पिता की जिन्दगी में पैतृक संपत्ति पर बेटे का दावा नहीं

पिता की जिन्दगी में पैतृक संपत्ति पर बेटे का दावा नहीं

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 19 सितम्बर ::

पैतृक संपत्ति में बेटे के अधिकार को लेकर समाज में अक्सर यह धारणा बनी रहती है कि पिता के पास मौजूद पुश्तैनी जमीन या मकान में बेटे का जन्म लेते ही हिस्सा तय हो जाता है। लेकिन संपत्ति कानून की बारीकियां इस सामान्य धारणा से अलग हो सकती है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने ऐसे ही एक विवाद की सुनवाई करते हुए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के बाद पैतृक संपत्ति में अधिकार के सवाल पर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। जस्टिस आशीष श्रोती की एकल पीठ ने कहा है कि 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के बाद पुराने हिन्दू कानून में मौजूद जन्मसिद्ध अधिकार के सिद्धांत को उसी रूप में लागू नहीं किया जा सकता है। अदालत ने संबंधित मामले में निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखते हुए बेटे की ओर से पिता के जीवित रहते पैतृक संपत्ति में हिस्से और बंटवारे की मांग को स्वीकार नहीं किया है। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में पैतृक संपत्ति को लेकर परिवारों के बीच होने वाले विवादों में अक्सर ‘जन्म से हिस्सा’ और ‘उत्तराधिकार में हिस्सा’ को एक ही बात मान लिया जाता है। जबकि दोनों के बीच कानूनी अंतर है।

पैतृक संपत्ति का नाम आते ही आम तौर पर यह बात कही जाती है कि बेटा पैदा होते ही पिता की संपत्ति में हिस्सेदार बन जाता है। यह धारणा हिन्दू संयुक्त परिवार और पारंपरिक मिताक्षरा कानून की व्यवस्था से जुड़ी रही है। पुराने हिन्दू कानून में सहदायिक यानि coparcenary संपत्ति में जन्म से अधिकार की अवधारणा महत्वपूर्ण थी। परिवार की ऐसी संपत्ति में कुछ सदस्यों को जन्म के आधार पर अधिकार प्राप्त होता था। इसी वजह से लंबे समय तक यह माना जाता रहा है कि बेटे को पिता की पैतृक संपत्ति में जन्म लेते ही हिस्सा मिल जाता है। लेकिन स्वतंत्र भारत में उत्तराधिकार संबंधी कानून को व्यवस्थित करने के लिए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 बनाया गया है। इसके बाद उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकारों से संबंधित व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव आए। ग्वालियर खंडपीठ के समक्ष भी मूल सवाल यही था कि क्या 1956 के बाद किसी बेटे को केवल इस आधार पर पिता की संपत्ति में जन्मसिद्ध हिस्सा मिल सकता है कि वह संयुक्त हिन्दू परिवार का सदस्य है।

मामला अशोकनगर निवासी हरीराम से जुड़ा था। उन्होंने अपने पिता मंगलीया और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ दीवानी अदालत में मुकदमा दायर किया था। विवादित कृषि भूमि मूल रूप से उनके परदादा बलदेवा की बताई गई थी। बलदेवा की मृत्यु के बाद यह जमीन उनके तीन बेटों यथा- कम्मोदा, जुगती और सोमा, के हिस्से में गई। कम्मोदा के बेटे मंगलीया थे और मंगलीया के बेटे हरीराम थे। यानि विवादित संपत्ति की पारिवारिक कड़ी इस प्रकार थी- बलदेवा → कम्मोदा → मंगलीया → हरीराम। हरीराम का दावा था कि विवादित जमीन पैतृक और संयुक्त परिवार की संपत्ति है। इसलिए वह परिवार का सहदायिक सदस्य होने के कारण जन्म से ही उसमें अधिकार रखता है। उन्होंने अपने पिता मंगलीया के कथित 1/3 हिस्से में से 1/5 हिस्सा अपने लिए मांगा था।

हरीराम की ओर से मुख्य तर्क यह था कि वह संयुक्त हिन्दू परिवार का सदस्य है और विवादित भूमि पैतृक संपत्ति है। इसलिए उसका अधिकार केवल पिता की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी के रूप में पैदा नहीं होता है, बल्कि जन्म के साथ ही संपत्ति में उसका हिस्सा बन जाता है। इस दलील का आधार पारंपरिक सहदायिकी व्यवस्था थी। सरल शब्दों में हरीराम का कहना था कि अगर जमीन उसके परदादा की थी और परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है, तो केवल इस वजह से उसका अधिकार समाप्त नहीं हो सकता है कि उसके पिता अभी जीवित हैं। उन्होंने इसी आधार पर पिता के हिस्से में भी अपने लिए हिस्सा निर्धारित करने की मांग की।

हरीराम की मांग निचली अदालतों में स्वीकार नहीं हुई। इसके बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा। हाईकोर्ट के समक्ष यह देखना था कि क्या 1956 के बाद लागू कानून के तहत बेटे को पिता के जीवित रहते ऐसी संपत्ति में जन्म के आधार पर हिस्सा मांगने का अधिकार है। अदालत ने मामले में लागू कानून और संबंधित उत्तराधिकार व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए निचली अदालतों के निर्णय को सही माना। यहीं से यह मामला व्यापक कानूनी महत्व हासिल करता है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 ने हिन्दुओं में उत्तराधिकार से जुड़े कई नियमों को वैधानिक रूप दिया है। इसके लागू होने के बाद केवल परंपरागत हिन्दू कानून की अवधारणाओं के आधार पर संपत्ति का अधिकार तय नहीं किया जा सकता था। ग्वालियर हाईकोर्ट की व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहलू यही है कि 1956 के बाद उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों को वैधानिक कानून की कसौटी पर देखा जाना होगा। अदालत ने उस पुराने जन्मसिद्ध अधिकार के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया, जिसके आधार पर हरीराम ने अपने पिता के जीवित रहते उनके हिस्से में अपना हिस्सा मांगा था। इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि हर स्थिति में पिता की संपत्ति में बेटे का कोई अधिकार नहीं होता है। असली प्रश्न यह है कि संपत्ति की कानूनी प्रकृति क्या है, वह किस प्रकार अर्जित हुई, किस कानून के तहत उत्तराधिकार खुला और संबंधित परिवार पर कौन-सी कानूनी व्यवस्था लागू होती है। यही वह बिंदु है जहां आम लोगों को सबसे अधिक भ्रम होता है।

किसी जमीन को परिवार में कई पीढ़ियों से चली आ रही संपत्ति कह देना और उसे कानूनी रूप से ऐसी सहदायिक संपत्ति मान लेना एक ही बात नहीं है। किसी संपत्ति पर अधिकार निर्धारित करने के लिए यह देखा जाता है कि संपत्ति मूल रूप से किसके नाम थी? वह किस तरीके से अगली पीढ़ी को मिली? उत्तराधिकार कब खुला? संबंधित समय में कौन-सा कानून लागू था? परिवार की संपत्ति की कानूनी प्रकृति क्या थी? क्या वह वास्तव में संयुक्त सहदायिक संपत्ति थी? संबंधित व्यक्ति का अधिकार जन्म से बनता था या उत्तराधिकार खुलने के बाद? इसलिए ‘दादा की जमीन’ या ‘परदादा की जमीन’ कह देना अपने आप में किसी व्यक्ति के वर्तमान हिस्से का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं है।

इस मामले को समझने के लिए दो अवधारणाओं का अंतर महत्वपूर्ण है। पहला पारंपरिक मिताक्षरा सहदायिकी व्यवस्था में कुछ परिस्थितियों में परिवार की सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार की अवधारणा थी। ऐसी स्थिति में बच्चा जन्म लेते ही सहदायिक संरचना का हिस्सा माना जाता था। दूसरा उत्तराधिकार का अधिकार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद संपत्ति में उसके कानूनी उत्तराधिकारियों के पक्ष में खुल सकता है। इसमें लागू कानून के अनुसार हिस्से निर्धारित होते हैं। इन्हीं दोनों अवधारणाओं को लेकर अक्सर पारिवारिक विवाद पैदा होते हैं। ग्वालियर हाईकोर्ट के सामने हरीराम का दावा मुख्य रूप से जन्म से अधिकार की अवधारणा पर आधारित था, जबकि अदालत ने 1956 के बाद की वैधानिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना।

मामले की चर्चा करते समय एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट रखना जरूरी है। हिन्दू उत्तराधिकार कानून में बाद के वर्षों में भी महत्वपूर्ण संशोधन हुए हैं। विशेष रूप से हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने बेटियों के सहदायिक अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण बदलाव किया। इसके तहत बेटी को बेटे के समान सहदायिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। इसलिए आज पैतृक या सहदायिक संपत्ति से जुड़े विवादों में केवल यह कह देना कि ‘बेटा है इसलिए हिस्सा है’ या ‘बेटी है इसलिए हिस्सा नहीं है’ कानून की पूरी स्थिति नहीं बताता है। हर मामले में संपत्ति की प्रकृति, पारिवारिक स्थिति, उत्तराधिकार खुलने का समय और लागू कानूनी प्रावधानों को देखना पड़ता है।

हिन्दू उत्तराधिकार कानून का इतिहास एक ही तारीख पर रुकता नहीं है। 1956 में अधिनियम लागू हुआ, लेकिन बाद में न्यायिक व्याख्याओं और विधायी संशोधनों के कारण व्यवस्था में और बदलाव हुए। 2005 का संशोधन विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। इससे बेटियों को भी सहदायिक संपत्ति में बेटे के समान अधिकार मिला। इसलिए आज किसी संपत्ति विवाद का समाधान करते समय केवल 1956 के कानून का हवाला देना पर्याप्त नहीं हो सकता। यह भी देखना जरूरी है कि संबंधित संपत्ति और उत्तराधिकार की परिस्थितियां किस समय की हैं तथा 2005 के संशोधन का मामला कैसे प्रभावित होता है। यही कारण है कि संपत्ति विवादों में दस्तावेज और घटनाओं की पूरी समय-रेखा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

पैतृक संपत्ति के विवादों में अक्सर परिवार के सदस्य कहते हैं कि ‘यह हमारे दादा की जमीन थी’, ‘यह पुश्तैनी मकान है’ या ‘मेरा जन्म इसी परिवार में हुआ है, इसलिए मेरा हिस्सा तय है।’ लेकिन अदालत में संपत्ति का अधिकार केवल पारिवारिक धारणा से निर्धारित नहीं होता है। राजस्व रिकॉर्ड, उत्तराधिकार संबंधी दस्तावेज, वसीयत, बंटवारा, बिक्री या हस्तांतरण के दस्तावेज और परिवार की कानूनी स्थिति जैसे प्रमाण महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए किसी जमीन को लेकर विवाद पैदा होने पर बिना दस्तावेज देखे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि किसका कितना हिस्सा है।

ग्वालियर हाईकोर्ट का यह फैसला उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी संकेत देता है जहां पिता के जीवित रहते बेटा पैतृक संपत्ति में तत्काल बंटवारे की मांग करता है। अदालत ने संबंधित मामले में यह स्पष्ट किया है कि केवल पारंपरिक ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ की धारणा के आधार पर ऐसा दावा नहीं किया जा सकता है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर पिता की हर संपत्ति पर बेटे का कोई अधिकार नहीं होगा, बल्कि अधिकार का निर्धारण संपत्ति की प्रकृति और लागू कानून के आधार पर होगा। यही अंतर इस फैसले को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

अगर किसी परिवार में जमीन या मकान को लेकर विवाद है, तो सबसे पहले इन सवालों के जवाब तलाशने चाहिए कि संपत्ति वास्तव में किसकी थी? केवल पारिवारिक परंपरा के आधार पर नहीं, दस्तावेजों से पता करें। संपत्ति अगली पीढ़ी को कैसे मिली? उत्तराधिकार, बंटवारे, खरीद, उपहार या किसी अन्य माध्यम से? उत्तराधिकार कब खुला? संपत्ति के इतिहास में मृत्यु की तारीखें महत्वपूर्ण हो सकती है। संपत्ति की कानूनी प्रकृति क्या है? क्या वह व्यक्तिगत संपत्ति है या वैध रूप से सहदायिक/संयुक्त संपत्ति? संबंधित समय पर कौन-सा कानून लागू था? 1956 के अधिनियम और 2005 के संशोधन सहित लागू प्रावधानों को देखना होगा।

ग्वालियर हाईकोर्ट का फैसला आम लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आता है कि पैतृक संपत्ति के अधिकार को केवल पारिवारिक परंपरा या जन्म के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। हरीराम के मामले में जमीन उनके परदादा बलदेवा से परिवार में आई थी। लेकिन केवल इस पारिवारिक इतिहास के आधार पर पिता के जीवित रहते उनके हिस्से में बेटे का हिस्सा स्वतः निर्धारित नहीं हो गया है। इस मामले में अदालत ने 1956 के बाद की वैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा। इससे यह बात सामने आती है कि संपत्ति कानून में ‘पैतृक’, ‘संयुक्त परिवार’, ‘सहदायिक’, ‘उत्तराधिकार’ और ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ जैसे शब्दों का अपना अलग कानूनी अर्थ है। आम बोलचाल में इनके अर्थ भले एक जैसे लगे, लेकिन अदालत में इनके आधार पर अधिकारों का निर्धारण अलग-अलग कानूनी कसौटियों से होता है।

पैतृक संपत्ति केवल जमीन या मकान का सवाल नहीं होती है। इसके साथ परिवार की कई पीढ़ियों की स्मृतियां, भावनाएं और रिश्ते जुड़े होते हैं। इसी कारण संपत्ति का विवाद अक्सर अदालत तक पहुंचने से पहले ही परिवारों में तनाव पैदा कर देता है। लेकिन कानून की दृष्टि से भावनाओं से अधिक महत्वपूर्ण है संपत्ति का दस्तावेजी इतिहास और उस पर लागू कानून। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला इसी कानूनी पहलू को रेखांकित करता है कि 1956 के बाद हिन्दू उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों को वैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में देखा जाना चाहिए और केवल पुराने जन्मसिद्ध अधिकार के सिद्धांत के आधार पर पिता के जीवित रहते उनके हिस्से में बेटे का हिस्सा मांगना स्वीकार्य नहीं है, जैसा कि इस मामले में अदालत ने माना। साथ ही, किसी विशेष परिवार की जमीन के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले दस्तावेज, संपत्ति की प्रकृति, उत्तराधिकार की तारीखें और लागू कानून की जांच आवश्यक है। यही सावधानी भविष्य के लंबे पारिवारिक मुकदमों से बचने का सबसे व्यावहारिक रास्ता भी हो सकती है।
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