भारत–म्यांमार संबंधों को मिलेगी नई मजबूती

भारत–म्यांमार संबंधों को मिलेगी नई मजबूती

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 04 जून ::
 
भारत और म्यांमार के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के बीच के राजनयिक रिश्ते नहीं हैं, बल्कि यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामरिक महत्व से जुड़े हुए हैं। हाल ही में म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को एक नई दिशा प्रदान की है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति ह्लाइंग के बीच हुई विस्तृत वार्ता में व्यापार, निवेश, रक्षा, सीमा सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी नई तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है।

यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब दक्षिण-पूर्व एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में भारत और म्यांमार का सहयोग न केवल दोनों देशों के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, भारत और म्यांमार के बीच संबंध हजारों वर्षों पुराने हैं। बौद्ध धर्म के प्रसार से लेकर व्यापारिक संपर्कों तक दोनों देशों का इतिहास एक-दूसरे से जुड़ा रहा है। म्यांमार में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी निवास करती है, जिसने दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत बनाया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी दोनों देशों ने अपने संबंधों को निरंतर मजबूत करने का प्रयास किया। भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” में म्यांमार की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है।

राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह आश्वासन दिया कि म्यांमार की धरती का उपयोग भारत के सुरक्षा हितों के विरुद्ध नहीं होने दिया जाएगा। यह आश्वासन भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की सीमा म्यांमार से लगती है। अतीत में कुछ उग्रवादी संगठनों ने सीमा पार क्षेत्रों का उपयोग अपने ठिकानों के रूप में किया था। ऐसे में म्यांमार की ओर से दिया गया यह भरोसा दोनों देशों के बीच विश्वास को और मजबूत करता है। 

सीमा सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए दोनों देशों ने बेहतर समन्वय, संयुक्त गश्त और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान पर भी बल दिया। इससे सीमा पार अपराध, अवैध हथियारों की तस्करी और आतंकवादी गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने में सहायता मिलेगी।

भारत और म्यांमार के बीच व्यापारिक संबंधों में अभी भी व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने और निवेश को प्रोत्साहित करने पर सहमति व्यक्त की है। म्यांमार प्राकृतिक गैस, खनिज संसाधनों और कृषि उत्पादों से समृद्ध देश है, जबकि भारत एक विशाल उपभोक्ता बाजार और तकनीकी विशेषज्ञता वाला देश है। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की आवश्यकताओं को पूरा कर सकती हैं।

व्यापार बढ़ने से सीमा क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि। रोजगार के नए अवसरों का सृजन। पूर्वोत्तर भारत के विकास को गति। क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूती। निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा में लाभ होंगे। भारत पहले से ही म्यांमार में अनेक विकास परियोजनाओं में निवेश कर रहा है। आने वाले समय में यह निवेश और बढ़ने की संभावना है।

भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” का सबसे महत्वपूर्ण आधार म्यांमार है। म्यांमार के माध्यम से भारत दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों तक अपनी आर्थिक और रणनीतिक पहुंच को मजबूत कर सकता है। कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना तथा भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी परियोजनाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इन परियोजनाओं के पूर्ण होने से पूर्वोत्तर भारत के राज्यों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक बेहतर पहुंच प्राप्त होगी। इससे न केवल व्यापार बढ़ेगा बल्कि क्षेत्र में औद्योगिक विकास और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

बैठक के दौरान दोनों देशों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने का निर्णय लिया। भारत लंबे समय से चिकित्सा शिक्षा, दवा निर्माण और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। म्यांमार में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत बनाने के लिए भारतीय विशेषज्ञता और तकनीकी सहायता महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इसके अलावा चिकित्सा पर्यटन के क्षेत्र में भी सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं। भारतीय दवा उद्योग म्यांमार को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारत और म्यांमार ने शिक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की है। उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, छात्रवृत्तियों तथा कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से दोनों देशों के युवाओं को लाभ मिलेगा। भारत के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान म्यांमार के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर सकते हैं। वहीं संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रमों के माध्यम से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नए अवसर उत्पन्न होंगे। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ता सहयोग दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संबंधों को और मजबूत करेगा।

आज का युग डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का है। भारत दुनिया के प्रमुख डिजिटल नवाचार केंद्रों में शामिल हो चुका है। इसी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने एआई और अन्य उभरती तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह सहयोग डिजिटल शासन। साइबर सुरक्षा। स्मार्ट कृषि। स्वास्थ्य सेवाओं का डिजिटलीकरण। शिक्षा में तकनीकी नवाचार। ई-कॉमर्स और डिजिटल भुगतान के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत का डिजिटल अनुभव म्यांमार के लिए उपयोगी साबित हो सकता है और इससे वहां के तकनीकी विकास को गति मिलेगी।

भारत और म्यांमार दोनों ऐसे क्षेत्र में स्थित हैं जहां भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए दोनों देशों का सहयोग महत्वपूर्ण है। म्यांमार की भौगोलिक स्थिति उसे सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। भारत इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थक रहा है। दोनों देशों के बीच बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है।

यदि दोनों देशों के बीच हुए समझौतों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है तो इसका सीधा लाभ आम नागरिकों को मिलेगा। व्यापार बढ़ेगा, निवेश आएगा, रोजगार सृजित होंगे और सीमा क्षेत्रों का विकास होगा। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह विशेष रूप से लाभकारी होगा क्योंकि वे दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों से अधिक निकटता से जुड़ सकेंगे।

सहयोग की संभावनाएं व्यापक हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। म्यांमार की आंतरिक राजनीतिक स्थिति, सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी समस्याएं और अवसंरचनात्मक चुनौतियां विकास परियोजनाओं की गति को प्रभावित कर सकती हैं। इसके बावजूद दोनों देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति और साझा हित इन चुनौतियों से निपटने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

म्यांमार के राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान की है। सुरक्षा सहयोग, व्यापार और निवेश, सीमा प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में बनी सहमति आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करेगी।

भारत के लिए म्यांमार केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि उसकी “एक्ट ईस्ट नीति” का प्रमुख स्तंभ है। वहीं म्यांमार के लिए भारत एक विश्वसनीय साझेदार और विकास का महत्वपूर्ण सहयोगी है। यदि दोनों देश अपने साझा लक्ष्यों पर प्रभावी ढंग से कार्य करते हैं तो यह साझेदारी न केवल दोनों देशों की प्रगति का आधार बनेगी, बल्कि पूरे दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र की शांति, स्थिरता और समृद्धि में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।
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