साधारण इंसान की तलाश - दर्द वही बस पैकेजिंग बदल गयी है

साधारण इंसान की तलाश - दर्द वही बस पैकेजिंग बदल गयी है

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 09 सितम्बर ::
 
वर्तमान काल में हम सुख की चाहत में इतने मशरूफ हैं कि पता ही नहीं चलता है कि कब दुःख चुपके से हमसफर बनकर गले पड़ गया है। जब तक उसकी आहट महसूस होती है, तब तक समस्या यह नहीं रह जाती है कि दुःख हमारे जीवन में क्यों आया है, बल्कि यह तय करना कठिन हो जाता है कि उसे निम्नस्तरीय, मध्यमवर्गीय, एलीट या प्रीमियम क्लास में रखा जाए। आखिर आजकल दुःख भी साधारण कहां रह गया है।

कभी दुःख मनुष्य की निजी अनुभूति हुआ करता था। आंखों से आंसू निकलते थे, कोई अपना कंधा देता था और चुपचाप पूछता था कि “क्या हुआ?” आज दुःख भी सार्वजनिक प्रदर्शन की वस्तु बनता जा रहा है। दर्द भीतर जितना है, उसकी प्रस्तुति बाहर उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। अब सवाल यह नहीं कि मन कितना टूटा है, सवाल यह है कि टूटे हुए मन की तस्वीर पर कितने लाइक आये। यही हमारे समय का विचित्र विरोधाभास है कि दुःख बढ़ रहा है, लेकिन दुःख साझा करने की संस्कृति बदल रही है।

मोह-माया, अपेक्षा-उपेक्षा और असंतोष की वसुधा के गर्भ से निकली तृष्णा और आसक्ति के नीर से सींचा गया दुःख अब केवल वेदना नहीं रहा है। वह सामाजिक पहचान, सहानुभूति और कभी-कभी आभासी प्रसिद्धि की सीढ़ी भी बन गया है। निम्नवर्गीय दुःख पेट की चिंता में दबा रहता है। मध्यमवर्गीय दुःख बच्चों की फीस, नौकरी, कर्ज, मकान और भविष्य की चिंता में उलझा रहता है। एलीट दुःख प्रतिष्ठा, संबंधों, अकेलेपन और सामाजिक छवि की चिंता में अपना नया रूप धारण करता है। और प्रीमियम दुःख? उसके लिए तो अलग मंच, अलग भाषा और अलग पैकेज चाहिए। आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक संताप, जिन्हें भारतीय दर्शन ने मनुष्य के जीवन की मूल पीड़ाओं के रूप में समझाया, आज आधुनिक जीवन में नये-नये रूपों में उपस्थित हैं। फर्क इतना है कि पहले दुःख को सहने की कोशिश होती थी, आज उसे समझाने, सजाने और प्रदर्शित करने की कला विकसित हो गयी है।

आधुनिक समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिनके पास वास्तविक दुःख हैं, उनके पास उन्हें दिखाने का मंच नहीं है। और जिनके पास मंच है, उनके दुःख अक्सर आभासी दुनिया की तरंगों में गोते लगाते दिखाई देते हैं। एक गरीब पिता के पास बच्चे की फीस भरने के लिए पैसे नहीं है। उसकी चिंता किसी कैमरे तक नहीं पहुंचती। किसी मजदूर की बीमारी, किसी किसान का कर्ज, किसी मां की रसोई की चिंता या किसी बेरोजगार युवक की रातों की बेचैनी सोशल मीडिया के ट्रेंडिंग विषय नहीं बनती। दूसरी ओर, किसी की छोटी-सी भावनात्मक परेशानी खूबसूरत बैकग्राउंड, उचित प्रकाश, प्रभावशाली संगीत और कुछ चुने हुए शब्दों के साथ लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। इसलिए निम्न और मध्यमवर्गीय दुःख आज गूलर के फूल की तरह होते जा रहे हैं, दिखाई ही नहीं देते हैं। दुःख वही है, लेकिन उसके प्रदर्शन की क्षमता वर्ग के अनुसार बदल गयी है।

एक समय था जब किसी अपने के चेहरे पर उदासी देखकर परिवार पूछता था कि “क्या हुआ?” मित्र हाथ पकड़कर बैठ जाता था। पड़ोसी बिना बुलाये पहुंच जाता था। रिश्तेदार चाहे जितना औपचारिक हो, बीमारी या संकट में घर तक आ जाता था। अब हम डिजिटल युग में हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब की रीलें ऐसे हमदर्द बन गयी है, जो कभी प्रियजन निभाया करते थे। अंतर केवल इतना है कि पहले इंसान हाथ पकड़कर पूछता था कि “कैसे हुआ?” और अब एल्गोरिदम पूछता है कि “कितने व्यू आए?” लाइक, कमेंट, शेयर और व्यू आधुनिक युग के मलहम बन गये हैं। दर्द कम हो या न हो, नोटिफिकेशन मन को थोड़ी देर के लिए यह विश्वास जरूर दिला देता है कि दुनिया हमें देख रही है। नोटिफिकेशन की घंटी आज ऐसी आधुनिक लोरी बन गयी है कि कई बार आदमी अपनी मां की लोरी तक भूल जाता है। यह दृश्य हास्यास्पद भी है और चिंताजनक भी। हम अपने दुख की चिकित्सा मनुष्यों के पास नहीं, आंकड़ों के पास खोजने लगे हैं। हमें यह जानना अधिक जरूरी लगने लगा है कि कितने लोगों ने हमारी पीड़ा देखी, बजाय इसके कि किसी एक व्यक्ति ने वास्तव में उसे समझा या नहीं।

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति के नये रास्ते खोले हैं। यह उसकी उपलब्धि है। लेकिन इसी के साथ उसने भावनाओं को बाजार की भाषा भी सिखा दी है। अब दुःख भी “कंटेंट” है। किसी का रोना वीडियो है। किसी का बिछड़ना पोस्ट है। किसी की बीमारी अपडेट है। किसी का अकेलापन स्टेटस है। किसी की मृत्यु श्रद्धांजलि पोस्ट है और कभी-कभी किसी की अंतिम यात्रा भी कैमरे की आंख से गुजरती हुई डिजिटल स्मृति बन जाती है। दर्द वही है, बस पैकेजिंग बदल रही है। पहले दुःख को जीया जाता था, अब कई बार उसे प्रस्तुत किया जाता है। यह कहना गलत होगा कि हर सार्वजनिक अभिव्यक्ति दिखावा है। मनुष्य स्वभावतः अपनी पीड़ा साझा करना चाहता है और सोशल मीडिया ने उसे अभिव्यक्ति का मंच दिया है। समस्या तब शुरू होती है, जब अभिव्यक्ति का उद्देश्य मन हल्का करना नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया बटोरना बन जाता है।

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां बाजार ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र को “प्रीमियम” बना दिया है। पानी प्रीमियम। खाना प्रीमियम। शिक्षा प्रीमियम। अस्पताल प्रीमियम। होटल प्रीमियम। यात्रा प्रीमियम। मनोरंजन प्रीमियम। यहां तक कि रिश्तों और अंतिम संस्कार तक के लिए अलग-अलग स्तर के पैकेज उपलब्ध है। मनुष्य ने जीवन की आवश्यकताओं को भी हैसियत के प्रतीक में बदल दिया है। जो साधारण है, वह पिछड़ा हुआ समझा जाने लगा और जो महंगा है, वह बेहतर मान लिया गया। लेकिन इसी चमकदार बाजार में एक चीज लगातार “आउट ऑफ स्टॉक” होती जा रही है  इंसान और इंसानियत की कीमत। हमारे पास महंगे मोबाइल हैं, लेकिन किसी के लिए पांच मिनट नहीं। बड़े घर हैं, लेकिन मन में जगह कम है। बड़ी गाड़ियां हैं, मगर किसी दुखी व्यक्ति के घर जाने का समय नहीं। बैंक बैलेंस बढ़ रहा है, लेकिन भरोसा घट रहा है। यह कैसी प्रगति है?

हमने सुख को भी वस्तुओं से जोड़ दिया है। बड़ा घर मिलेगा तो सुखी होंगे। महंगी गाड़ी मिलेगी तो सुखी होंगे। बैंक बैलेंस बढ़ेगा तो सुखी होंगे। प्रसिद्धि मिलेगी तो सुखी होंगे। लोग प्रशंसा करेंगे तो सुखी होंगे। लेकिन हर उपलब्धि के बाद अगली उपलब्धि सामने खड़ी हो जाती है। यही तृष्णा का खेल है। मनुष्य जिस चीज को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करता है, उसे प्राप्त करते ही उसका आकर्षण कम होने लगता है और दूसरी चीज आकर्षक लगने लगती है। इस दौड़ का कोई अंतिम पड़ाव नहीं है। परिणाम यह होता है कि आदमी पूरी जिन्दगी सुख की तलाश करता है और रास्ते भर छोटे-बड़े दुःख जमा करता जाता है। फिर एक दिन किसी आलीशान कमरे में बैठकर मन अचानक पूछता है कि “जिसके लिए इतनी जिंदगी भागे थे… वह आखिर था कहां?” और तब शायद पहली बार समझ आता है कि मंजिल तो बहुत पहले पीछे छूट गयी थी। हम दूसरों की नजरों में सफल दिखने की दौड़ में अपने ही जीवन से आगे निकल गये हैं।

सफलता बुरी नहीं है। धन, सुविधा, प्रतिष्ठा और उपलब्धियां जीवन को बेहतर बना सकती हैं। समस्या तब पैदा होती है जब साधन ही जीवन का उद्देश्य बन जाते हैं। हमने सफलता का पैमाना बाहरी बना लिया है। कितना कमाते हैं? कहां रहते हैं? कौन-सी गाड़ी चलाते हैं?  कहां घूमते हैं?  कितने लोग जानते हैं? सोशल मीडिया पर कितने फॉलोअर हैं? लेकिन शायद असली प्रश्न होना चाहिए कि क्या हम चैन से सो पाते हैं? क्या अपने लोगों के साथ हंस पाते हैं? क्या किसी दुखी व्यक्ति के काम आ सकते हैं? क्या बिना दिखावे के खुश रह सकते हैं? क्या अपने भीतर के मनुष्य को बचाकर रख पाए हैं? यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं तो बाहरी प्रीमियम जीवन भी भीतर से बहुत साधारण, बल्कि दरिद्र हो सकता है।

आधुनिक समाज ने “साधारण” शब्द को जैसे हीनता का पर्याय बना दिया है। हमें साधारण नौकरी नहीं चाहिए, साधारण घर नहीं चाहिए, साधारण कपड़े नहीं चाहिए, साधारण जीवन नहीं चाहिए। लेकिन जीवन की सुंदरता अक्सर साधारण चीजों में ही छिपी होती है। सुबह की चाय। परिवार के साथ बैठना। पुराने मित्र का फोन। बच्चे की हंसी। मां की आवाज। बारिश की खुशबू। बिना किसी कारण मुस्कुराना। किसी अनजान व्यक्ति की मदद करना। इन सबका कोई प्रीमियम पैकेज नहीं होता, फिर भी इनका मूल्य अनमोल है।

शायद भविष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि यह साबित करना नहीं होगी कि हम कितने प्रीमियम हैं। सबसे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि हम साधारण होकर भी खुश रह सकते हैं। कम में भी जी सकते हैं। बिना दिखावे के सम्मानित हो सकते हैं। बिना आभासी प्रसिद्धि के संतुष्ट रह सकते हैं। बिना हर भावना को सार्वजनिक किये अपने मन को समझ सकते हैं और बिना किसी प्रीमियम पैकेज के इंसान बने रह सकते हैं। क्योंकि जीवन का मूल्य उसके मूल्य-टैग से निर्धारित नहीं होता है। किसी व्यक्ति की कीमत उसके कपड़े, घर, गाड़ी, पद या बैंक खाते से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके होने से कितने लोगों के जीवन में उजाला आता है।

जिन्दगी का सबसे महंगा सुख वही है, जिसे खरीदने के लिए इंसान को अपना सुकून न बेचना पड़े। यदि धन कमाने की कीमत रिश्ते खोना है, तो वह धन महंगा है। यदि प्रसिद्ध होने की कीमत निजता खोना है, तो वह प्रसिद्धि महंगी है। यदि बड़ा बनने की कीमत भीतर के मनुष्य को छोटा करना है, तो ऐसी सफलता भी महंगी है और यदि प्रीमियम जीवन जीने के लिए मन को हमेशा बेचैन रखना पड़े, तो वह प्रीमियम जीवन वास्तव में सबसे साधारण दुःख है। इसलिए शायद हमें जीवन की श्रेणियां बदलने की जरूरत है। निम्नस्तरीय, मध्यमवर्गीय, एलीट और प्रीमियम दुःख से ऊपर उठकर एक ऐसी दुनिया बनानी होगी जहां दुःख को वर्ग नहीं, संवेदना मिले, जहां पीड़ा को लाइक नहीं, कंधा मिले; जहां अकेलेपन को फॉलोअर नहीं, दोस्त मिले और जहां इंसान की पहचान उसकी हैसियत से नहीं, उसकी इंसानियत से हो। आखिर में जीवन हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमारे पास कितना प्रीमियम था। वह शायद केवल इतना पूछेगा कि “तुमने इंसान होकर कितना इंसान बचाए रखा?” और शायद जिंदगी का सबसे बड़ा प्रीमियम भी यही है कि “साधारण रहकर भी असाधारण इंसान बने रहना।”
            -------------

0 Response to "साधारण इंसान की तलाश - दर्द वही बस पैकेजिंग बदल गयी है"

एक टिप्पणी भेजें

Ads on article

Advertise in articles 1

advertising articles 2

Advertise under the article