इतिहास, धर्म और सभ्यता के आईने में - “पलायन”
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 29 जुलाई ::
"पलायन को केवल भागना समझना इतिहास और मानव-स्वभाव दोनों के साथ अन्याय होगा। कई बार पलायन ही परिवर्तन का पहला कदम बनता है, तो कई बार वही विनाश का कारण भी।" यदि मानव सभ्यता के प्रारंभिक इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि मनुष्य कभी स्थिर नहीं रहा है। वह निरंतर चलता रहा है, नए स्थान खोजता रहा है, नई परिस्थितियों को अपनाता रहा और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करता रहा है। यही निरंतर गतिशीलता आगे चलकर सभ्यताओं के निर्माण का कारण बनी।
प्राचीन मानव जंगलों और गुफाओं से निकलकर नदी घाटियों तक पहुँचा। सिंधु, नील, दजला-फरात और ह्वांगहो जैसी नदियों के किनारे विकसित हुई सभ्यताएँ वस्तुतः मानव के सामूहिक पलायन का ही परिणाम थी। यदि मनुष्य अपने पुराने ठिकानों से बाहर निकलने का साहस न करता, तो संभवतः सभ्यता का विकास आज जितना व्यापक है, वैसा कभी नहीं होता। इस दृष्टि से देखा जाए तो पलायन केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि मानव विकास की पहली सीढ़ी है।
भारतीय संस्कृति में "पलायन" शब्द को हमेशा नकारात्मक अर्थों में नहीं देखा गया है। रामायण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भगवान श्रीराम ने अयोध्या का त्याग किया। उन्होंने वनवास स्वीकार किया। यदि कोई केवल बाहरी दृष्टि से देखे तो कह सकता है कि उन्होंने राजमहल छोड़ दिया। परंतु वास्तव में वह पलायन नहीं था, बल्कि धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए किया गया त्याग था।
श्रीराम के वनगमन ने उन्हें केवल राजा नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया। उनके चौदह वर्षों का वनवास भारतीय समाज के लिए आदर्श जीवन, कर्तव्य और धैर्य का पाठ बन गया। यह घटना बताती है कि हर स्थान परिवर्तन पलायन नहीं होता है, कभी-कभी वह उच्चतर उद्देश्य की ओर यात्रा भी होता है।
महाभारत में पांडवों को हस्तिनापुर छोड़ना पड़ा। लाक्षागृह की घटना के बाद उन्होंने अपनी रक्षा के लिए स्थान बदला। वनवास के दौरान भी उन्होंने अनेक प्रदेशों की यात्रा की। क्या यह पलायन था? यदि केवल भौतिक दृष्टि से देखें तो हाँ। लेकिन नैतिक दृष्टि से यह अन्याय से संघर्ष की तैयारी थी।
भगवान श्रीकृष्ण स्वयं मथुरा से द्वारका चले गए। इतिहासकार बताते हैं कि लगातार हो रहे आक्रमणों से जनता की रक्षा के लिए उन्होंने राजधानी स्थानांतरित की। यदि वे ऐसा न करते तो संभवतः यादव वंश भारी विनाश का सामना करता। इसलिए कभी-कभी स्थान बदलना कायरता नहीं, दूरदर्शिता होती है।
भारतीय इतिहास में सबसे महान आध्यात्मिक यात्राओं में से एक है, गौतम बुद्ध का महाभिनिष्क्रमण। राजमहल, परिवार, वैभव और सत्ता छोड़कर सिद्धार्थ सत्य की खोज में निकल पड़े। यदि कोई केवल सांसारिक दृष्टि से देखे तो कह सकता है कि उन्होंने अपने परिवार का त्याग कर दिया। लेकिन यही यात्रा उन्हें बुद्ध बना गई।
उन्होंने संसार को दुःख, करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग का संदेश दिया। यदि सिद्धार्थ राजमहल में ही रहते, तो शायद वे इतिहास के एक राजा बनकर रह जाते। महल छोड़ने का उनका निर्णय पूरी मानवता के लिए ज्ञान का प्रकाश बन गया।
भगवान महावीर ने भी राजसी जीवन छोड़कर तपस्या का मार्ग अपनाया। उन्होंने केवल घर ही नहीं छोड़ा, बल्कि मोह, लोभ और अहंकार तक का त्याग किया। यह बताता है कि पलायन केवल भौतिक नहीं होता है। मनुष्य अपने भीतर के दोषों से भी पलायन करता है। यदि वह क्रोध छोड़ दे, तो यह भी एक प्रकार का सकारात्मक पलायन है। यदि वह हिंसा छोड़कर अहिंसा अपनाए, तो यह भी परिवर्तन की यात्रा है।
आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत का भ्रमण किया। उन्होंने ज्ञान की स्थापना के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा की और चार मठों की स्थापना की। यदि वे अपने जन्मस्थान तक सीमित रहते, तो अद्वैत वेदांत का इतना व्यापक प्रचार संभव नहीं होता। यात्रा ने ही उन्हें युगपुरुष बनाया।
सिख परंपरा में गुरु नानक देव की लंबी यात्राओं को "उदासियाँ" कहा जाता है। उन्होंने भारत, तिब्बत, अरब और मध्य एशिया तक यात्रा कर मानवता, समानता और ईश्वर की एकता का संदेश दिया। उन्होंने समाज को यह सिखाया कि सीमाएँ मनुष्य बनाता है, जबकि सत्य पूरे संसार का होता है।
इतिहास केवल आध्यात्मिक यात्राओं से नहीं बना है। युद्धों ने भी बड़े पैमाने पर पलायन कराया है। मंगोल आक्रमण, तैमूर का हमला, यूरोप के धार्मिक युद्ध, विश्व युद्ध, इन सभी ने करोड़ों लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर किया।
भारत के विभाजन (1947) के समय भी लाखों परिवारों ने अपना घर, खेत, व्यापार और स्मृतियाँ छोड़ दीं। यह इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय विस्थापन माना जाता है। इन घटनाओं ने यह सिद्ध किया कि जब राजनीति और हिंसा समाज पर हावी होती है, तो सबसे पहले सामान्य नागरिक पलायन करता है।
औद्योगिक क्रांति के बाद पलायन का स्वरूप बदल गया। अब लोग तलवार से नहीं, नौकरी से प्रेरित होकर यात्रा करने लगे। गाँवों से शहरों की ओर लाखों लोग जाने लगे। रेलवे बनी, कारखाने बने, बंदरगाह विकसित हुए और महानगरों का विस्तार हुआ। भारत में मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली और बाद में बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे जैसे शहर रोजगार के बड़े केंद्र बने। यह आर्थिक पलायन था।
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक नया शब्द सामने आया “ब्रेन ड्रेन” अर्थात प्रतिभा पलायन। भारत के हजारों वैज्ञानिक, चिकित्सक, इंजीनियर और शोधकर्ता बेहतर अवसरों की तलाश में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में बस गए। इस पर लंबे समय तक चिंता व्यक्त की जाती रही। लेकिन समय के साथ यह भी स्पष्ट हुआ कि विदेश गए अनेक भारतीयों ने विश्व स्तर पर भारत का नाम रोशन किया और बाद में अपने अनुभव तथा निवेश से देश के विकास में भी योगदान दिया। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हर प्रतिभा पलायन देश की हानि ही हो, यह आवश्यक नहीं।
जब लोग एक स्थान से दूसरे स्थान जाते हैं तो केवल व्यक्ति नहीं जाता, उसके साथ उसकी भाषा, भोजन, संगीत, परंपराएँ और संस्कृति भी जाती है। आज भारत के लगभग हर महानगर में विभिन्न राज्यों के लोग रहते हैं। दिल्ली में बिहारी छठ मनाते हैं। मुंबई में दक्षिण भारतीय ओणम मनाते हैं। बेंगलुरु में दुर्गापूजा होती है। विदेशों में भारतीय दीपावली और होली मनाते हैं अर्थात पलायन केवल जनसंख्या नहीं बदलता, वह संस्कृतियों को भी जोड़ता है।
इतिहास बताता है कि सत्ता हमेशा परिवर्तनशील रही है। राजा बदलते रहे। राज्य बदलते रहे। सीमाएँ बदलती रही। विचारधाराएँ बदलती रही। आज लोकतंत्र में वही परिवर्तन राजनीतिक दलों के रूप में दिखाई देता है। जहाँ पहले राजा दरबार बदलते थे, आज नेता दल बदलते हैं। जहाँ पहले साम्राज्य विस्तार होता था, आज राजनीतिक संगठन विस्तार करते हैं। जहाँ पहले सेनाएँ पक्ष बदलती थी, आज जनप्रतिनिधि दल बदलते हैं। समय बदल गया है, लेकिन परिवर्तन की मूल प्रवृत्ति आज भी वही है।
यह प्रश्न सदैव विवाद का विषय रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि विचारधारा जीवन भर नहीं बदलनी चाहिए। दूसरे लोग कहते हैं कि समय के साथ विचार बदलना ही प्रगति का संकेत है। वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं स्थित है। यदि विचार अनुभव, अध्ययन और समाजहित के कारण बदलते हैं, तो यह विकास है। लेकिन यदि विचार केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता के अनुसार बदलें, तो समाज स्वाभाविक रूप से उस पर प्रश्न उठाता है। यहीं से राजनीति और नैतिकता का संघर्ष शुरू होता है।
स्थान बदलना सरल है। नौकरी बदलना भी कठिन नहीं। शहर बदलना भी संभव है। लेकिन सबसे बड़ा पलायन तब होता है जब मनुष्य अपने ही सिद्धांतों से दूर चला जाता है। वह सत्य छोड़ देता है। ईमानदारी छोड़ देता है। विश्वास छोड़ देता है और धीरे-धीरे स्वयं से भी दूर हो जाता है। ऐसा पलायन समाज के लिए सबसे अधिक चिंताजनक होता है।
इतिहास का निष्कर्ष स्पष्ट है कि हर पलायन बुरा नहीं होता है। हर परिवर्तन अवसरवाद नहीं होता है। हर स्थिरता आदर्श नहीं होती है। हर गतिशीलता प्रगति नहीं होती है। मनुष्य को उसके उद्देश्य, आचरण और परिणामों के आधार पर परखा जाना चाहिए, केवल उसके स्थान परिवर्तन से नहीं।
मानव सभ्यता का इतिहास बताता है कि परिवर्तन जीवन का नियम है। मनुष्य परिस्थितियों, विचारों, संघर्षों और अवसरों के अनुसार, अपना मार्ग बदलता रहा है। कभी यह परिवर्तन समाज के लिए वरदान सिद्ध हुआ, तो कभी संकट का कारण बना। इसलिए पलायन को समझने के लिए केवल घटना नहीं, उसके पीछे की मंशा और उसके परिणाम को भी समझना आवश्यक है।
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