक्य नहीं है, बल्कि हमारी जीवन-दृष्टि है। आज जब दुनिया के प्रमुख देशों के प्रतिनिधि भारत की धरती पर एक महत्वपूर्ण वैश्विक संवाद के लिए एकत्रित होते हैं, तब यह परंपरा आधुनिक कूटनीति के साथ एक नया अर्थ ग्रहण करती है। भारत का संदेश स्पष्ट है कि दुनिया को टकराव की राजनीति से ऊपर उठकर संवाद, सहयोग और साझी प्रगति की ओर बढ़ना होगा। BRICS जैसे मंच की उपयोगिता इसी में है कि यहां विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक हितों और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं वाले देश एक साथ बैठकर वैश्विक समस्याओं पर विचार करते हैं। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखना ही परिपक्व कूटनीति की पहचान है।
भारत के लिए BRICS सम्मेलन की मेजबानी निश्चित रूप से गौरव का विषय है। यह भारत की बढ़ती कूटनीतिक स्वीकार्यता और वैश्विक प्रभाव का परिचायक भी है। लेकिन किसी बड़े सम्मेलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसका आयोजन कितने भव्य तरीके से हुआ। असली परीक्षा यह है कि भारत इस मंच को किस प्रकार टकराव के बजाय सहयोग का मंच बना पाता है। G20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने जिस प्रकार अलग-अलग मतों और हितों वाले देशों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया, उसने दुनिया के सामने भारत की संवाद-क्षमता का परिचय दिया था। रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसी जटिल परिस्थितियों के बीच भी भारत ने बातचीत और कूटनीति की आवश्यकता पर लगातार जोर दिया। अब BRICS के मंच पर भी भारत के सामने वैसी ही चुनौती है। विश्व व्यवस्था इस समय अनेक प्रकार के तनावों से गुजर रही है। कहीं युद्ध है, कहीं व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, कहीं तकनीकी वर्चस्व की होड़, कहीं ऊर्जा सुरक्षा की चिंता और कहीं आपूर्ति शृंखला को लेकर असुरक्षा। ऐसे समय में भारत यदि विभिन्न देशों के बीच विश्वास और सहयोग का वातावरण बनाने में सफल होता है, तो यह उसकी कूटनीतिक उपलब्धि से कहीं आगे की बात होगी।
एक समय था जब वैश्विक मंचों पर भारत की बात सुनी तो जाती थी, लेकिन उसे निर्णायक महत्व मिले, यह आवश्यक नहीं था। भारत को अक्सर विकासशील दुनिया के एक बड़े देश के रूप में देखा जाता था, जिसकी अपनी समस्याएं बहुत थी और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में जिसकी भूमिका सीमित मानी जाती थी। आज परिस्थितियां बदल चुकी है। भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर डिजिटल तकनीक तक, विनिर्माण से लेकर सेवा क्षेत्र तक और स्टार्टअप से लेकर बुनियादी ढांचे तक भारत ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन भारत की कूटनीतिक आत्मविश्वास में दिखाई देता है। भारत अब किसी एक शक्ति-समूह का पिछलग्गू बनकर नहीं है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ रहा है। यही कारण है कि अमेरिका से लेकर रूस तक, यूरोप से लेकर खाड़ी देशों तक और विकसित देशों से लेकर ग्लोबल साउथ तक भारत के साथ संबंधों को महत्व दिया जा रहा है।
BRICS अब केवल कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है। यह बदलती विश्व व्यवस्था में वैश्विक दक्षिण की बढ़ती आकांक्षाओं का महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है। वैश्विक शासन व्यवस्था, बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा, वित्तीय सहयोग और सतत विकास जैसे विषय BRICS के एजेंडे में इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनका प्रभाव केवल सदस्य देशों तक सीमित नहीं है। आज दुनिया की अर्थव्यवस्था परस्पर इतनी जुड़ी हुई है कि एक क्षेत्र का संकट दूसरे क्षेत्र को प्रभावित करता है। ऊर्जा की कीमतें बढ़ती है तो महंगाई दुनिया भर में असर डालती है। किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में संकट पैदा होता है तो वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित होती है। किसी बड़ी अर्थव्यवस्था की मंदी का प्रभाव दूसरे देशों के व्यापार और रोजगार पर पड़ता है। ऐसे समय में बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत BRICS के माध्यम से इसी बहुपक्षीय सहयोग को अधिक व्यावहारिक, संतुलित और विकासोन्मुख बनाने की दिशा में अपनी प्राथमिकताएं रख सकता है।
BRICS सम्मेलन भारत को अपनी आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से रखने का अवसर देता है। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषयों में आर्थिक विकास, निवेश, व्यापार, तकनीकी सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सतत विकास शामिल है। भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने दुनिया के सामने एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है, जिसमें तकनीक को केवल आर्थिक लाभ का साधन नहीं बल्कि सामाजिक सशक्तीकरण के उपकरण के रूप में देखा गया है। डिजिटल भुगतान, वित्तीय समावेशन और तकनीक आधारित सार्वजनिक सेवाओं के क्षेत्र में भारत का अनुभव अन्य विकासशील देशों के लिए उपयोगी हो सकता है। यदि BRICS देशों के बीच डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, फिनटेक और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ता है, तो इससे आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा प्रभावित हो सकती है।
BRICS का एक महत्वपूर्ण आयाम व्यापार भी है। आज दुनिया संरक्षणवाद, व्यापारिक तनाव और आपूर्ति शृंखला में बदलाव के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में भारत के लिए नए बाजारों की तलाश, निर्यात में वृद्धि और वैश्विक विनिर्माण शृंखला में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत को BRICS मंच पर यह प्रयास करना होगा कि सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़े, लेकिन व्यापार संतुलित और पारदर्शी भी हो। भारत के लिए कृषि, दवा, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सेवा क्षेत्र, डिजिटल तकनीक और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में व्यापक संभावनाएं है। यदि इन क्षेत्रों में सहयोग को संस्थागत रूप दिया जाता है, तो BRICS देशों के बीच आर्थिक संबंध आने वाले समय में और मजबूत हो सकते हैं।
ऊर्जा के बिना आधुनिक अर्थव्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन ऊर्जा सुरक्षा आज केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं है। नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और महत्वपूर्ण खनिज भी भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार बन रहे हैं। भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में जिस प्रकार अपनी क्षमता बढ़ाई है, वह दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। BRICS देशों के बीच ऊर्जा सहयोग बढ़ाकर भारत एक ऐसी व्यवस्था की दिशा में योगदान कर सकता है, जिसमें आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों साथ-साथ चले। यही सतत विकास की वास्तविक भावना है।
21वीं सदी में जिस देश के पास तकनीकी क्षमता होगी, वही वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष तकनीक, जैव-प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा आने वाले दशकों की अर्थव्यवस्था और रणनीति को निर्धारित करेंगे। भारत के लिए यह समय केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल करने का नहीं, बल्कि अपनी तकनीकी क्षमता को मित्र देशों के साथ साझा करने का भी है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम, डिजिटल अवसंरचना और तेजी से विकसित होता स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र इसकी क्षमता का प्रमाण है। BRICS मंच इस तकनीकी सहयोग को नई दिशा दे सकता है।
भारत लंबे समय से विकासशील देशों की चिंताओं को वैश्विक मंच पर उठाता रहा है। ग्लोबल साउथ के देशों के सामने खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, स्वास्थ्य, वित्त और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियां है। इन देशों को केवल सहायता नहीं, बल्कि अवसर चाहिए। उन्हें ऐसी वैश्विक व्यवस्था चाहिए जिसमें उनकी आवाज सुनी जाए और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़े। भारत BRICS के माध्यम से इसी आकांक्षा को अधिक प्रभावी स्वर दे सकता है। भारत का दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि वैश्विक संस्थाएं अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, पारदर्शी और वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप बने।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी संतुलित विदेश नीति और संवाद की क्षमता है। भारत किसी संघर्ष में आंख मूंदकर किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होने के बजाय राष्ट्रीय हितों और वैश्विक शांति के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता है। यही संतुलन BRICS जैसे मंच पर भारत को विशेष भूमिका देता है। भारत यदि विभिन्न देशों के बीच पुल का काम करता है तो उसकी वैश्विक उपयोगिता और बढ़ेगी। दुनिया को आज ऐसे देशों की आवश्यकता है जो केवल शक्ति का प्रदर्शन न करें, बल्कि शक्तियों के बीच संवाद का रास्ता भी निकाले।
हालांकि किसी सम्मेलन की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन उसके घोषणापत्र या संयुक्त बयान से अधिक उसके बाद होने वाले कार्यों से होता है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि सम्मेलन में उठाए गए मुद्दे केवल चर्चाओं तक सीमित न रहें। आर्थिक सहयोग के लिए ठोस तंत्र बने, तकनीकी साझेदारी आगे बढ़े, व्यापारिक बाधाएं कम हों और विकासशील देशों के हितों को व्यावहारिक रूप से मजबूत किया जाए। यही वह बिंदु होगा जहां मेजबानी रणनीतिक प्रभाव में परिवर्तित होगी। भारत ने दुनिया को अपनी आयोजन क्षमता दिखा दी है। अब उसे अपनी नीति-निर्माण और परिणाम देने की क्षमता को और मजबूती से सामने रखना है।
भारत का बढ़ता वैश्विक कद केवल गौरव का विषय नहीं है, यह जिम्मेदारी भी है। जितना बड़ा प्रभाव, उतनी बड़ी जिम्मेदारी। भारत यदि विश्व मंच पर शांति, संवाद, विकास और सहयोग की आवाज को मजबूत करता है, तो वह अपनी प्राचीन सभ्यता के मूल संदेश को आधुनिक विश्व व्यवस्था से जोड़ सकेगा। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ यह नहीं है कि दुनिया में मतभेद नहीं होंगे। इसका अर्थ यह है कि मतभेदों के बावजूद मानवता का हित सर्वोपरि रहना चाहिए। आज दुनिया को इसी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
BRICS सम्मेलन भारत के लिए एक और अवसर है, दुनिया को यह बताने का कि नया भारत केवल आर्थिक शक्ति बनने की आकांक्षा नहीं रखता, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में रचनात्मक भूमिका निभाना चाहता है। भारत अब केवल किसी वैश्विक निर्णय का सहभागी नहीं बनना चाहता। वह उन निर्णयों की दिशा तय करने वाले देशों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना चाहता है। यह यात्रा आसान नहीं होगी। वैश्विक राजनीति में हितों का टकराव रहेगा, आर्थिक प्रतिस्पर्धा रहेगी और रणनीतिक चुनौतियां भी बनी रहेंगी। लेकिन भारत की शक्ति उसकी विशाल अर्थव्यवस्था के साथ-साथ उसकी सभ्यता, लोकतांत्रिक परंपरा, युवा शक्ति, तकनीकी क्षमता और संवाद की संस्कृति में भी निहित है। इसलिए भारत मंडपम में आयोजित BRICS सम्मेलन को केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह उस भारत की तस्वीर है जो अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है, लेकिन भविष्य की ओर आत्मविश्वास से देख रहा है। यह उस भारत की आवाज है जो कहता है कि दुनिया में किसी एक की विजय और दूसरे की पराजय ही एकमात्र विकल्प नहीं है। साझा विकास भी संभव है। साझी समृद्धि भी संभव है। संवाद से समाधान भी संभव है और यदि इस सोच को भारत अपनी कूटनीतिक क्षमता, आर्थिक शक्ति और रणनीतिक प्रभाव के साथ आगे बढ़ाने में सफल होता है, तो आने वाले समय में दुनिया केवल भारत की प्रगति को नहीं देखेगी बल्कि दुनिया भारत की दिशा को भी देखेगी। यही बदलते विश्व में भारत के बढ़ते कद का वास्तविक अर्थ है।
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