सत्ता की चमक के पीछे छिपी विवशता

सत्ता की चमक के पीछे छिपी विवशता

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 26 सितम्बर ::

स्वर्ण पिंजरा हो या शीश महल, दोनों की चमक दूर से देखने वाले को आकर्षित करती है। स्वर्ण पिंजरे की सलाखें सोने की हो तो कैद का एहसास कुछ देर के लिए कम जरूर हो सकता है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ नहीं बदलता। ठीक यही स्थिति सत्ता के गलियारों में बैठे उन लोगों की भी दिखाई देती है, जिनका पद, ओहदा और अधिकार बाहर से देखने पर किसी स्वर्णजड़ित आभामंडल की तरह नजर आता है, लेकिन भीतर से वे परिस्थितियों, आदेशों और सत्ता के बदलते मिजाज के बीच लगातार संतुलन साधते रहते हैं। लालफीताशाही की दुनिया भी कुछ ऐसी ही है। फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाला अधिकारी बाहर से बेहद शक्तिशाली दिखाई देता है। उसके कमरे के बाहर लंबी प्रतीक्षा सूची होती है, उसके एक आदेश से कई लोगों की दिशा बदल सकती है और उसके हस्ताक्षर किसी योजना को गति भी दे सकते हैं तथा रोक भी सकते हैं। लेकिन उसी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति यह भी जानता है कि उसकी अपनी स्थिति कितनी स्थायी है। आज जिस कुर्सी पर अधिकार है, कल वही कुर्सी किसी और के हिस्से में हो सकती है। आज जिस आदेश को अंतिम माना जा रहा है, कल उसी आदेश की समीक्षा हो सकती है। आज जिसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है, उसे कल किसी दूसरे विभाग में भेज दिया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यही सत्ता की वास्तविक प्रकृति है कि वह किसी को स्थायी सुरक्षा नहीं देती।

लोकतंत्र में सत्ता सर्वोच्च संवैधानिक और राजनीतिक शक्ति का केंद्र होती है। लेकिन सत्ता के संचालन में लगे लोगों के लिए यह शक्ति जितनी बड़ी दिखाई देती है, उतनी ही बड़ी उसकी जिम्मेदारी भी होती है। एक बड़ा पद जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसके पांव उतने ही अधिक दलदल के ऊपर टिके होते हैं। ऊपर से पद प्रतिष्ठित है, नीचे से अपेक्षाओं का दबाव है। एक तरफ जनता की उम्मीदें, दूसरी तरफ सरकार की प्राथमिकताएं, तीसरी तरफ नियम-कानून और चौथी तरफ राजनीतिक नेतृत्व के निर्देश। इन सबके बीच अधिकारी को रास्ता निकालना पड़ता है। यही कारण है कि किसी अधिकारी की कुर्सी को केवल अधिकार का प्रतीक मानना अधूरा आकलन होगा। वह कुर्सी कई बार जिम्मेदारी, दबाव, भय और अनिश्चितता का मिश्रण भी होती है। जिसे बाहर से देखकर लोग कहते हैं कि “इनके पास तो बहुत ताकत है”। वह व्यक्ति भीतर से शायद यही सोच रहा होता है कि कल क्या होगा, यह आज कोई नहीं जानता है।

सत्ता के गलियारों में बैठे अनेक लोग उन बादलों की तरह दिखाई देते हैं जिन्हें स्वयं नहीं मालूम कि कब गरजना है और कहां बरसना है। उनका अस्तित्व कई बार उस राजनीतिक हवा की दिशा पर निर्भर दिखाई देता है, जो ऊपर से चलती है। यह स्थिति किसी एक व्यक्ति या किसी एक कालखंड की कहानी नहीं है। शासन व्यवस्था में पद और अधिकार का संबंध हमेशा सत्ता के केंद्र से जुड़ा रहा है। लोकतंत्र में सरकार बदलती है, प्राथमिकताएं बदलती हैं, नेतृत्व बदलता है और उसके साथ प्रशासनिक समीकरण भी बदलते हैं। इस बदलाव का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है जो सत्ता के प्रशासनिक ढांचे को जमीन पर लागू करते हैं। कुर्सी पर बैठा व्यक्ति चाहे कितना ही अनुभवी क्यों न हो, उसे परिस्थितियों के साथ चलना पड़ता है। वह अपनी व्यक्तिगत पसंद से अधिक व्यवस्था की अपेक्षाओं का पालन करता है। यही प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता भी है, लेकिन यहीं से एक दूसरी समस्या जन्म लेती है कि व्यक्ति की योग्यता और कुर्सी की सुरक्षा हमेशा एक-दूसरे की गारंटी नहीं होती है।

किताबों में महारत हासिल करना एक बात है और सत्ता के गलियारों की भाषा समझना दूसरी बात। एक अधिकारी कितना ही कुशाग्र क्यों न हो, उसके सामने केवल कानून की किताब नहीं होती है। उसे परिस्थितियों को पढ़ना पड़ता है। उसे समझना पड़ता है कि किस विषय की प्राथमिकता क्या है, किस आदेश का प्रशासनिक महत्व कितना है और किस निर्णय का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। यहीं से चापलूसी और पेशेवर विवेक के बीच की महीन रेखा सामने आती है। किसी भी व्यवस्था में योग्य व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वह सम्मान और चापलूसी में अंतर बनाए रखे। सत्ता के सामने सच बोलना कठिन हो सकता है, लेकिन केवल प्रसन्न करने के लिए हर निर्णय की प्रशंसा करना व्यवस्था को भीतर से कमजोर करता है। चापलूसी तत्काल लाभ दे सकती है, लेकिन संस्थागत मजबूती नहीं। दुर्भाग्य यह है कि कई बार व्यवस्था में वही व्यक्ति अधिक सुविधाजनक समझा जाता है जो प्रश्न कम पूछता है और आदेशों को सहजता से स्वीकार करता है। जबकि लोकतांत्रिक प्रशासन को ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो नियमों के भीतर रहकर असहमति भी व्यक्त कर सकें और सही विकल्प भी सुझा सके।

प्रशासनिक या संस्थागत व्यवस्था में किसी व्यक्ति की छवि जितनी कठोर होती है, उससे अपेक्षाएं भी उतनी ही अधिक होती हैं। लेकिन कठोर छवि का अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति परिस्थितियों से अछूता है। कई बार सबसे अनुशासित व्यक्ति ही सबसे पहले दबाव में आ जाता है, क्योंकि उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह व्यवस्था को बिना शिकायत चलाएगा। उसकी ईमानदारी, उसकी कार्यकुशलता और उसकी सख्ती ही कभी-कभी उसके लिए चुनौती बन जाती है। वह समझौते की भाषा कम बोलता है, इसलिए उसके आसपास के लोग उसे कठिन व्यक्ति मान सकते हैं। दूसरी ओर, अत्यधिक लचीला व्यक्ति परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालकर अपना रास्ता निकाल लेता है। लेकिन यहां भी सवाल यही है कि व्यवस्था को किस प्रकार के व्यक्तित्व की जरूरत है? यदि व्यवस्था केवल सुविधा के अनुसार चलने वाले लोगों को पुरस्कृत करेगी तो धीरे-धीरे संस्थागत साहस कमजोर होगा। यदि नियमों और विवेक के साथ काम करने वालों को सम्मान मिलेगा तो प्रशासन में विश्वास मजबूत होगा।

भारतीय लोकतंत्र में खादी केवल वस्त्र नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक नेतृत्व का एक ऐतिहासिक प्रतीक भी रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक राजनीति तक खादी ने सत्ता और जनसेवा की अनेक छवियां देखी है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण संस्था होनी चाहिए। कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बदल सकता है, लेकिन संस्था बनी रहती है। सरकार बदल सकती है, लेकिन शासन व्यवस्था चलती रहती है। अधिकारी बदल सकता है, लेकिन विभाग बना रहता है। इसलिए लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती किसी एक व्यक्ति के प्रभाव में नहीं, बल्कि संस्थाओं की निरंतरता और नियमों की विश्वसनीयता में है। समस्या तब शुरू होती है जब संस्था से अधिक व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाता है। जब निर्णय नियम से अधिक व्यक्ति की पसंद पर निर्भर होने लगे, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था का संतुलन कमजोर पड़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि व्यक्ति का सम्मान हो, लेकिन संस्था सर्वोपरि रहे।

सत्ता की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि कोई नहीं जानता कि किस दिन कौन सा आदेश उसकी दिशा बदल देगा। जिस व्यक्ति को कल तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली थी, वह आज किसी दूसरे पद पर भेजा जा सकता है। जिसे आज केंद्र में रखा गया है, वह कल परिधि पर दिखाई दे सकता है। जिसे आज सम्मान मिल रहा है, उसे कल स्पष्टीकरण देना पड़ सकता है। यह केवल प्रशासनिक सेवा तक सीमित नहीं है। राजनीति, संगठन, संस्थान और सार्वजनिक जीवन में हर जगह पद की प्रकृति अस्थायी है। इसलिए पद पर बैठने वाले व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी पूंजी उसका पद नहीं, बल्कि उसका काम होना चाहिए। कुर्सी छिन सकती है, लेकिन कर्म का रिकॉर्ड नहीं छिनता। यही वह अंतर है जो व्यक्ति को पद से बड़ा बनाता है।

लालफीताशाही का अर्थ अक्सर फाइलों के अटकने, नियमों के जाल और अनावश्यक प्रक्रियाओं से लगाया जाता है। लेकिन इसकी जड़ केवल कागजों में नहीं, मानसिकता में भी होती है। जब कोई अधिकारी निर्णय लेने से इसलिए बचता है कि कहीं बाद में उस पर सवाल न उठ जाए, तब लालफीताशाही जन्म लेती है। जब कोई कर्मचारी कहता है कि “ऊपर से आदेश नहीं है”, तब व्यवस्था की जिम्मेदारी नीचे से ऊपर चली जाती है। जब हर निर्णय के लिए अनेक स्तरों की स्वीकृति आवश्यक हो जाती है, तब प्रशासनिक गति धीमी होती है। लेकिन इसके उलट बिना नियमों की परवाह किए निर्णय लेना भी उचित नहीं है। लोकतंत्र में अधिकार के साथ जवाबदेही भी आवश्यक है। इसलिए आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें नियम निर्णय को रोकने का हथियार न बनें, बल्कि सही निर्णय का आधार बने।

लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जनता के प्रति जवाबदेही, संस्थाओं के प्रति सम्मान और कानून के प्रति प्रतिबद्धता। सत्ता में बैठे लोगों के पास अधिकार होना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि अधिकार के उपयोग की सीमाएं स्पष्ट हो। यदि किसी अधिकारी को हर समय यह भय रहे कि किसी भी क्षण उसके निर्णय के कारण उसका पद बदल सकता है, तो वह जोखिम लेने से बचेगा और यदि अधिकारी को यह विश्वास हो कि नियमों के अनुसार लिया गया निर्णय संस्थागत संरक्षण पाएगा, तो वह अधिक स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के साथ काम कर सकेगा। इसलिए प्रशासनिक सुधार केवल फाइलों को डिजिटल करने या प्रक्रियाएं सरल करने का नाम नहीं है। असली सुधार वह होगा जिसमें ईमानदार निर्णय लेने का साहस और गलत निर्णय की जवाबदेही, दोनों साथ चले।

हर सत्ता के आसपास कुछ ऐसे लोग होते हैं जो उसके निर्णयों में केवल अच्छाई देखते हैं। वे हर आदेश में दूरदृष्टि खोज लेते हैं और हर निर्णय की प्रशंसा को अपना कर्तव्य मान लेते हैं। लेकिन किसी भी नेतृत्व के लिए सबसे उपयोगी व्यक्ति वह नहीं जो हर बात पर “जी” कहे, बल्कि वह है जो उचित समय पर सम्मानपूर्वक “नहीं” कह सके। असहमति विद्रोह नहीं होती है। प्रश्न करना अवज्ञा नहीं होता है। सुधार का सुझाव विरोध नहीं होता है। बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र में यही संस्थागत मजबूती के संकेत हैं। जिस व्यवस्था में केवल प्रशंसा सुनाई देती है, वहां गलतियों का पता देर से चलता है। जिस व्यवस्था में तथ्य और तर्क के साथ असहमति की जगह होती है, वहां सुधार की संभावना अधिक रहती है।

आखिरकार स्वर्ण पिंजरा कितना भी सुंदर क्यों न हो, पिंजरा ही रहता है। शीश महल कितना भी चमकदार क्यों न हो, उसकी दीवारें कांच की होती है। सत्ता की चमक भी ऐसी ही है। वह बाहर से आकर्षक दिखाई देती है, लेकिन भीतर जिम्मेदारियों, दबावों और अनिश्चितताओं का संसार होता है। आज का शक्तिशाली व्यक्ति कल सामान्य नागरिक की तरह अपनी राह पर हो सकता है। आज की प्रभावशाली कुर्सी कल किसी दूसरे व्यक्ति के पास होगी। इसलिए सत्ता से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “मेरी कुर्सी कितने दिनों तक रहेगी?” बल्कि प्रश्न होना चाहिए कि “जब तक यह कुर्सी मेरे पास है, मैं इसके अधिकार का उपयोग किसके लिए कर रहा हूं?” यदि उत्तर जनता, व्यवस्था, कानून और संस्थागत मर्यादा के पक्ष में है, तो पद का महत्व सार्थक हो जाता है। वरना स्वर्ण पिंजरा हो या शीश महल, चमक बाहर ही दिखाई देती है। अंदर बैठे व्यक्ति को हमेशा पता रहता है कि दरवाजा किसके हाथ में है और लोकतंत्र की यही सबसे बड़ी सीख है कि कुर्सी किसी की स्थायी संपत्ति नहीं होती है। सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन संस्थाएं और जनता उससे कहीं अधिक स्थायी होती है।
              -------------

0 Response to "सत्ता की चमक के पीछे छिपी विवशता"

एक टिप्पणी भेजें

Ads on article

Advertise in articles 1

advertising articles 2

Advertise under the article