मणिकर्णिका घाट की ‘मसान होली’ पर प्रतिबंध की हुई मांग
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 27 फरवरी ::
वाराणसी जिसे काशी, अविमुक्त क्षेत्र और मोक्ष की नगरी कहा जाता है। भारतीय धार्मिक चेतना का एक अद्वितीय केंद्र है। इसी काशी के “मणिकर्णिका घाट” पर मनाई जाने वाली ‘मसान होली’ इस वर्ष तीव्र विवाद का विषय बन गई है। आयोजक इसे सदियों पुरानी परंपरा और शिव-तत्व से जुड़ा उत्सव बताते हैं, वहीं डोम राजा परिवार, डोम समुदाय और काशी विद्वत परिषद इसे शास्त्र-विरुद्ध, असंवेदनशील और हाल के वर्षों में विकसित हुई प्रथा मानते हैं।
शनिवार (28 फरवरी) को प्रस्तावित आयोजन से पहले प्रतिबंध की मांग तेज हो चुकी है। प्रशासन के समक्ष यह प्रश्न है कि आस्था और व्यवस्था, दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
काशी में जीवन और मृत्यु का द्वंद्व नहीं है, बल्कि सह-अस्तित्व है। यहां श्मशान भी तीर्थ है। मणिकर्णिका घाट को शास्त्रों में मोक्षदायिनी भूमि माना गया है। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने से जीव को पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है।
डोम समुदाय का यहां ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक दायित्व रहा है। डोम राजा परंपरागत रूप से श्मशान व्यवस्था, चिता प्रबंधन और अंतिम संस्कार से जुड़े कर्मकांड का संचालन करते आए हैं।
‘मसान होली’ एक ऐसी गतिविधि के रूप में प्रचारित हुई है जिसमें मणिकर्णिका घाट पर चिताओं की भस्म (राख) से होली खेली जाती है। आयोजकों के अनुसार, यह आयोजन ‘मसान नाथ मंदिर’ में पूजा के बाद श्मशान क्षेत्र के बाहर/आसपास होता है। समय प्रायः दोपहर 12 बजे से शुरू होकर लगभग 2 बजे तक बताया जाता है। इसमें देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, पर्यटक और साधु-संत शामिल होते हैं। पिछले वर्ष लगभग चार लाख लोगों के पहुंचने का दावा किया गया था।
आयोजक इस परंपरा को शिव-भक्ति से जोड़ते हैं। उनका तर्क है कि रंगभरी एकादशी पर काशी विश्वनाथ मंदिर से बाबा विश्वनाथ माता पार्वती को काशी भ्रमण कराते हैं, यहीं से होली की शुरुआत मानी जाती है। लोकविश्वास के अनुसार, इसके बाद शिव श्मशान में अपने गणों, भूत-प्रेत आदि, के साथ चिता-भस्म से होली खेलते हैं। ‘भस्म’ शिव का अलंकरण है, अतः भस्म से होली शिव-तत्व की अभिव्यक्ति है। आयोजक इसे काशी की ‘विशिष्ट परंपरा’ बताकर संरक्षण की मांग करते हैं।
डोम राजा परिवार के वंशज विश्वनाथ चौधरी और डोम समुदाय ने स्पष्ट आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उत्सव के कारण श्मशान क्षेत्र में भीड़ बढ़ती है, जिससे शोकाकुल परिवारों को 5-10 घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। शराब सेवन, शोर-शराबा और अनुशासनहीनता के आरोप लगाए गए हैं। उनका कहना है कि श्मशान उत्सव स्थल नहीं है, बल्कि अत्यंत पवित्र और संवेदनशील कर्मभूमि है। पुलिस और जिला प्रशासन को लिखित रूप से आयोजन पर रोक की मांग की गई है।
काशी विद्वत परिषद के सचिव राम नारायण द्विवेदी का तर्क अधिक शास्त्रीय है। किसी भी प्रमुख धर्मग्रंथ या स्मृति में ‘मसान होली’ का उल्लेख नहीं मिलता है। श्मशान को उत्सव स्थल मानना शास्त्रसम्मत नहीं है। परिषद के अनुसार, यह परंपरा हाल के वर्षों में प्रचारित हुई है, न कि प्राचीन काल से।
यह विवाद एक बड़े प्रश्न को जन्म देता है। किसी धार्मिक गतिविधि को ‘परंपरा’ मानने की कसौटी क्या है? क्या शास्त्रों, पुराणों या स्थानीय निबंधों में उल्लेख है? क्या कई पीढ़ियों से स्थानीय समाज इसका पालन करता आया है? क्या परंपरा को विद्वत परिषद/धर्माचार्यों की मान्यता है? क्या आयोजन में समय के साथ निरंतरता दिखती है? ‘मसान होली’ इन कसौटियों पर एकमत समर्थन नहीं जुटा पाई है, यहीं से विवाद गहराता है।
प्रशासन के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां हैं। पहला कानून-व्यवस्था के तहत भीड़ प्रबंधन, अग्नि सुरक्षा, शराब/नशा नियंत्रण। दूसरा मानवीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए अंतिम संस्कार में बाधा न हो और तीसरा धार्मिक स्वतंत्रता अनुच्छेद 25 के तहत आस्था के अधिकार का सम्मान।
अब तक प्रशासन ने औपचारिक प्रतिबंध पर निर्णय नहीं लिया है। संभावना जताई जा रही है कि सशर्त अनुमति, सीमांकन, समय-निर्धारण और निगरानी के साथ आयोजन होने दिया जा सकता है।
पिछले दशक में काशी का धार्मिक पर्यटन तेजी से बढ़ा है। सोशल मीडिया, रील्स और व्लॉग्स ने कई धार्मिक गतिविधियों को ‘इवेंट’ का रूप दे दिया है। इसका प्रभाव हुआ कि भीड़ में अप्रत्याशित वृद्धि, स्थानीय मर्यादाओं पर दबाव और आस्था का प्रदर्शनात्मक रूपांतरण। ‘मसान होली’ पर भी यही आरोप लग रहा है कि यह ‘डिजिटल शोकेस’ बनती जा रही है।
भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की शर्तें भी हैं। श्मशान जैसे संवेदनशील स्थल पर क्या उत्सव की अनुमति सीमित/नियंत्रित होनी चाहिए? क्या शोकग्रस्त परिवारों की प्राथमिकता सर्वोपरि है? क्या स्थान-काल का पुनर्निर्धारण समाधान हो सकता है?
काशी की आत्मा विविधताओं में सामंजस्य की सीख देती है। मसान होली पर उठा विवाद केवल एक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह परंपरा, शास्त्र, पर्यटन और आधुनिकता के टकराव का प्रतीक है। समाधान निषेध या अंध-समर्थन में नहीं है, बल्कि संवेदनशील संतुलन में है, जहां आस्था का सम्मान हो, श्मशान की मर्यादा बनी रहे और शोकाकुल परिवारों की पीड़ा प्राथमिकता पाए।
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