ऑस्ट्रेलिया में एक ही गर्भावस्था ने “विज्ञान और कानून” को उलझा दिया

ऑस्ट्रेलिया में एक ही गर्भावस्था ने “विज्ञान और कानून” को उलझा दिया

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 05 सितम्बर ::
 
दुनिया में जुड़वां बच्चों का जन्म अपने आप में कोई असामान्य घटना नहीं है। सामान्य तौर पर जब लोग जुड़वां बच्चों की बात करते हैं, तो उनके मन में एक ही मां से एक साथ जन्म लेने वाले दो बच्चों की तस्वीर बनती है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में सामने आया एक मामला इस सामान्य धारणा को पूरी तरह बदल देता है। यहां एक महिला ने एक ही गर्भावस्था में दो बच्चों को जन्म दिया है, लेकिन दोनों बच्चों के जैविक माता-पिता अलग-अलग निकले। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सरोगेसी, आईवीएफ, जैविक संबंध और पारिवारिक कानून जैसे कई जटिल पहलू एक साथ सामने आए हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जिस महिला ने एक दंपती के लिए सरोगेट बनने की जिम्मेदारी स्वीकार की थी, उसके गर्भ में बाद में एक दूसरा भ्रूण भी विकसित हो गया। जांच के बाद पता चला कि दोनों बच्चों की आनुवंशिक उत्पत्ति अलग-अलग थी। मामला अदालत तक पहुंचा और वहां यह सवाल उठा कि क्या दोनों बच्चों को कानूनी रूप से भाई-बहन माना जाए? अदालत के सामने यह एक ऐसा सवाल था, जिसका जवाब केवल जन्म की स्थिति देखकर नहीं दिया जा सकता था।

क्वींसलैंड, ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली एक महिला ने एक दंपती के लिए सरोगेट मां बनने का निर्णय लिया था। सरोगेसी की प्रक्रिया में सामान्य तौर पर इच्छुक माता-पिता के भ्रूण को सरोगेट महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है। इस मामले में भी आईवीएफ यानि इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन तकनीक के माध्यम से एक भ्रूण महिला के गर्भ में डाला गया था। आईवीएफ आधुनिक प्रजनन तकनीक का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें अंडाणु और शुक्राणु को शरीर के बाहर प्रयोगशाला में निषेचित करके भ्रूण तैयार किया जाता है। इसके बाद उपयुक्त भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। सरोगेसी में यह महिला स्वयं बच्चे की आनुवंशिक मां हो भी सकती है और नहीं भी, यह इस्तेमाल की गई चिकित्सा प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इस मामले में सरोगेट महिला के गर्भ में इच्छुक दंपती से संबंधित एक भ्रूण प्रत्यारोपित किया गया था। इसके बाद सामान्य रूप से गर्भावस्था आगे बढ़ने की उम्मीद थी। लेकिन घटनाक्रम ने अचानक असाधारण मोड़ ले लिया।

भ्रूण प्रत्यारोपित किए जाने के लगभग दो सप्ताह बाद हुई जांच में डॉक्टरों को गर्भ में दो भ्रूण दिखाई दिए। यह स्थिति अपने आप में चौंकाने वाली थी, क्योंकि शुरुआत में केवल एक भ्रूण गर्भ में डाला गया था। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से यह माना जा सकता था कि प्रत्यारोपित भ्रूण विभाजित होकर जुड़वां भ्रूणों में बदल गया होगा। लेकिन आगे की जांच ने इस संभावना को गलत साबित कर दिया। जन्म के बाद जब बच्चों की जैविक पहचान और आनुवंशिक संबंधों की जांच की गई, तो सामने आया कि दोनों बच्चे एक ही आनुवंशिक स्रोत से पैदा नहीं हुए थे। एक बच्ची उस दंपती की जैविक संतान थी, जिसके लिए सरोगेट महिला ने गर्भ धारण किया था। दूसरी ओर, दूसरे बच्चे की जैविक उत्पत्ति सरोगेट महिला और उसके पति से जुड़ी हुई थी। यानि एक ही गर्भ में विकसित हो रहे दोनों बच्चों के जैविक माता-पिता अलग-अलग थे।

यही इस मामले का सबसे असाधारण वैज्ञानिक पहलू है। सामान्य परिस्थितियों में आईवीएफ के दौरान एक भ्रूण प्रत्यारोपित किए जाने के बाद उसी गर्भावस्था में दूसरा भ्रूण विकसित होना अत्यंत दुर्लभ स्थिति है। इस घटना को समझने के लिए मानव प्रजनन की मूल प्रक्रिया को समझना जरूरी है। गर्भधारण सामान्यतः तब होता है जब पुरुष का शुक्राणु महिला के अंडाणु को निषेचित करता है। आईवीएफ में निषेचन प्रयोगशाला में कराया जाता है और तैयार भ्रूण को गर्भाशय में पहुंचाया जाता है। लेकिन इस मामले में ऐसा प्रतीत हुआ कि आईवीएफ से बनाए गए भ्रूण के साथ-साथ सरोगेट महिला के अपने अंडाणु और उसके पति के शुक्राणु से भी गर्भधारण हुआ। चिकित्सा विज्ञान में ऐसी स्थिति को हेटेरोपैटर्नल सुपरफेकुंडेशन जैसी अत्यंत दुर्लभ घटना से जोड़ा जाता है। इसमें एक ही मासिक चक्र के दौरान अलग-अलग अंडाणु अलग-अलग पुरुषों के शुक्राणुओं से निषेचित हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो एक ही गर्भावस्था में विकसित होने वाले दोनों बच्चों के जैविक पिता अलग-अलग हो सकते हैं। इस मामले की विशेषता यह थी कि एक गर्भावस्था में आईवीएफ से जुड़े भ्रूण और प्राकृतिक गर्भधारण से बने भ्रूण दोनों विकसित हुए।

गर्भावस्था के दौरान दोनों भ्रूणों के एक साथ विकसित होने की जानकारी तो सामने आ गई थी, लेकिन उनकी वास्तविक जैविक पहचान जन्म के बाद अधिक स्पष्ट हुई। जांच में यह पता चला कि दोनों बच्चों का आनुवंशिक संबंध अलग-अलग माता-पिता से है। एक बच्ची आईवीएफ प्रक्रिया से जुड़े दंपती की जैविक संतान थी। वहीं दूसरा बच्चा सरोगेट महिला और उसके पति से जैविक रूप से जुड़ा हुआ था। इससे मामला केवल चिकित्सा विज्ञान तक सीमित नहीं रहा। अब यह सवाल सामने था कि बच्चों की कानूनी पहचान क्या होगी? उन्हें किसके बच्चे के रूप में माना जाएगा? सरोगेट महिला की कानूनी भूमिका क्या होगी? और सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या दोनों बच्चों को कानूनी रूप से जुड़वां भाई-बहन माना जाएगा? इन सवालों ने मामले को अदालत तक पहुंचा दिया।

कानून अक्सर पारिवारिक संबंधों को जैविक संबंधों, जन्म, अभिभावकत्व और कानूनी दस्तावेजों के आधार पर परिभाषित करता है। लेकिन जब चिकित्सा तकनीक और प्राकृतिक गर्भधारण एक ही गर्भावस्था में मिल जाएं, तो पारंपरिक कानूनी परिभाषाएं चुनौती के सामने आ सकती हैं। अदालत के सामने भी कुछ ऐसा ही हुआ। दोनों बच्चे एक ही गर्भावस्था में विकसित हुए थे और एक ही महिला ने उन्हें जन्म दिया था। इस अर्थ में वे गर्भावस्था के स्तर पर जुड़वां थे। लेकिन आनुवंशिक रूप से वे अलग-अलग माता-पिता से जुड़े थे। यही अंतर कानूनी निर्णय का महत्वपूर्ण आधार बना। अदालत ने यह माना कि दोनों बच्चे एक ही गर्भावस्था में पैदा हुए जुड़वां हैं, लेकिन कानूनी दृष्टि से उन्हें जन्म से भाई-बहन नहीं माना जाएगा। यह फैसला पहली नजर में विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन इसके पीछे जैविक और कानूनी संबंधों की अलग-अलग परिभाषाएं काम करती हैं।

आम भाषा में जुड़वां बच्चे निश्चित रूप से भाई-बहन ही माने जाते हैं। लेकिन जैविक दृष्टि से जुड़वां होने का अर्थ है कि दो बच्चे एक ही गर्भावस्था में एक साथ विकसित हुए और उनका जन्म एक ही प्रसव के दौरान या लगभग उसी समय हुआ। वहीं भाई-बहन का रिश्ता आनुवंशिक या कानूनी संबंधों से निर्धारित हो सकता है। इस मामले में दोनों बच्चों ने गर्भावस्था साझा की, लेकिन उनकी आनुवंशिक उत्पत्ति अलग थी। इसलिए अदालत ने गर्भावस्था के संदर्भ में उन्हें जुड़वां माना, लेकिन कानूनी रूप से जन्म से भाई-बहन का दर्जा नहीं दिया। यह अंतर भविष्य में उनके अधिकारों, अभिभावकत्व, उत्तराधिकार और पारिवारिक पहचान जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण हो सकता है।

सरोगेसी ने आधुनिक समाज में परिवार की परिभाषा को पहले ही काफी बदल दिया है। पहले बच्चे की मां की पहचान सामान्यतः गर्भ धारण करने वाली महिला से जुड़ी होती थी। लेकिन सरोगेसी में गर्भ धारण करने वाली महिला और बच्चे की आनुवंशिक मां अलग-अलग हो सकती हैं। आईवीएफ ने इस व्यवस्था को और अधिक जटिल बनाया है। अब बच्चे के जैविक संबंधों में अंडाणु देने वाली महिला, शुक्राणु देने वाला पुरुष और बच्चे को जन्म देने वाली महिला, तीनों की अलग-अलग भूमिकाएं हो सकती है। ऐसे में कानून को केवल इस आधार पर निर्णय लेना मुश्किल हो सकता है कि बच्चे को किसने जन्म दिया है। उसे यह भी देखना पड़ता है कि जैविक माता-पिता कौन हैं, कानूनी अभिभावक कौन हैं और सरोगेसी समझौते में क्या तय हुआ था। ऑस्ट्रेलिया का यह मामला इसी बदलती पारिवारिक संरचना का एक असाधारण उदाहरण बन गया है।

इस मामले की अहमियत केवल इसलिए नहीं है कि इसमें दो बच्चों के अलग-अलग जैविक पिता सामने आए। इसका महत्व इस बात में भी है कि यह मानव प्रजनन की जटिलता को उजागर करता है। मानव शरीर की प्रजनन प्रक्रिया सामान्यतः एक निश्चित क्रम में आगे बढ़ती है, लेकिन कभी-कभी अत्यंत दुर्लभ परिस्थितियों में असाधारण घटनाएं भी हो सकती हैं। एक ही गर्भावस्था में अलग-अलग आनुवंशिक स्रोतों से दो भ्रूणों का विकसित होना चिकित्सा विज्ञान के लिए अध्ययन का विषय बन सकता है। आईवीएफ जैसी तकनीकों ने उन दंपतियों के लिए माता-पिता बनने का रास्ता खोला है, जिन्हें प्राकृतिक रूप से गर्भधारण में कठिनाई होती है। लेकिन इसके साथ चिकित्सा, नैतिकता और कानून से जुड़े नए प्रश्न भी पैदा हुए हैं।

ऐसे मामलों में डीएनए जांच बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। केवल चेहरे की समानता, जन्म का समय या गर्भावस्था की परिस्थितियों के आधार पर किसी बच्चे के जैविक माता-पिता का निर्धारण नहीं किया जा सकता। आनुवंशिक परीक्षण यह स्पष्ट कर सकता है कि बच्चे का जैविक संबंध किन व्यक्तियों से है। इसी तरह की जांच ने इस मामले में भी बच्चों की वास्तविक जैविक उत्पत्ति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज डीएनए परीक्षण ने पारिवारिक विवादों, पितृत्व संबंधी मामलों और चिकित्सा अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण उपकरण का रूप ले लिया है।

ऑस्ट्रेलिया का यह मामला यह संकेत देता है कि भविष्य में प्रजनन तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ऐसे और जटिल कानूनी प्रश्न सामने आ सकते हैं। यदि एक महिला सरोगेट है और उसके गर्भ में एक से अधिक आनुवंशिक स्रोतों से भ्रूण विकसित हो जाएं, तो अभिभावकत्व किसे मिलेगा? बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र में माता-पिता के नाम कैसे दर्ज होंगे? उत्तराधिकार के अधिकार किस आधार पर तय होंगे? सरोगेसी समझौते की स्थिति क्या होगी? ऐसे प्रश्नों के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान आवश्यक हो सकते हैं। इसलिए चिकित्सा तकनीक की प्रगति के साथ कानून को भी समय के अनुसार विकसित होना होगा।

यह पूरा मामला मानव जीवन की जटिलता का एक असाधारण उदाहरण है। एक ही महिला ने दोनों बच्चों को गर्भ में रखा, दोनों एक ही गर्भावस्था में विकसित हुए और दोनों का जन्म एक ही प्रसव से हुआ। फिर भी उनकी जैविक पारिवारिक पहचान अलग-अलग निकली। एक बच्ची आईवीएफ के जरिए उस दंपती की जैविक संतान बनी, जिसके लिए सरोगेसी की गई थी। दूसरा बच्चा सरोगेट महिला और उसके पति से जैविक रूप से जुड़ा हुआ था। अदालत का फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि जैविक संबंध, गर्भावस्था और कानूनी रिश्ते हमेशा एक ही चीज नहीं होते हैं। यह घटना विज्ञान की संभावनाओं और कानून की सीमाओं के बीच खड़े उस नए दौर की ओर इशारा करती है, जहां परिवार की परिभाषा पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में दो बच्चे हैं, जिनका जन्म एक ही गर्भ से हुआ, लेकिन जिनकी जैविक कहानियां अलग-अलग हैं। यही असाधारण तथ्य इस मामले को चिकित्सा विज्ञान और पारिवारिक कानून, दोनों के लिए बेहद दिलचस्प बनाता है।
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