वैश्विक व्यवस्था पर किया गया प्रहार है - डोनाल्ड ट्रंप की कार्रवाई
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 09 जनवरी ::
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किया गया कदम केवल एक देश, एक नेता या एक शासन के विरुद्ध की गई कार्रवाई भर नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था पर किया गया प्रहार है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बड़े संघर्षों की राख से जन्मी थी। यह घटना एक ऐसा संकेतक (Indicator) बन चुकी है, जो बताती है कि दुनिया किस दिशा में बढ़ रही है।
यह प्रश्न अब केवल वेनेज़ुएला, निकोलस मादुरो या अमेरिका तक सीमित नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून अब केवल कमजोर देशों के लिए है? क्या संप्रभुता एक सशर्त अवधारणा बनती जा रही है? क्या बहुपक्षवाद अपने अंतिम दिनों में प्रवेश कर चुका है? और क्या भविष्य की दुनिया “नियमों” से नहीं बल्कि “ताकत” से संचालित होगी?
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का मूल मंत्र दो सिद्धांतों पर टिका है, वह है राष्ट्रीय संप्रभुता और आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(1) स्पष्ट करता है कि सभी राष्ट्र समान संप्रभु हैं। अनुच्छेद 2(7) किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप पर रोक लगाता है। किसी देश के मौजूदा या निर्वाचित राष्ट्रपति को उसके अपने देश से, बिना उस देश की सहमति से, बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति से जबरन पकड़कर ले जाना, न केवल इन सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि यह पूरे अंतरराष्ट्रीय कानून ढांचे को अर्थहीन कर देता है।
इतिहास में सत्ता परिवर्तन हुआ है, तख्तापलट हुआ है, यहां तक कि विदेशी हस्तक्षेप भी हुआ है। लेकिन पनामा में नोरिएगा की गिरफ्तारी भी युद्ध की औपचारिक घोषणा के बाद हुई। सद्दाम हुसैन को इराकी धरती पर पकड़ा गया, कब्जे की स्थिति में। मिलोसेविच को सर्बिया सरकार ने सौंपा, बाहरी अपहरण नहीं हुआ। यहां एक नई रेखा खींची गई है एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को तीसरे देश द्वारा, उसकी मर्जी के विरुद्ध, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की अनदेखी करते हुए उठा ले जाना। यही इस घटना को इतिहास में लगभग अभूतपूर्व बनाता है।
बहुपक्षवाद का अर्थ है सामूहिक निर्णय, साझा नियम, संस्थागत वैधता, लेकिन पिछले एक दशक में देखा गया है कि संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार किया गया, WTO को निष्क्रिय किया गया, अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के फैसलों को नजरअंदाज किया गया और “Coalition of the Willing” जैसी अवधारणाएं बढ़ीं। ट्रंप की यह कार्रवाई उस प्रक्रिया की पराकाष्ठा है। यह संदेश स्पष्ट है कि “अगर आप ताकतवर हैं, तो नियम आपके लिए बाध्यकारी नहीं हैं।”
अमेरिका लंबे समय से स्वयं को लोकतंत्र का संरक्षक, मानवाधिकारों का प्रहरी और नियम आधारित व्यवस्था का रक्षक बताता रहा है। लेकिन ट्रंप युग में यह मुखौटा खुलकर गिरा है। यह कार्रवाई बताता है कि कानून एक उपकरण है, सिद्धांत नहीं। मानवाधिकार एक चयनात्मक भाषा है। संप्रभुता केवल मित्र देशों के लिए मान्य है। यह Realpolitik का नग्न प्रदर्शन है, जहां नैतिकता केवल भाषणों में बची है।
यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि मादुरो शासन के आलोचक देश भी इस कदम का समर्थन करने से हिचकिचा रहे हैं, सिवाय चीन के। चीन का समर्थन कोई नैतिक समर्थन नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक निवेश है। चीन समझता है कि आज अमेरिका यह कर रहा है तो कल यही मिसाल उसके लिए भी उपयोगी हो सकता है। यह एक नई महान शक्तियों की सहमति है “संप्रभुता अब पूर्ण नहीं, सापेक्ष है।”
यदि यह मिसाल सामान्य हो जाती है, तो अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया और मध्य एशिया के देशों के लिए संप्रभुता केवल कागजी अवधारणा रह जाएगी। आज मादुरो है, कल कोई और होगा। आज अमेरिका है, कल कोई दूसरी महाशक्ति होगी। यह कानूनविहीन अंतरराष्ट्रीय जंगल की ओर संकेत करता है।
इस कार्रवाई को यह कहकर जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है कि “यह लोकतंत्र की रक्षा के लिए था।” लेकिन प्रश्न यह है कि लोकतंत्र तय करने का अधिकार किसे है? कौन तय करेगा कि कौन ‘वैध’ है? क्या बंदूक और ड्रोन लोकतंत्र के नए मतपत्र हैं? यह तर्क लोकतंत्र नहीं, बल्कि नव-साम्राज्यवाद है।
कानून तब तक कानून है, जब तक वह समान रूप से लागू हो, शक्तिशाली पर भी बाध्यकारी हो। यदि कानून केवल कमजोर पर लागू हो और शक्तिशाली उसे तोड़ सकें तो वह कानून नहीं, अनुशासनात्मक छड़ी बन जाता है। यह घटना अंतरराष्ट्रीय कानून की न तो अचानक मृत्यु है और न औपचारिक अंत, बल्कि उसका धीरे-धीरे आत्मसमर्पण है।
भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति अत्यंत जटिल है। एक ओर नियम-आधारित व्यवस्था भारत के हित में है तो दूसरी ओर शक्ति-राजनीति की अनदेखी आत्मघाती हो सकता है। भारत और वैश्विक दक्षिण के सामने प्रश्न है कि क्या वे मूक दर्शक बने रहेंगे या बहुपक्षवाद को बचाने का प्रयास करेंगे?
जहां कानून नहीं, ताकत निर्णायक होगी। जहां अलग-अलग ब्लॉक अपने-अपने नियम बनाएंगे। जहां सुधार के साथ बहुपक्षवाद बचेगा, सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी विकल्प। “यह एक नई रेखा तैयार हो चुकी है, जो पहले कभी न हुई थी।” यह रेखा केवल भू-राजनीतिक नहीं है, यह नैतिक, कानूनी और सभ्यतागत रेखा है। यदि इसे समय रहते रोका नहीं गया तो भविष्य की दुनिया ऐसी होगी जहां किसी भी देश का नेता,किसी भी रात, किसी भी ताकत द्वारा, कहीं से भी उठाया जा सकेगा और तब इतिहास यह नहीं पूछेगा कि किसने शुरुआत की बल्कि यह पूछेगा कि किसने चुप रहकर इसे संभव बनाया।
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