स्वतंत्रता के 80वें वर्ष की दहलीज पर भारत : 79 वर्षों की यात्रा
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 15 अगस्त ::
15 अगस्त 2026 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। देश अपनी स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 79 वर्ष की यह यात्रा केवल समय बीतने की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष, बलिदान, निर्माण, उपलब्धियों, सफलताओं-असफलताओं और निरंतर आगे बढ़ने की जिजीविषा का दस्तावेज है। 1947 में जिस भारत ने सदियों की गुलामी से मुक्ति पाई थी, वह आज दुनिया के सामने एक आत्मविश्वासी, लोकतांत्रिक, युवा और तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था वाले राष्ट्र के रूप में खड़ा है। इन 79 वर्षों में भारत ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। विभाजन का दर्द, विस्थापन की त्रासदी, खाद्यान्न संकट, युद्ध, आर्थिक कठिनाइयां, आपातकाल, आतंकवाद, प्राकृतिक आपदाएं और सामाजिक चुनौतियां, इन सबके बीच देश ने लोकतंत्र को मजबूत किया और विकास की राह पर लगातार कदम बढ़ाए। आजादी की पहली सुबह जिन लोगों ने भारत को देखा था, उनके सामने संसाधनों की कमी और चुनौतियों का पहाड़ था। लेकिन उनके पास एक विश्वास था कि भारत अपनी नियति स्वयं लिख सकता है। आज 80वें वर्ष में प्रवेश करते हुए भारत के सामने उपलब्धियों का गर्व है तो भविष्य की जिम्मेदारियों का एहसास भी। यह अवसर केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का भी है कि हमने क्या पाया, क्या खोया और अगले 20-25 वर्षों में भारत को किस दिशा में ले जाना है।
भारत की स्वतंत्रता किसी एक दिन या किसी एक आंदोलन का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे लंबे समय तक चले संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं की शक्ति थी। 1857 का विद्रोह, स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे आंदोलनों ने स्वतंत्रता की चेतना को जन-जन तक पहुंचाया। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को स्वतंत्रता संघर्ष का हथियार बनाया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के माध्यम से स्वतंत्रता की लौ को प्रखर किया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव और अनगिनत क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद और अनेक नेताओं ने स्वतंत्र भारत के निर्माण की नींव रखी।
15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह करोड़ों भारतीयों के आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना थी। लेकिन स्वतंत्रता के साथ ही देश को विभाजन का गहरा घाव मिला। लाखों लोग विस्थापित हुए और बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी जान गंवाई। आजादी की खुशी के साथ विभाजन का दर्द जुड़ा हुआ था। नवजात राष्ट्र को उसी समय शरणार्थियों के पुनर्वास, प्रशासनिक व्यवस्था, आर्थिक संकट और सामाजिक तनाव जैसी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, एक ऐसा लोकतांत्रिक ढांचा तैयार करना जिसमें विविधताओं से भरे देश के हर नागरिक को समान अधिकार मिल सके। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और भारत एक गणराज्य बना। संविधान ने नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए तथा शासन के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं की व्यवस्था की। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार उस समय के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय था।
भारत की लोकतांत्रिक यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां भाषा, धर्म, जाति, संस्कृति, क्षेत्र और परंपराओं की असाधारण विविधता है। इसके बावजूद चुनावों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की परंपरा मजबूत हुई। संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं ने लोकतंत्र को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय-समय पर लोकतंत्र के सामने चुनौतियां आईं, लेकिन भारतीय समाज ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अपनी आस्था बनाए रखी। स्वतंत्रता के समय भारत के सामने राजनीतिक एकीकरण की बड़ी चुनौती थी। देश में अनेक रियासतें थी। सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन के प्रयासों से अधिकांश रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ। यह कार्य आधुनिक भारत के निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। यदि उस समय राजनीतिक एकीकरण सफल नहीं होता, तो भारत का नक्शा आज बिल्कुल अलग हो सकता था। एकीकृत भारत ने आगे चलकर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास की साझा यात्रा शुरू की।
आजादी के समय भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर थी। औद्योगिक आधार सीमित था, कृषि मुख्यतः मानसून पर निर्भर थी और देश खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा था। स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में बड़े बांधों, इस्पात संयंत्रों, बिजली परियोजनाओं, वैज्ञानिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की स्थापना पर जोर दिया गया। उद्देश्य था कि भारत अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए बाहरी दुनिया पर निर्भर न रहे। भाखड़ा नांगल जैसे बांध, सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उद्योग और उच्च शिक्षा के संस्थान आधुनिक भारत के निर्माण के प्रतीक बने। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों ने देश के तकनीकी भविष्य की नींव तैयार की। यह दौर संसाधनों की सीमाओं के बावजूद आत्मनिर्भर भारत की बुनियाद रखने का दौर था।
1960 के दशक में भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। ऐसी स्थिति में हरित क्रांति ने देश की कृषि व्यवस्था को नई दिशा दी। उन्नत बीज, सिंचाई, उर्वरक और आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रयोग से गेहूं और चावल का उत्पादन तेजी से बढ़ा। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में इसका विशेष प्रभाव दिखाई दिया। भारत धीरे-धीरे खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ा। आज भारत विश्व के प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। हालांकि कृषि क्षेत्र के सामने अब भी अनेक चुनौतियां हैं, छोटे किसानों की आय, जल संकट, मिट्टी की गुणवत्ता, जलवायु परिवर्तन, भंडारण और बाजार तक पहुंच। इसलिए आने वाले वर्षों में कृषि को अधिक टिकाऊ, तकनीक आधारित और किसान-केंद्रित बनाने की आवश्यकता है।
स्वतंत्रता के बाद भारत को कई युद्धों और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1947-48, 1962, 1965 और 1971 के संघर्षों ने देश की सुरक्षा व्यवस्था की कठिन परीक्षा ली। 1971 का युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बना। इसके बाद भारत ने अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने पर ध्यान दिया। 1999 का कारगिल युद्ध भी भारतीय सैनिकों के साहस और बलिदान का प्रतीक बना। देश के जवानों ने कठिन परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय दिया। आज भारत रक्षा उत्पादन, मिसाइल तकनीक, अंतरिक्ष और रणनीतिक क्षमताओं के क्षेत्र में पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम है। आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में भी प्रयास तेज हुए है। भारत की वैज्ञानिक यात्रा स्वतंत्रता के बाद लगातार आगे बढ़ी। अंतरिक्ष कार्यक्रम इसका सबसे चमकदार उदाहरण है। सीमित संसाधनों से शुरू हुआ भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम आज उपग्रह प्रक्षेपण, संचार, मौसम पूर्वानुमान, पृथ्वी अवलोकन और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर चुका है। चंद्रयान मिशनों ने भारत की वैज्ञानिक क्षमता को दुनिया के सामने रखा। मंगलयान ने कम लागत में अंतरिक्ष मिशन संचालित करने की भारतीय क्षमता का परिचय दिया। चंद्रयान-3 की सफलता ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की। आज अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक गौरव का विषय नहीं है। कृषि, मौसम, आपदा प्रबंधन, संचार, नेविगेशन और राष्ट्रीय सुरक्षा में अंतरिक्ष तकनीक की भूमिका बढ़ती जा रही है।
1991 भारत की आर्थिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। गंभीर आर्थिक संकट के बीच देश ने आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में बड़े बदलाव किए। इन सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर खोले। निजी क्षेत्र का विस्तार हुआ, विदेशी निवेश बढ़ा, सेवा क्षेत्र तेजी से विकसित हुआ और भारतीय कंपनियों ने वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बनानी शुरू की। सूचना प्रौद्योगिकी और सॉफ्टवेयर उद्योग भारत की नई आर्थिक शक्ति बनकर उभरे। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहर तकनीकी एवं सेवा क्षेत्र के प्रमुख केंद्र बने। आज भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बना चुका है। लेकिन आर्थिक विकास के साथ रोजगार, असमानता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, छोटे उद्योग और सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रश्न भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं। 21वीं सदी के भारत की सबसे बड़ी कहानियों में डिजिटल परिवर्तन प्रमुख है। कभी बैंकिंग और सरकारी सेवाओं के लिए लंबी कतारें लगती थीं, वहीं आज मोबाइल फोन के माध्यम से अनेक सेवाएं उपलब्ध हैं। डिजिटल भुगतान ने आम नागरिकों के लेन-देन के तरीके को बदल दिया। आधार, मोबाइल और बैंकिंग सेवाओं के विस्तार ने वित्तीय समावेशन को गति दी। इंटरनेट ने शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार की संभावनाओं को नया रूप दिया है। छोटे शहरों और गांवों के युवा भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार से जुड़ रहे हैं। हालांकि डिजिटल क्रांति के साथ डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण और डिजिटल असमानता जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं। इसलिए तकनीक का विस्तार मानव-केंद्रित और सुरक्षित होना आवश्यक है।
79 वर्षों में भारत की भौतिक कनेक्टिविटी में भी व्यापक परिवर्तन आया है। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, एक्सप्रेसवे, आधुनिक रेलवे, मेट्रो रेल, नए हवाई अड्डे और ग्रामीण सड़कों ने देश की दूरी कम की है। कभी जिन गांवों तक पहुंचना कठिन था, वहां आज सड़क और मोबाइल नेटवर्क पहुंच चुका है। परिवहन व्यवस्था में सुधार ने व्यापार, शिक्षा और रोजगार के अवसरों को बढ़ाया है। शहरों में मेट्रो रेल और सार्वजनिक परिवहन का विस्तार हो रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में भी भारत आगे बढ़ रहा है। फिर भी बढ़ते शहरीकरण के साथ यातायात, प्रदूषण, जल संकट, कचरा प्रबंधन और आवास जैसी समस्याएं बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। स्वतंत्रता के समय भारत में शिक्षा की पहुंच सीमित थी। आज स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और व्यावसायिक शिक्षा के अवसरों का व्यापक विस्तार हुआ है। साक्षरता दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया और उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी। लेकिन शिक्षा का प्रश्न केवल स्कूलों की संख्या तक सीमित नहीं है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल संसाधनों की समान पहुंच, रोजगारपरक कौशल और ग्रामीण-शहरी अंतर को कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है, यदि उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पर्याप्त रोजगार के अवसर मिले।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय महिलाओं की स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, सेना, विज्ञान, खेल, उद्योग, चिकित्सा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में महिलाओं ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। महिलाएं अब केवल परिवार की भूमिका तक सीमित नहीं हैं। वे आर्थिक गतिविधियों की सक्रिय भागीदार बन रही हैं। फिर भी महिला सुरक्षा, समान वेतन, पोषण, स्वास्थ्य, रोजगार और निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान भागीदारी जैसे मुद्दे अभी भी महत्वपूर्ण हैं। भारत के अगले चरण का विकास तभी पूर्ण माना जाएगा जब महिलाओं को समान अवसर और सम्मान सुनिश्चित होगा। भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में उसका लोकतंत्र है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत में करोड़ों लोग चुनावों के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चयन करते हैं। लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र संस्थाएं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून का शासन, नागरिक अधिकार, जिम्मेदार मीडिया और मजबूत विपक्ष आवश्यक हैं। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया हैं, लेकिन मतभेदों को वैमनस्य में बदलने से बचाना जरूरी है। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है, बशर्ते संवाद की परंपरा जीवित रहे।
भारत अनेक भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और जीवनशैलियों का देश है। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक भारत की विविधता असाधारण है। इसके बावजूद भारतीयता की एक साझा भावना देश को जोड़ती है। यह विविधता भारत की शक्ति है, लेकिन इसके संरक्षण के लिए आपसी सम्मान और सहिष्णुता जरूरी है। पहचान के आधार पर विभाजन की राजनीति से ऊपर उठकर नागरिकता की साझा भावना को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में भारत को यह संकल्प लेना चाहिए कि विविधता को विवाद का नहीं, संवाद और सहयोग का आधार बनाया जाएगा। 79 वर्षों की उपलब्धियां गर्व का विषय हैं, लेकिन हर उपलब्धि के साथ कुछ अधूरी यात्राएं भी हैं। गरीबी में कमी आई है, फिर भी आर्थिक असमानता चुनौती है। शिक्षा का विस्तार हुआ है, फिर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सब तक समान रूप से नहीं पहुंची। स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सा की कमी बनी हुई है। शहर विकसित हो रहे हैं, लेकिन प्रदूषण और अव्यवस्थित शहरीकरण की समस्या बढ़ रही है। कृषि उत्पादन बढ़ा है, लेकिन किसानों की आय और जल संकट जैसे प्रश्न कायम हैं। इसलिए स्वतंत्रता के 80वें वर्ष का उत्सव आत्मसंतोष का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए।
21वीं सदी में जलवायु परिवर्तन भारत के सामने बड़ी चुनौती है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़, सूखा, जल संकट और वायु प्रदूषण विकास के मॉडल पर नए सवाल खड़े कर रहे हैं। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा और हरित तकनीक की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। लेकिन पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। जल बचाना, ऊर्जा की बचत करना, वृक्षारोपण, कचरा प्रबंधन और प्रदूषण कम करना नागरिक जिम्मेदारी भी है। आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा भारत बनाना होगा जहां आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलें। भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है। युवा ऊर्जा, तकनीक और नवाचार के माध्यम से देश की तस्वीर बदल सकते हैं। स्टार्टअप संस्कृति ने युवाओं को नौकरी तलाशने वाले से नौकरी देने वाले बनने का अवसर दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, जैव प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष तकनीक और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं। लेकिन युवा शक्ति को सही दिशा देने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और उद्यमिता के अवसर जरूरी हैं। यदि भारत अपनी युवा शक्ति को सही अवसर देता है तो आने वाले दशकों में देश की विकास यात्रा और तेज हो सकती है।
भारत जब 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा, तब आज का युवा उस भारत की कहानी लिख रहा होगा। इसलिए 80वें वर्ष में प्रवेश केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य की रूपरेखा तैयार करने का समय है। भारत को 2047 तक ऐसा राष्ट्र बनाना होगा जहां आर्थिक समृद्धि के साथ सामाजिक न्याय हो, तकनीकी प्रगति के साथ मानवीय संवेदना हो, आधुनिकता के साथ संस्कृति का सम्मान हो और विकास के साथ पर्यावरण की सुरक्षा हो। विकसित भारत का अर्थ केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। विकसित भारत वह होगा जहां नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार, सुरक्षित वातावरण और न्यायपूर्ण अवसर मिले। 15 अगस्त 2026 भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह हमें उन लोगों को याद करने का अवसर देता है जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ न्योछावर किया। यह उन पीढ़ियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है जिन्होंने स्वतंत्र भारत की नींव को मजबूत किया। साथ ही यह वर्तमान पीढ़ी को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराने का समय भी है। 79 वर्षों में भारत ने बहुत कुछ हासिल किया है। हमने निराशा से आशा, अभाव से उपलब्धता, निर्भरता से आत्मविश्वास और सीमित संसाधनों से वैश्विक महत्वाकांक्षा तक की यात्रा तय की है। लेकिन मंजिल अभी दूर है। आजादी का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। इसका अर्थ गरीबी से मुक्ति, अशिक्षा से मुक्ति, भेदभाव से मुक्ति, भय से मुक्ति और अवसरों की असमानता से मुक्ति भी है। स्वतंत्रता की 80वीं वर्षगांठ पर सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए कि भारत की प्रगति का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
भारत की 79 वर्षों की स्वतंत्रता यात्रा एक विशाल वृक्ष की तरह है, जिसकी जड़ें स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों में हैं, जिसका तना संविधान और लोकतंत्र में मजबूत हुआ है और जिसकी शाखाएं विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, उद्योग, कृषि, संस्कृति और नवाचार के रूप में दुनिया भर में फैल रही हैं। इस यात्रा में सफलता भी है और असफलता भी। गौरव भी है और आत्ममंथन भी। उपलब्धियां भी हैं और अधूरे लक्ष्य भी। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि भारत ने कभी आगे बढ़ने की इच्छा नहीं छोड़ी।
15 अगस्त 2026 को जब देश स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश करेगा, तब यह केवल कैलेंडर में बदलती एक तारीख नहीं होगी। यह उस भारत की नई दहलीज होगी जो अपने अतीत से शक्ति लेकर भविष्य की ओर बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में भारत की पहचान केवल दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र के रूप में होनी चाहिए जो विकास के साथ न्याय, शक्ति के साथ संवेदना, तकनीक के साथ मानवता और विविधता के साथ एकता को महत्व देता है। आजादी विरासत में मिली है, लेकिन उसे सार्थक बनाना हमारी जिम्मेदारी है। 79 वर्षों की यात्रा हमें गर्व देती है, 80वां वर्ष हमें संकल्प देता है और यही संकल्प भारत को 2047 के उस मुकाम तक ले जाएगा, जहां स्वतंत्रता की शताब्दी केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक मजबूत, समृद्ध, समावेशी और आत्मविश्वासी भारत की उपलब्धि का उत्सव होगी।
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