सब्जी उत्पादकों के लिए कम वर्षा वाले क्षेत्रों हेतु आपातकालीन योजना
*भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना*
*एल नीनो लेख श्रृंखला*
*सब्जी उत्पादकों के लिए कम वर्षा वाले क्षेत्रों हेतु आपातकालीन योजना*
*लेखकगण: कुमारी शुभा, मनीषा टम्टा, संजीव कुमार एवं अनुप दास*
एल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसके कारण भारत में सामान्यतः मानसून कमजोर पड़ जाता है एवं वर्षा कम होती है, तापमान बढ़ जाता है तथा लंबे समय तक शुष्क मौसम बना रहता है। ऐसी परिस्थितियों में सब्जी फसलें सबसे अधिक प्रभावित होती हैं क्योंकि इन्हें पूरे जीवन चक्र में पर्याप्त नमी एवं संतुलित तापमान की आवश्यकता होती है। एल नीनो के दौरान पौधों में अंकुरण कम होता है, फूल एवं फल झड़ते हैं, उत्पादन घटता है तथा कीट एवं रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। इसलिए किसानों को सामान्य खेती के बजाय आपातकालीन प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता होती है।
एल नीनो के दौरान सब्जी उत्पादन हेतु चरणवार आपातकालीन योजना
1. नर्सरी प्रबंधन: एल नीनो में उच्च तापमान और कम नमी से बचाव हेतु ऊँची क्यारियाँ, शेडनेट, मल्चिंग, हल्की सिंचाई, प्रो-ट्रे नर्सरी और बीजोपचार (ट्राइकोडर्मा विरिडी @ 4 ग्राम/किग्रा बीज) अपनाएँ। इससे स्वस्थ एवं मजबूत पौध तैयार होती है।
2. खेत की तैयारी: अच्छी सड़ी जैविक खाद का प्रयोग, मिट्टी परीक्षण आधारित पोषण, मेड़बंदी, जल संचयन और ड्रिप सिंचाई से मिट्टी में नमी संरक्षित रहती है तथा फसल की प्रारंभिक वृद्धि बेहतर होती है।
3. रोपाई एवं बुवाई: रोपाई शाम के समय पर्याप्त नमी वाली मिट्टी में करें। रोपाई के बाद हल्की सिंचाई, ट्राइकोडर्मा विरिडी @ 5 ग्राम/लीटर पानी के घोल में जड़ों को 20–30 मिनट डुबोकर जड़ उपचार और उचित पौध दूरी अपनाने से पौध स्थापना एवं वृद्धि में सुधार होता है।
4. सिंचाई प्रबंधन: कम वर्षा और अधिक तापमान में ड्रिप विधि द्वारा सिंचाई, नियमित हल्की सिंचाई, मल्चिंग (सूखी फसल अवशेष/पुआल) की 5–7 सेमी मोटी परत तथा प्लास्टिक मल्च 25–50 माइक्रोन (µm) और वर्षा जल संरक्षण तकनीकों से जल की बचत होती है तथा फसल को जमीन से उचित नमी मिलती रहती है।
5. पोषक तत्व प्रबंधन: एल नीनो के दौरान पौधों की पोषक तत्व ग्रहण करने की क्षमता घट जाती है। संतुलित एनपीके (NPK) @ 60:40:40 किग्रा/हेक्टेयर, सूक्ष्म पोषक तत्वों के छिड़काव, जैव खाद एवं जैव उर्वरकों के प्रयोग से पौधों की एल नीनो जनित सूखे के प्रति सहनशीलता बढ़ती है।
6. मल्चिंग एवं नमी संरक्षण: मल्चिंग मिट्टी से पानी के वाष्पीकरण को कम कर भूमि की नमी को संरक्षित करती है, तापमान नियंत्रित रखती है और खरपतवारों को रोकती है, जिससे सूखे की स्थिति में भी फसल का विकास बेहतर रहता है।
7. फूल एवं फल बनने की अवस्था: फूल एवं फल बनने के समय पौधों को नमी की कमी नहीं होने दें। हल्की सिंचाई, सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे बोरॉन @ 0.2% (2 ग्राम/लीटर पानी) तथा जिंक सल्फेट @ 0.5% (5 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव और शेडनेट का उपयोग करके फूल एवं फल झड़ने की समस्या कम की जा सकती है।
8. तुड़ाई एवं कटाई: फलों की तुड़ाई सुबह या शाम के समय करें। कटाई के बाद उपज को छाया में रखें, उचित ग्रेडिंग करें और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए शीघ्र विपणन करें।
9. समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन: फसल की नियमित निगरानी करें, रोगग्रस्त पौधों को हटाएँ तथा जल निकास बनाए रखें। रोग की पहचान के बाद ही अनुशंसित फफूंदनाशी/कीटनाशी का लेबल एवं स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय/कृषि विभाग की अनुशंसा के अनुसार प्रयोग करें। रासायनिक दवाओं के अनावश्यक एवं बार-बार प्रयोग से बचें तथा जैविक एवं यांत्रिक नियंत्रण विधियों को प्राथमिकता दें।
एल नीनो के प्रभाव को कम करने की प्रभावी तकनीकें:
तकनीक लाभ
ड्रिप सिंचाई 30–50% तक जल की बचत
मल्चिंग नमी संरक्षण एवं तापमान नियंत्रण
शेडनेट पौधों को गर्मी से सुरक्षा
वर्षा जल संचयन सिंचाई हेतु अतिरिक्त/ आकस्मिक जल की उपलब्धता
जैविक खाद जलधारण क्षमता में वृद्धि
मौसम आधारित सलाह समय पर कृषि कार्य निर्णय लेने में सहायक
निष्कर्ष: वर्तमान परिस्थितियाँ- कम वर्षा, अधिक तापमान और लंबा शुष्क दौर सब्जी उत्पादन के लिए गंभीर चुनौती है, लेकिन वैज्ञानिक एवं समयबद्ध प्रबंधन से इनके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सही समय पर सही निर्णय ही एल नीनो के प्रभाव को आपदा से अवसर में बदल सकता है। जल की प्रत्येक बूंद का संरक्षण, स्वस्थ पौधों की स्थापना और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन न केवल उत्पादन एवं गुणवत्ता को बनाए रखेगा, बल्कि किसानों की आय, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा जलवायु सहनशीलता को भी मजबूत करेगा।
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