एल नीनो के दौरान पशुधन स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रबंधन

एल नीनो के दौरान पशुधन स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रबंधन

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना
एल नीनो लेख श्रृंखला
एल नीनो के दौरान पशुधन स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रबंधन
लेखकगण: नीति लखानी, कमल शर्मा, शंकर दयाल एवं अनूप दास  
एल नीनो एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटना है, जिसके दौरान विश्व के कई क्षेत्रों में कम वर्षा, सूखा, अत्यधिक गर्मी, जबकि कुछ स्थानों पर अनियमित वर्षा, अधिक नमी की स्थिति बन जाती है। इन परिस्थितियों का सीधा प्रभाव पशुओं पर पड़ता है। पशुओं में चारा एवं पानी की कमी, गर्मी का तनाव, रोग प्रतिरोधक क्षमता में गिरावट, संक्रामक रोगों का प्रकोप तथा दूध उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता में कमी देखने को मिलती है। ऐसे में, निम्नलिखित वैज्ञानिक प्रबंधन उपायों को अपनाकर एल नीनो के प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सकता है।
1. अत्यधिक गर्मी से पशुओं का बचाव: अत्यधिक तापमान पशुओं में गर्मी का तनाव उत्पन्न करता है, जिससे दूध उत्पादन, वृद्धि, प्रजनन क्षमता तथा रोग प्रतिरोधक शक्ति प्रभावित होती है। इससे बचाव के लिए पशुओं को पेड़ों या पशु शेड की छाया में रखना चाहिए तथा पशुशाला में पर्याप्त वायु संचार की व्यवस्था करनी चाहिए। आवश्यकता अनुसार पंखे या स्प्रिंकलर का उपयोग भी लाभकारी होता है। पशुओं को सुबह 5 से 9 बजे तथा शाम 4 से 7 बजे के बीच ही चराना चाहिए। पशुशाला में भीड़भाड़ न होने दें, क्योंकि इससे गर्मी का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यदि पशु तेज सांस लेने लगे, मुंह खोलकर हाँफे, अत्यधिक लार गिराए, चारा कम खाए, सुस्त दिखाई दे अथवा दूध उत्पादन में कमी आए तो यह गर्मी के तनाव के लक्षण हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में पशु को छायादार स्थान पर ले जाकर शरीर पर ठंडा पानी डालें और आवश्यक होने पर पशु चिकित्सक से उपचार कराएँ।
2. चारा एवं पोषण प्रबंधन: एल नीनो के दौरान सूखे की संभावना होने पर पशुओं के लिए पर्याप्त एवं पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना सबसे बड़ी चुनौती होती है। हरे चारे की उपलब्धता के समय साइलेज, सूखा चारा एवं भूसे का पर्याप्त भंडारण कर लेना चाहिए। धान के पुआल तथा अन्य कृषि अवशेषों का 4% यूरिया से उपचार कर उनकी पोषण गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है। अजोला, हाइड्रोपोनिक हरा चारा तथा अन्य वैकल्पिक चारा स्रोतों का उपयोग भी चारे की कमी को पूरा करने में सहायक होता है। पशुपालकों को ज्वार, बाजरा एवं लोबिया जैसी सूखा सहिष्णु चारा फसलों की खेती को अपनाना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर बबूल, पीपल, बरगद एवं शहतूत जैसे पौष्टिक वृक्षों की पत्तियों का सीमित मात्रा में उपयोग किया जा सकता है। संतुलित आहार, मिनरल मिक्सचर तथा विटामिन C, विटामिन E, सेलेनियम एवं इलेक्ट्रोलाइट्स का समुचित उपयोग पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में सहायक होता है। गर्मी के मौसम में पशुओं को सुबह और शाम के ठंडे समय में चारा खिलाएँ, ताकि वे अधिक मात्रा में चारा खा सकें।
3. स्वच्छ एवं पर्याप्त पेयजल की उपलब्धता: अल नीनो के दौरान जल संकट और अत्यधिक गर्मी दोनों की संभावना रहती है। इसलिए पशुओं को हर समय स्वच्छ, ठंडा एवं पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्ध कराना आवश्यक है। पानी की टंकियों और कुंडों की नियमित सफाई करें तथा उन्हें छाया में रखें, ताकि पशुओं को ठंडा पानी मिल सके। वर्षा जल संचयन तथा अतिरिक्त जल भंडारण की व्यवस्था भी करनी चाहिए। 
   
चित्र: स्वच्छ एवं पर्याप्त मात्रा में पेयजल और चारा उपलब्ध कराना
4. चिकित्सा प्रबंधन एवं रोगों से बचाव: पशुओं का गलघोटू, ब्लैक क्वार्टर, एन्थ्रेक्स तथा लम्पी स्किन डिजीज के विरुद्ध समय पर टीकाकरण अवश्य कराएँ। नियमित कृमिनाशन, किलनी, जूं एवं मक्खियों जैसे परजीवियों का नियंत्रण करें। पशुशाला के फर्श पर आवश्यकतानुसार चूने का छिड़काव करें। पशुओं में तेज बुखार, खाँसी, त्वचा पर गांठें, खुर गलना या अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत निकटतम पशु चिकित्सालय से संपर्क करें। अधिक नमी के कारण खुर गलन तथा अन्य त्वचा रोगों की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए पशुओं को लंबे समय तक कीचड़युक्त स्थानों पर नहीं रखना चाहिए। 
5. चारा एवं दाने का सुरक्षित भंडारण: अधिक नमी के कारण चारे एवं दानों में फफूंद लगने का खतरा बढ़ जाता है, जो पशुओं के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। इसलिए चारा एवं दानों को हमेशा सूखे एवं हवादार स्थान पर संग्रहित करें तथा बोरियों को लकड़ी के तख्तों पर रखें। फफूंदयुक्त चारा कभी भी पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए। 

निष्कर्ष: एल नीनो के प्रभाव को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन सही समय पर किए गए प्रबंधन उपायों से इसके कारण होने वाली हानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि पशुपालक पहले से चारे एवं पानी की व्यवस्था करें, पशुशाला को स्वच्छ एवं हवादार रखें, समय पर टीकाकरण एवं कृमिनाशन कराएँ तथा बीमार पशुओं का तुरंत उपचार कराएँ, तो वे अपने पशुधन के स्वास्थ्य, उत्पादन एवं आर्थिक लाभ की प्रभावी ढंग से रक्षा कर सकते हैं।

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