सत्ता, जाँच एजेंसियाँ और न्यायपालिका के बीच उलझा संविधान

सत्ता, जाँच एजेंसियाँ और न्यायपालिका के बीच उलझा संविधान

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 05 फरवरी ::

जब किसी देश का रक्षा मंत्रालय किसी पुस्तक के सार्वजनिक वितरण पर रोक लगाता है और वही पुस्तक एक प्रमुख राष्ट्रीय नेता द्वारा खुलेआम लहराई जाती है, तो प्रश्न केवल उस पुस्तक का नहीं रह जाता है। वह प्रश्न बन जाता है, राज्य की सत्ता, कानून की हैसियत और लोकतंत्र की आत्मा का।

रक्षा मंत्रालय द्वारा किसी पुस्तक पर प्रतिबंध कोई सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं होता है। यह निर्णय आम तौर पर तब लिया जाता है जब राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी सूचनाएँ हों। सैन्य रणनीति या ऑपरेशंस उजागर हों या ऐसी सामग्री हो जो देश की सुरक्षा संरचना को नुकसान पहुँचा सकती हो।  ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि यदि पुस्तक राष्ट्रहित के लिए खतरनाक है, तो उसका सार्वजनिक राजनीतिक प्रदर्शन कैसे स्वीकार्य है? और यदि वह खतरनाक नहीं है, तो प्रतिबंध किस आधार पर लगाया गया? यह विरोधाभास बताता है कि या तो निर्णय में ईमानदारी नहीं है, या फिर उसके उल्लंघन पर राजनीतिक मौन है। दोनों ही स्थितियाँ गणतंत्र के लिए खतरनाक हैं।

भारत का संविधान देश को “गणराज्य” घोषित करता है। लेकिन गणतंत्र केवल एक संवैधानिक परिभाषा नहीं है, यह एक नैतिक व्यवस्था है। गणतंत्र की आत्मा चार स्तंभों पर टिकी होती है, वह है कानून की सर्वोच्चता। संस्थाओं की स्वायत्तता। सत्ता की जवाबदेही और राष्ट्रहित की प्राथमिकता। यदि इन चारों में से कोई भी कमजोर पड़ता है, तो गणतंत्र केवल एक औपचारिक ढांचा बनकर रह जाता है यानि अंदर से खोखला हो जाता है।

आज समस्या यह नहीं है कि भारत में कानून नहीं हैं, समस्या यह है कि कानून का प्रयोग व्यक्ति देखकर हो रहा है। आज भारतीय व्यवस्था में लगता है कि कानून की आँखों पर राजनीतिक चश्मा चढ़ा हुआ है। एक तरफ सामान्य नागरिक, पत्रकार, छात्र और लेखक, जिन पर शब्दों, पोस्टों और नारों के लिए कठोर धाराएँ लगा दी जाती हैं। दूसरी तरफ सत्ता में बैठे लोग, प्रभावशाली नेता और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त चेहरे, जिनके कृत्य “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, “राजनीतिक असहमति” या “संवैधानिक अधिकार” कहकर टाल दिए जाते हैं। यह अंतर ही गणतंत्र को भीतर से खोखला करता है।

क्या यही गणतंत्र है? या यह किसी और ही व्यवस्था का नया नाम है? भारत स्वयं को “संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित करता है। लेकिन गणतंत्र केवल एक संवैधानिक शब्द नहीं है। गणतंत्र का अर्थ है कानून के समक्ष समानता। संस्थाओं की सर्वोच्चता। सत्ता का उत्तरदायित्व और राष्ट्रहित के प्रति निर्विवाद निष्ठा। यदि यह तत्व केवल कागज पर रहे और व्यवहार में उनका चयनित उपयोग हो, तो गणतंत्र एक औपचारिक मुखौटा बनकर रह जाता है।

रक्षा मंत्रालय द्वारा किसी पुस्तक पर रोक लगना कोई साधारण घटना नहीं होती है। यह निर्णय सामान्यतः इन कारणों से लिया जाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य गोपनीयता, संवेदनशील रणनीतिक जानकारी या सैनिकों के मनोबल पर प्रतिकूल प्रभाव। ऐसे में प्रश्न उठता है कि यदि पुस्तक राष्ट्रहित के लिए खतरनाक है, तो उसका राजनीतिक मंचों पर प्रदर्शन कैसे स्वीकार्य है? और यदि वह खतरनाक नहीं है, तो रक्षा मंत्रालय की रोक किस आधार पर? यह संस्थागत विरोधाभास है, जहाँ एक ही राज्य के दो अंग अलग-अलग संदेश देते हैं।

राष्ट्रद्रोह (धारा 124A) भारत में सबसे अधिक विवादित कानूनों में से एक रहा है। विडंबना यह है कि सोशल मीडिया पोस्ट पर देशद्रोह। कविता पर देशद्रोह। नारे पर देशद्रोह। लेकिन प्रतिबंधित सामग्री के सार्वजनिक प्रदर्शन पर नहीं। संस्थागत अवज्ञा पर नहीं। संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन पर नहीं। क्या राष्ट्रद्रोह अब कृत्य से नहीं, कर्ता से तय होता है?

राष्ट्रद्रोह का कानून अंग्रेजों ने भारतीयों को दबाने के लिए बनाया था। लेकिन विडंबना यह है कि आजादी के बाद भी यह कानून जीवित है, लेकिन उसका प्रयोग न्यायसंगत नहीं है बल्कि चयनित हो गया है। आज राष्ट्रद्रोह कविता पर लग सकता है। भाषण पर लग सकता है। पोस्टर या पोस्ट पर लग सकता है। लेकिन संवेदनशील सामग्री के राजनीतिक उपयोग पर नहीं। संस्थागत निर्णयों की खुली अवहेलना पर नहीं और सत्ता की अकड़ पर नहीं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या अब राष्ट्रद्रोह अपराध नहीं है बल्कि राजनीतिक पहचान बन चुका है?

लोकतंत्र में संस्थाएँ सत्ता से ऊपर होती हैं। लेकिन जब सत्ता स्वयं को संस्थाओं से ऊपर समझने लगे, तब पतन शुरू होता है। जाँच एजेंसी से सबूत छीनना केवल कानून का उल्लंघन नहीं है, यह राज्य की संप्रभुता को खुली चुनौती है। यदि ऐसा कोई सामान्य नागरिक करता तो जेल तय थी। लेकिन जब ऐसा सत्ता करती है तो बहस शुरू होती है, कार्रवाई नहीं। यही अंतर गणतंत्र को मजाक बना देता है।

किसी राज्य की मुख्यमंत्री यदि जाँच एजेंसी के साथ हाथापाई करे। सबूतों को बलपूर्वक छीने और सार्वजनिक रूप से एजेंसी को चुनौती दे, तो किसी “सामान्य देश” में परिणाम स्पष्ट होते हैं, तत्काल गिरफ्तारी। संवैधानिक पद से हटना और कठोर कानूनी प्रक्रिया लेकिन जब ऐसा नहीं होता है, तो सवाल उठता है कि क्या सत्ता अब कानून से ऊपर है?

लोकतंत्र में जाँच एजेंसियाँ सरकार की नहीं, कानून की प्रतिनिधि होती हैं। उनका कार्य किसी व्यक्ति या दल को निशाना बनाना नहीं, बल्कि तथ्यों की खोज करना होता है। लेकिन जब कोई संवैधानिक पदधारी जाँच एजेंसी के काम में हस्तक्षेप करे। दस्तावेजों या सबूतों को बलपूर्वक अपने कब्जे में ले और खुलेआम एजेंसी को चुनौती दे, तो यह केवल “राजनीतिक टकराव” नहीं रहता है बल्कि यह संवैधानिक अवज्ञा बन जाता है। यह वह बिंदु होता है जहाँ राज्य स्वयं अपने ही कानून के खिलाफ खड़ा दिखाई देता है।

सबूत छीनना अपने आप में एक गंभीर अपराध है। क्योंकि सबूत केवल कागज नहीं होता है बल्कि वह न्याय की रीढ़ होती हैं। जब सबूत सुरक्षित नहीं रहता है तो सच्चाई संदिग्ध हो जाती है। न्याय प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है और जनता का भरोसा टूटता है। यदि यही कार्य कोई आम नागरिक करता है तो उसे “न्याय में बाधा” (Obstruction of Justice) कहा जाता है। लेकिन जब सत्ता ऐसा करती है तो शब्द बदल जाता हैं, “राजनीतिक साजिश”। “संघर्ष की स्थिति” और “संवैधानिक विवाद”। यहीं से कानून का दोहरा चरित्र उजागर होता है।

यह प्रश्न बार-बार उठता है कि जब अपराध सार्वजनिक है, जब दृश्य प्रमाण मौजूद हैं, तो तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं होती? इसका उत्तर कानून में नहीं, राजनीतिक संरचना में छिपा है। भारत में जाँच एजेंसियाँ तकनीकी रूप से स्वतंत्र हैं, लेकिन व्यवहार में वे राजनीतिक सहमति, प्रशासनिक अनुमति और “समय की अनुकूलता” पर निर्भर करती दिखाई देती हैं। यही निर्भरता कानून को निष्प्रभावी बना देती है।

सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र की अंतिम आशा माना जाता है। लेकिन एक खतरनाक प्रवृत्ति पिछले वर्षों में उभरी है। अदालत अब न्याय का स्थान कम, राजनीतिक ढाल अधिक बनती जा रही है। हर संवेदनशील मामले में तुरंत याचिका, अंतरिम राहत और लंबी सुनवाई। इससे दो प्रभाव पड़ते हैं पहला कानूनी प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और दूसरा नैतिक जवाबदेही समाप्त हो जाती है। न्यायालय कानून देखता है, लेकिन समाज नैतिकता भी देखता है।

संविधान प्रक्रिया पर चलता है, लेकिन गणतंत्र नैतिकता पर जीवित रहता है। आज भारत में स्थिति यह है कि प्रक्रिया पूरी हो रही है, लेकिन नैतिकता गायब है। कोई नेता कह सकता है “मैं दोषी साबित नहीं हुआ हूँ”। यह कानूनी रूप से सही हो सकता है, लेकिन नैतिक रूप से अपर्याप्त। गणतंत्र केवल दोष सिद्ध होने से नहीं बल्कि दायित्व स्वीकार करने से मजबूत होता है।

जब सत्ता को यह भरोसा हो जाए कि कानून कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। संस्थाएँ दबाव में रहेगी और अदालत अंततः समय दे देगी, तो भय नहीं रहता है और जहाँ भय नहीं रहता है वहाँ अनुशासन नहीं रहता है। यह स्थिति लोकतंत्र से ज्यादा संवैधानिक अराजकता की ओर संकेत करती है।

यह समस्या केवल सत्ता पक्ष की नहीं है। विपक्ष, समर्थक बुद्धिजीवी और वैचारिक समूह भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। जब “हमारे नेता” के लिए तर्क और “दूसरों” के लिए कानून लागू किया जाता है, तो लोकतंत्र पक्षपात का शिकार हो जाता है। चयनित विरोध और चयनित समर्थन गणतंत्र को अंदर से खोखला कर देता है।

भारत में न्याय मिलने में वर्षों लग जाता है। इस देरी का सबसे बड़ा लाभ सत्ता और प्रभावशाली लोगों को मिलता है। जब तक फैसला आता है मुद्दा ठंडा पड़ चुका होता है। जनता थक चुकी होती है और जवाबदेही अप्रासंगिक हो जाती है। यह न्याय नहीं, न्याय का क्षरण कहलाता है।

आज का भारतीय सार्वजनिक जीवन एक विचित्र नैतिक द्वैत से ग्रस्त है। एक वर्ग के लिए नियम। दूसरे के लिए अपवाद और तीसरे के लिए मौन। यही चयनित नैतिकता धीरे-धीरे गणतंत्र को खोखला करती है।

यदि यही घटनाएँ किसी अन्य विचारधारा से जुड़ी होतीं, किसी अन्य राज्य में घटतीं, तो प्राइम टाइम ट्रायल, अंतरराष्ट्रीय लेख, लोकतंत्र खतरे में के नारे लगते, लेकिन यहाँ लोग मौन है, औचित्यकरण है या फिर विषयांतरण। जबकि मौन भी एक प्रकार की सहमति होती है।

स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता नहीं होता है। लोकतंत्र का अर्थ अनुशासनहीनता नहीं होता है और असहमति का अर्थ राष्ट्रविरोध नहीं होता है। लेकिन जब राष्ट्रहित को राजनीतिक हथियार बनाया जाए, जब कानून को सुविधानुसार मोड़ा जाए और जब संस्थाओं को कमजोर किया जाए, तो स्वतंत्रता स्वेच्छाचार में बदल जाती है।

इतिहास गवाह है कि रोमन गणराज्य का पतन, वाइमर जर्मनी की अराजकता और कई लोकतंत्रों का आत्मघात, सभी की शुरुआत हुई थी कानून की अवहेलना को सामान्य मान लेने से।

26 जनवरी परेड नहीं है। संविधान केवल प्रस्तावना नहीं है। गणतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन नहीं है। गणतंत्र है जवाबदेही, समान कानून और राष्ट्र के प्रति ईमानदार निष्ठा। 

तो क्या यही गणतंत्र है? यदि कानून व्यक्ति देखकर बदले। राष्ट्रहित राजनीतिक सुविधा बने और संस्थाएँ मौन साध लें। तो नहीं, यह गणतंत्र नहीं, यह केवल चुनावों से सजी अराजकता है। लेकिन यदि समाज सवाल पूछना बंद न करे, यदि नागरिक मौन न साधे और यदि सत्य असुविधाजनक होने पर भी बोला जाए तो गणतंत्र अभी जीवित है।

यह सवाल अब केवल यह नहीं रह गया है कि “कानून का उल्लंघन हुआ या नहीं?” असल प्रश्न यह है कि क्या भारत में कानून अब भी सर्वोच्च है या वह सत्ता की सुविधा बन चुका है? यदि कानून व्यक्ति देखकर बदले, तो गणतंत्र केवल किताबों में रह जाता है।
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