वक्त का चक्र और सत्ता का अहंकार

वक्त का चक्र और सत्ता का अहंकार

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 10 जून ::

दुनिया में यदि कोई शक्ति सबसे अधिक निष्पक्ष, सबसे अधिक कठोर और सबसे अधिक प्रभावशाली है तो वह समय है। समय न किसी का रिश्तेदार होता है, न विरोधी और न समर्थक। वह केवल अपना काम करता है। वह राजाओं को रंक और रंकों को राजा बनाता है। वह साम्राज्य खड़े करता है और उन्हीं साम्राज्यों को मिट्टी में मिला देता है। इतिहास के पन्ने इस सत्य के गवाह हैं कि जिसने समय की ताकत को समझा, उसने विनम्रता सीखी और जिसने स्वयं को समय से बड़ा समझा, वह अंततः इतिहास की धूल में खो गया।

पुरानी कहावत है कि जब समय अच्छा होता है तो वाल्मीकि जैसे डाकू महर्षि बन जाते हैं और जब समय प्रतिकूल हो जाता है तो लौह महलों की दीवारें भी दीमकों के सामने टिक नहीं पाती। राजनीति भी इस नियम से अछूती नहीं है। यहां भी समय ही सबसे बड़ा निर्णायक होता है। आज जो नेता अपराजेय दिखाई देता है, वही कल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता नजर आता है। जो कभी विरोधियों को महत्वहीन समझता था, वही एक दिन अपने ही सहयोगियों से चुनौती पाता है। भारतीय राजनीति में यह दृश्य बार-बार दोहराया गया है। सत्ता का शिखर जितना ऊँचा होता है, उससे गिरने का खतरा भी उतना ही अधिक होता है। इसलिए लोकतंत्र में सबसे बड़ा गुण शक्ति नहीं है, बल्कि विनम्रता माना जाता है।

सत्ता अपने साथ अनेक प्रकार की सुविधाएँ लेकर आती है। सम्मान, प्रभाव, निर्णय लेने की शक्ति और लोगों पर प्रभाव डालने की क्षमता किसी भी व्यक्ति को विशेष बना देती है। लेकिन यही शक्ति यदि संयम से न संभाली जाए तो अहंकार में बदल जाती है। अहंकार की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह व्यक्ति को उसकी सीमाओं से अनजान कर देता है। वह उसे यह विश्वास दिलाने लगता है कि उसकी सफलता केवल उसकी अपनी योग्यता का परिणाम है और जनता, सहयोगियों तथा परिस्थितियों का उसमें कोई योगदान नहीं है। यहीं से पतन की शुरुआत होती है।

राजनीतिक इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब नेताओं ने अपने आसपास ऐसे लोगों की भीड़ खड़ी कर ली जो केवल उनकी प्रशंसा करते थे। आलोचना को देशद्रोह, विरोध को साजिश और असहमति को अपराध माना जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि वास्तविकता उनसे दूर होती चली गई और एक दिन ऐसा आया जब उन्हें स्वयं भी समझ नहीं आया कि जमीन उनके पैरों के नीचे से कब खिसक गई।

लोकतंत्र किसी व्यक्ति का शासन नहीं है बल्कि जनमत की व्यवस्था है। यहां नेता जनता का प्रतिनिधि होता है, मालिक नहीं। लेकिन जब कोई नेतृत्व लंबे समय तक सत्ता में बना रहता है तो कई बार उसके व्यवहार में परिवर्तन आने लगता है। वह जनता से संवाद की जगह आदेश को प्राथमिकता देने लगता है। जो नेता आलोचना से डरता है, वह अंततः आलोचना का सबसे बड़ा शिकार बनता है। जो नेता विरोधियों को अपमानित करता है, वह एक दिन उसी अपमान का सामना करता है। राजनीति में भय से समर्थक तो बनाए जा सकते हैं, लेकिन विश्वास नहीं। विश्वास वह पूंजी है जो वर्षों की मेहनत से बनती है और एक गलत निर्णय से टूट सकती है। यही कारण है कि लोकतंत्र में संवाद, सहिष्णुता और आलोचना को महत्व दिया गया है। जहां आलोचना बंद हो जाती है, वहां पतन का काउंटडाउन शुरू हो जाता है।

राजनीतिक वर्ग अक्सर यह मान बैठता है कि जनता भूल जाती है। लेकिन यह आधा सच है। जनता छोटी-छोटी घटनाएँ भले भूल जाए, लेकिन व्यवहार को कभी नहीं भूलती। उसे याद रहता है कि कौन नेता संकट के समय उसके साथ खड़ा था और कौन सत्ता के मद में डूबा हुआ था। उसे याद रहता है कि किसने विरोधियों का सम्मान किया और किसने उन्हें अपमानित किया। उसे याद रहता है कि किसने जनता की आवाज सुनी और किसने केवल अपनी आवाज सुनाने की कोशिश की। लोकतंत्र में जनता का फैसला देर से आता है, लेकिन जब आता है तो बहुत स्पष्ट होता है। कई बार यह फैसला चुनाव के रूप में सामने आता है, कई बार संगठन के भीतर विद्रोह के रूप में और कई बार जनसमर्थन में आई अचानक गिरावट के रूप में।

राजनीति का एक अनिवार्य सत्य है कि यहां कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता है। परिस्थितियाँ बदलती हैं और उनके साथ रिश्ते भी बदल जाते हैं। जो लोग किसी नेता की सबसे बड़ी ताकत होते हैं, वही समय बदलने पर उसकी सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं। सत्ता के दिनों में जो लोग आदेश का पालन करते हैं, वे ही कमजोर पड़ती स्थिति में सवाल पूछना शुरू कर देते हैं। इसका कारण केवल अवसरवाद नहीं होता। कई बार यह उस दबे हुए असंतोष का परिणाम होता है जिसे वर्षों तक नजरअंदाज किया गया हो। जब संगठन में संवाद समाप्त हो जाता है और केवल आदेश बचता है, तब असहमति भीतर-ही-भीतर जमा होती रहती है। फिर एक दिन वही असहमति विस्फोट बन जाती है।

इतिहास बताता है कि किसी भी शासक का पतन अचानक नहीं होता है। उसकी शुरुआत बहुत पहले हो जाती है, लेकिन वह दिखाई नहीं देती। रावण का पतन युद्ध के दिन नहीं शुरू हुआ था, बल्कि उस दिन शुरू हुआ था जब उसने अपनी शक्ति को धर्म से ऊपर समझ लिया। दुर्योधन की हार कुरुक्षेत्र में नहीं हुई थी, बल्कि तब हुई थी जब उसने अहंकार को न्याय से बड़ा मान लिया। आधुनिक राजनीति में भी यही नियम लागू होता है। जब नेता स्वयं को संस्था से बड़ा समझने लगता है, जब वह आलोचना को कुचलने लगता है और जब वह सम्मान की जगह भय का उपयोग करता है, तब उसका पतन निश्चित हो जाता है। केवल समय का अंतर होता है।

राजनीति दो प्रकार की होती है। एक वह जो सम्मान पर आधारित होती है और दूसरी वह जो अपमान पर आधारित होती है। सम्मान की राजनीति में विरोधी भी सम्मान पाते हैं। वहां विचारों का संघर्ष होता है, व्यक्तियों का नहीं। वहां बहस होती है, दुश्मनी नहीं। ऐसी राजनीति लंबे समय तक टिकती है क्योंकि उसका आधार विश्वास होता है। इसके विपरीत अपमान की राजनीति तत्काल लाभ तो दे सकती है, लेकिन स्थायी सफलता नहीं। जो नेता हर आलोचक को दुश्मन और हर असहमति को साजिश मानता है, वह धीरे-धीरे स्वयं को अकेला कर लेता है। राजनीति में सबसे बड़ी शक्ति लोगों को साथ लेकर चलने की क्षमता है, उन्हें डराकर चुप कराने की नहीं।

अदालतों में फैसले बदल सकते हैं। राजनीति में समीकरण बदल सकते हैं। मीडिया का रुख बदल सकता है। लेकिन समय का फैसला नहीं बदलता। समय हर घटना को दर्ज करता है। वह देखता है कि किसने शक्ति का उपयोग सेवा के लिए किया और किसने उसका उपयोग अहंकार के प्रदर्शन के लिए। वह यह भी देखता है कि किसने सम्मान दिया और किसने अपमान को हथियार बनाया। जब समय फैसला सुनाता है तो उसके सामने कोई पद, कोई प्रतिष्ठा और कोई शक्ति काम नहीं आती। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां कभी असीम शक्ति रखने वाले लोग अंततः अकेले पड़ गए।

आज के राजनीतिक वातावरण में सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि नेता समय के इस संदेश को समझें। सत्ता स्थायी नहीं है। जनता स्थायी है। पद स्थायी नहीं है। लोकतंत्र स्थायी है। व्यक्ति स्थायी नहीं है। संस्थाएं स्थायी हैं। यदि कोई नेता लंबे समय तक सम्मान पाना चाहता है तो उसे विनम्रता सीखनी होगी। उसे आलोचना सुननी होगी। उसे विरोधियों के अस्तित्व को स्वीकार करना होगा। उसे यह समझना होगा कि लोकतंत्र में असहमति कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति होती है। जो नेता इस सत्य को समझ लेते हैं, वे सत्ता जाने के बाद भी सम्मानित रहते हैं। जो नहीं समझते, वे सत्ता रहते हुए भी सम्मान खो देते हैं।

समय किसी के लिए नहीं रुकता। वह निरंतर आगे बढ़ता है। उसके सामने राजा और प्रजा, नेता और कार्यकर्ता, विजेता और पराजित सभी समान हैं। आज जो शिखर पर है, वह कल नीचे भी आ सकता है। आज जो संघर्ष कर रहा है, वह कल शीर्ष पर भी पहुंच सकता है। इसलिए सत्ता में विनम्रता और विपक्ष में संयम दोनों आवश्यक हैं।

राजनीति का सबसे बड़ा धर्म सम्मान है। सम्मान बांटने से बढ़ता है, जबकि अहंकार अपने ही भार से गिर जाता है। यही इतिहास का निष्कर्ष है, यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही समय का अंतिम न्याय है। वक्त का पहिया घूमता रहता है। जो इसे समझ लेता है, वह इतिहास में सम्मान पाता है। जो इसे चुनौती देने की कोशिश करता है, वह इतिहास का सबक बन जाता है।
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