महंगाई का रोना शायद कभी खत्म नहीं होगा
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 07 सितम्बर ::
महंगाई का रोना शायद इंसान ने तब से शुरू कर दिया होगा, जब उसने धरती पर सांस लेना शुरू किया होगा। जिस दिन से मनुष्य ने अपनी जरूरतों को गिनना और उनकी कीमत तय करना सीखा है, उसी दिन से महंगाई उसके सुख-दुख का हिस्सा बन गई। आज भी यही सिलसिला जारी है और शायद तब तक जारी रहेगा, जब तक मनुष्य की जरूरतें, इच्छाएं और संसाधनों के बीच अंतर बना रहेगा। महंगाई केवल बाजार में बढ़ती कीमतों का नाम नहीं है। यह आम आदमी की थाली, परिवार के बजट, बच्चे की पढ़ाई, घर के किराये, इलाज के खर्च और भविष्य की बचत तक पहुंचने वाली एक ऐसी अदृश्य ताकत है, जिसका असर हर व्यक्ति अलग-अलग तरीके से महसूस करता है। कोई दूध महंगा होने की शिकायत करता है, कोई सब्जियों की कीमत पर परेशान है, कोई पेट्रोल-डीजल के दाम को लेकर चिंतित है तो किसी के लिए स्कूल की फीस सबसे बड़ी समस्या है। लेकिन इस कहानी का एक दिलचस्प पहलू भी है। इंसान महंगाई से परेशान होता है, कुछ दिनों तक उससे जूझता है और फिर धीरे-धीरे उसका आदी हो जाता है। जो वस्तु कल महंगी लग रही थी, कुछ दिनों बाद वही नई कीमत सामान्य लगने लगती है। फिर अगली बढ़ोतरी पर नया हंगामा शुरू हो जाता है।
महंगाई के साथ इंसान का रिश्ता भी अजीब है। वह उससे नाराज भी है और उसके साथ जीने के लिए मजबूर भी। घर का बजट बिगड़ता है तो खर्चों में कटौती होती है। पहले बाहर खाना कम होता है, फिर मनोरंजन का खर्च घटता है, फिर खरीदारी टलती है और आखिर में बचत पर असर पड़ता है। यही कारण है कि महंगाई का सबसे बड़ा असर केवल कीमतों में नहीं, बल्कि जीवनशैली में दिखाई देता है। आम आदमी अपनी जरूरतों की सूची को दो हिस्सों में बांट देता है ‘जरूरी और गैरजरूरी’। लेकिन समय के साथ गैरजरूरी कही जाने वाली चीजें भी जीवन का हिस्सा बन जाती हैं। मोबाइल, इंटरनेट, परिवहन, बच्चों की अतिरिक्त पढ़ाई, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और आधुनिक जीवन की दूसरी जरूरतें आज विलासिता नहीं रह गई हैं। इसलिए महंगाई को केवल खाने-पीने की वस्तुओं की कीमत से जोड़ना उचित नहीं होगा। यह जीवन के हर हिस्से को प्रभावित करती है।
भारतीय राजनीति में महंगाई का अपना इतिहास है। पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती है तो सरकार पर सवाल उठते हैं, विपक्ष आंदोलन करता है और जनता नाराज होती है। लेकिन चुनावी राजनीति में कई बार प्याज जैसी छोटी दिखाई देने वाली चीज भी बड़ा मुद्दा बन जाती है। कहा जाता है कि पेट्रोल से सरकारें शायद ही कभी गिरती हैं, लेकिन प्याज ने कई बार राजनीतिक तापमान बढ़ाने का काम जरूर किया है। इसका कारण भी समझना कठिन नहीं है। पेट्रोल की कीमत बढ़ने का असर धीरे-धीरे परिवहन और दूसरी वस्तुओं की कीमतों में दिखाई देता है, जबकि प्याज की कीमत सीधे रसोई तक पहुंचती है। रसोई का अर्थशास्त्र बहुत संवेदनशील होता है। जब घर की गृहिणी या परिवार का जिम्मेदार सदस्य बाजार से लौटकर कहता है कि आज सब्जी इतनी महंगी है, तो महंगाई किसी आर्थिक रिपोर्ट का आंकड़ा नहीं रहती। वह परिवार की वास्तविक समस्या बन जाती है।
महंगाई का कारण केवल सरकार या दुकानदार को मान लेना समस्या को बहुत सरल बना देना है। वास्तव में इसके पीछे कई स्तरों की परिस्थितियां काम करती हैं। किसी वर्ष बारिश कम हो गई तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कहीं बाढ़ आ गई तो फसल खराब हो सकती है। कहीं परिवहन महंगा हो गया तो बाजार तक पहुंचने वाली वस्तु की लागत बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ी तो उसका असर परिवहन से लेकर उत्पादन तक दिखाई दे सकता है। इसके अलावा मांग और आपूर्ति का संबंध भी महत्वपूर्ण है। जिस वस्तु की मांग अचानक बढ़ जाए और उसकी आपूर्ति कम हो, उसकी कीमत बढ़ना स्वाभाविक है। कई बार जमाखोरी और कालाबाजारी भी कीमतों को प्रभावित करती है। उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचने के बीच कई स्तर होते हैं और हर स्तर पर लागत जुड़ती जाती है। यही वह बिंदु है जहां महंगाई का असली चेहरा दिखाई देता है।
महंगाई की चर्चा करते समय अक्सर उपभोक्ता की परेशानी देखते हैं, लेकिन उत्पादक की मजबूरी भूल जाते हैं। एक किसान के सामने बीज, खाद, सिंचाई, बिजली, मजदूरी, मशीन और परिवहन का खर्च बढ़ रहा है। यदि उसकी लागत बढ़ रही है तो वह अपनी उपज को पुरानी कीमत पर बेचकर हमेशा संतुष्ट नहीं रह सकता है। दूसरी तरफ उपभोक्ता की आय उसी गति से नहीं बढ़ती। उसके सामने सवाल होता है कि बढ़ी हुई कीमत पर वस्तु खरीदे तो परिवार का दूसरा खर्च कैसे पूरा करे। यानि उत्पादक कहता है कि लागत बढ़ गई है और उपभोक्ता कहता है कि आय नहीं बढ़ी। दोनों की अपनी-अपनी मजबूरी है। इस बीच व्यापार और वितरण व्यवस्था भी अपना हिस्सा जोड़ती है। परिणाम यह होता है कि खेत से निकली वस्तु जब उपभोक्ता की थाली तक पहुंचती है तो उसका मूल्य कई गुना बदल चुका होता है।
महंगाई ने मनुष्य को विकल्प तलाशना भी सिखाया है। जब कोई वस्तु महंगी होती है तो उपभोक्ता उसका विकल्प खोजने लगता है। दाल महंगी हुई तो दूसरी दाल की ओर रुख, सब्जी महंगी हुई तो मौसमी सब्जियों पर जोर, बाहर खाना महंगा हुआ तो घर में खाना बनाने की प्रवृत्ति, ये सभी महंगाई से निपटने के सामाजिक तरीके हैं। लेकिन विकल्प की यह दुनिया भी हमेशा समाधान नहीं देती है। एक वस्तु के महंगे होने पर दूसरी वस्तु की मांग बढ़ जाती है और कुछ समय बाद उसकी कीमत भी बढ़ सकती है। यानि बाजार में विकल्प तलाशना जरूरी है, लेकिन विकल्प भी असीमित नहीं है।
महंगाई पर नियंत्रण सरकार के लिए हमेशा चुनौती रहा है। सरकार के पास कई आर्थिक औजार होते हैं, लेकिन हर कदम का अपना असर और जोखिम होता है। यदि कीमतें बढ़ रही है तो सरकार बाजार में हस्तक्षेप कर सकती है, आयात बढ़ा सकती है, भंडारण व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकती है या करों में बदलाव कर सकती है। लेकिन दूसरी तरफ उत्पादकों के हितों को भी देखना पड़ता है। यदि किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलेगा तो उत्पादन का उत्साह प्रभावित हो सकता है। अगर उपभोक्ता को बहुत अधिक कीमत देनी पड़े तो उसकी क्रयशक्ति कमजोर होगी। इसलिए सरकार के सामने असली चुनौती केवल महंगाई घटाना नहीं, बल्कि उत्पादक और उपभोक्ता के बीच संतुलन बनाना है।
गरीब व्यक्ति महंगाई बढ़ने पर अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर सकता है, अमीर व्यक्ति अपनी आय और संपत्ति के सहारे कीमतों का असर झेल सकता है। सबसे अधिक दबाव अक्सर मध्यम वर्ग पर पड़ता है। मध्यम वर्ग के सामने बच्चों की शिक्षा, मकान की ईएमआई, स्वास्थ्य, वाहन, बिजली, बीमा और भविष्य की बचत जैसे कई खर्च होते हैं। उसकी आय सीमित होती है और आकांक्षाएं बड़ी। जब महंगाई लगातार बढ़ती है तो उसकी बचत प्रभावित होती है। वह भविष्य के लिए जितना बचाना चाहता है, उतना बचा नहीं पाता। यही कारण है कि महंगाई केवल वर्तमान को महंगा नहीं बनाती, बल्कि भविष्य को भी अनिश्चित करती है।
क्या महंगाई कभी पूरी तरह खत्म होगी? शायद नहीं। क्योंकि महंगाई का एक हिस्सा आर्थिक विकास और बदलती जरूरतों से भी जुड़ा है। समय के साथ मजदूरी बढ़ती है, सेवाओं की लागत बढ़ती है, उत्पादन की तकनीक बदलती है और लोगों की जरूरतें बढ़ती हैं। असल प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि महंगाई शून्य कब होगी। सवाल यह होना चाहिए कि महंगाई की रफ्तार आम आदमी की आय और क्रयशक्ति से कितनी संतुलित है। यदि आय बढ़ रही है और कीमतों का बोझ नियंत्रित है तो व्यक्ति महंगाई को अपेक्षाकृत आसानी से झेल सकता है। लेकिन यदि कीमतें तेजी से बढ़ें और आमदनी वहीं खड़ी रहे तो महंगाई सामाजिक असंतोष का कारण बन सकती है।
महंगाई का समाधान केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। सरकार को नीतियां बनानी है, प्रशासन को बाजार की निगरानी करनी है, उत्पादक को उत्पादन बढ़ाना है, व्यापारी को उचित लाभ रखना है और उपभोक्ता को भी समझदारी से खरीदारी करनी है। स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना, कृषि में तकनीक का इस्तेमाल, बेहतर भंडारण व्यवस्था, मजबूत परिवहन नेटवर्क और बिचौलियों की अनावश्यक परतों को कम करना लंबे समय के समाधान हो सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्पादन और उपभोग के बीच संतुलन बनाया जाए।
महंगाई का रोना शायद कभी बंद नहीं होगा। यह मनुष्य की आर्थिक यात्रा का स्थायी साथी है। लेकिन शिकायत और समाधान के बीच एक बड़ा अंतर है। हर बार बाजार से लौटकर महंगाई को कोस देना आसान है। कठिन यह समझना है कि कीमत क्यों बढ़ी, उत्पादन कितना हुआ, लागत कितनी बढ़ी, वितरण व्यवस्था में कहां समस्या है और उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते वस्तु महंगी क्यों हो गई। आज जरूरत केवल महंगाई पर भड़ास निकालने की नहीं, बल्कि उसके पूरे तंत्र को समझने की है। क्योंकि पेट्रोल महंगा होने पर वाहन रोक देना आसान नहीं है, प्याज महंगा होने पर रसोई रोक देना संभव नहीं है और जीवन महंगा होने पर जिन्दगी को रोक देना तो बिल्कुल संभव नहीं है। इंसान हमेशा की तरह रास्ता खोजेगा। कभी खर्च घटाकर, कभी विकल्प अपनाकर, कभी आय बढ़ाकर और कभी अपनी जरूरतों को नए सिरे से परिभाषित करके। महंगाई आती रहेगी, कीमतें बदलती रहेगी और बाजार करवट लेता रहेगा। असली परीक्षा यही होगी कि उत्पादक की मेहनत का उचित मूल्य मिले, उपभोक्ता की थाली पर अनावश्यक बोझ न पड़े और सरकार दोनों के बीच ऐसा संतुलन कायम करे जिसमें विकास भी चले और जीवन भी।
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