देश के लिए अबतक का सबसे निराशाजनक बजट: राजेश राम

देश के लिए अबतक का सबसे निराशाजनक बजट: राजेश राम

*बिहार को बजट में नहीं मिला उसका हिस्सा: राजेश राम*

*पटना. रविवार, 01 फरवरी, 2026*



बजट 2026 पर बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष राजेश राम ने केंद्र की एनडीए सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि आँकड़ों की चमक में उलझाकर सपने बेचने वाली मोदी सरकार ने ज़मीन पर देश की बिखरती अर्थव्यवस्था को छिपाने का काम किया है। बिहार के लिए इस बजट में कुछ भी बेहतर  मिलने की घोषणा नहीं की गई जबकि पिछले साल चुनाव से पूर्व कई लोकलुभावन घोषणा हुआ लेकिन वो अब तक धरातल पर नहीं उतरा है। बिहार को उसके हिस्से की राशि तक नहीं मिल पाई है।

बजट पर बोलते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि बजट के बाद धराशायी होता शेयर बाज़ार बताने के लिए काफी है कि सरकार की नीतियों पर निवेशकों का अविश्वास है।
बजट 2026 पेश होते ही शेयर बाज़ार का गिरना इस बात का संकेत है कि सरकार की आर्थिक नीतियों पर बाज़ार और निवेशकों का भरोसा डगमगा चुका है। यह गिरावट महज़ संयोग नहीं, बल्कि सरकार की नीति की विफलता का परिणाम है।वहीं कॉरपोरेट हित प्राथमिकता पर रखने के कारण आम और छोटे निवेशक हाशिये पर सरकार ने एक बार फिर बड़े कॉरपोरेट घरानों को राहत दी, लेकिन छोटे निवेशक और मध्यम वर्ग को ठोस सहारा नहीं दिया। यही कारण है कि आम निवेशक बाज़ार से पैसा निकालने को मजबूर है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि अर्थव्यवस्था का असंतुलन छुपाने की भरपूर कोशिश इस बजट के माध्यम से किया गया है।
बजट भाषण में विकास के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन कृषि, उपभोग और रोज़गार जैसे मूल स्तंभों पर ठोस योजनाओं का अभाव साफ़ दिख रहा है। यह बजट संतुलन नहीं, बल्कि भ्रम पैदा कर केवल आंकड़ों में सुंदरता दिखाने की कोशिश है। महंगाई पर सरकार की चुप्पी का सीधा असर जनता पर पड़ रहा है। पेट्रोल, गैस, खाद्य पदार्थ—सब महंगे हो रहे हैं, लेकिन बजट में आम आदमी को राहत देने के बजाय उसे “सहनशील” बनने की सलाह वित्त मंत्री द्वारा दी गई। यह न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक असंवेदनशीलता भी है। युवा बेरोज़गारी पर मौन बताते हुए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम ने कहा कि नारों में रोज़गार देने वाली केंद्र की एनडीए सरकार हर साल की तरह इस बार भी रोज़गार के नाम पर शब्दों की बाज़ीगरी कर दी। सरकारी भर्ती का न ही ठोस कैलेंडर और न ही निजी क्षेत्र में नौकरियों को लेकर कोई स्पष्ट योजना सरकार की दिखती है।
लघु और छोटे उद्यम और छोटे व्यापारी इस सरकार में लगातार उपेक्षित हैं।
छोटे उद्योगों के लिए न सस्ती पूंजी, न कर राहत, न बाज़ार सुरक्षा की गारंटी सरकार दे रही है। नतीजा—कारोबार बंद, नौकरियाँ खत्म और अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। राजकोषीय घाटा बढ़ा लेकिन सरकार की जवाबदेही गायब है। सरकार खर्च बढ़ा रही है, लेकिन यह नहीं बता रही कि उसका आर्थिक बोझ आखिर कौन उठाएगा। आने वाले समय में इसका सीधा असर करदाताओं और आम जनता पर पड़ेगा। विदेशी निवेशकों का भरोसा भी डगमगाया है और नीतियों की अस्थिरता और राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण विदेशी निवेशक भी सतर्क हो गए हैं। यही कारण है कि बाज़ार में भारी बिकवाली देखने को मिल रही है।


साथ ही शिक्षा बजट और उच्च शिक्षा के बजट में भारी कटौती के साथ रक्षा कटौती भी किया जा रहा है। यह देश को आर्थिक तौर पर पीछे धकेलने वाला है।


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