अहंकार, आत्ममंथन और भारतीय लोकतंत्र का भविष्य होगा - वर्ष 2026 का राजनीतिक

अहंकार, आत्ममंथन और भारतीय लोकतंत्र का भविष्य होगा - वर्ष 2026 का राजनीतिक

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 07 जनवरी ::

वर्ष 2026 का शुभारंभ हो गया है। जैसे वायु के बिना जीवन संभव नहीं है, वैसे ही राजनीति के बिना मानव समाज की दिशा, दशा और गति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि समाज की चेतना, आकांक्षा और संघर्ष का प्रतिबिंब है। यदि राजनीति जीवन की धड़कन है, तो उसका निरंतर चलना ही वर्ष का समापन और नए वर्ष का आरंभ संभव बनाता है। प्रश्न यह नहीं कि राजनीति हो या न हो, प्रश्न यह है कि कैसी राजनीति हो? वर्ष 2026 इसी प्रश्न के साथ लोगों के सामने खड़ा है।

स्वतंत्र भारत की राजनीति मुख्यतः दो धुरियों पर घूमती रही है वह है कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)। बाकी राजनीतिक दल, चाहे वे क्षेत्रीय हों या वैचारिक, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं दो ध्रुवों के इर्द-गिर्द अपनी भूमिका तय करते रहे हैं। कोई स्थायी तीसरा ध्रुव अब तक खड़ा नहीं हो सका है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कांग्रेस और भाजपा भारतीय राजनीति की दो धुरी नहीं, बल्कि दो स्कूल ऑफ थॉट हैं।

इन दोनों दलों के बीच जो सबसे मूलभूत और निर्णायक अंतर है, वह है हार से सीखने की क्षमता। भाजपा जब चुनाव हारती है, तो वह उसे आत्ममंथन का अवसर बनाती है। संगठनात्मक सुधार करती है। नेतृत्व बदलने से नहीं हिचकती। रणनीति, भाषा और मुद्दों में परिवर्तन करती है। वहीं कांग्रेस के लिए हार अब आत्मचिंतन नहीं, आत्मरक्षा बन चुकी है। नेतृत्व प्रश्न अछूत है। जनता दोषी है, पार्टी नहीं। पराजय के बाद भी वही राग मल्हार।

2024 का लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के लिए निर्णायक मोड़ था। यह चुनाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि राजनीतिक मनोविज्ञान का था। भाजपा को बहुमत के लिहाज से झटका लगा और विपक्ष को लगा कि सत्ता करीब है। लेकिन यहीं से फर्क पैदा हुआ। जनभावना को दोबारा समझा। संगठन को कसाव दिया। सहयोगियों को सम्मान दिया और जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया। लेकिन कांग्रेस ने जीत के भ्रम में हार को नकारा। आत्मश्लाघा को रणनीति बना लिया और सोशल मीडिया को जमीनी राजनीति का विकल्प समझ लिया, जबकि परिणाम सबके सामने है।

वर्ष 2025 में देश के 313 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव हुए। परिणाम बेहद कठोर था। कांग्रेस को मात्र 6 सीटें मिली। यह आंकड़ा केवल चुनावी हार नहीं है, बल्कि राजनीतिक चेतना के लोप का संकेत था। फिर भी नेतृत्व वही, भाषा वही, आरोप वही और रणनीति वही, यही वह बिंदु है जहाँ कांग्रेस आत्मघात की राजनीति कर रही है। वर्ष 2025 केवल कांग्रेस के लिए नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति के कई चेहरों के लिए डूबने का वर्ष साबित हुआ।

राहुल गांधी स्वयं को वैचारिक उत्तराधिकारी मानता है। जमीनी यथार्थ से कटाव है। बहुसंख्यक समाज को स्थायी विरोधी समझता है। अरविंद केजरीवाल नैतिक राजनीति का दावा करते हैं। सत्ता में आते ही सत्ता-संरक्षण और आंदोलन से प्रशासन तक की यात्रा में आत्मविस्मृति दिखता है। तेजस्वी यादव विरासत को अधिकार समझता है। सामाजिक समीकरणों को स्थायी मान लेता है और विकास के बजाय प्रतीकात्मक राजनीति करते हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि ये नेता हारे, प्रश्न यह है कि डूबे क्यों? संभावित कारण स्पष्ट हैं कि खुद को जनता से ऊपर समझना। अपनी सीमाओं को न पहचानना। बहुसंख्यक समाज को जागीर मान लेना। मिथ्या और भ्रम को सत्य से ऊपर रखना। “अहं ब्रह्मास्मि” के आवरण में जीना, जबकि लोकतंत्र में अहंकार सबसे बड़ा अपराध है।

इन सभी नेताओं और दलों की सबसे बड़ी भूल यही रही कि उन्होंने जनता को समझने के बजाय, जनता को पढ़ाने की कोशिश की। भारतीय मतदाता अब भावनात्मक नहीं, विवेकशील है। पहचान से आगे विकास देखता है और नारों से नहीं, नीयत से प्रभावित होता है, जो इसे नहीं समझ पाया, वह 2025 में डूब गया। अब वर्ष 2026 शुरू हो चुका है। इस वर्ष देश के पांच अहम राज्यों में चुनाव होने हैं असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी। यह केवल राज्य चुनाव नहीं है, बल्कि 2029 की राजनीतिक दिशा तय करने वाले संकेतक हैं।

पश्चिम बंगाल में राजनीति अब विचारधारा नहीं बल्कि पहचान और अहंकार की लड़ाई बन चुकी है। यदि विपक्ष वही पुराना रास्ता अपनाता रहा, तो परिणाम वही होंगे जो 2025 में दिखे। वर्ष 2026 केवल नया कैलेंडर नहीं है। यह भारतीय राजनीति के लिए आत्ममंथन का अवसर, अहंकार त्यागने की चेतावनी और जनता के सामने नतमस्तक होने की परीक्षा है जो दल और नेता यह नहीं समझेंगे, वे इतिहास में केवल एक फुटनोट बनकर रह जाएंगे।

भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसका कोई एक नेता नहीं है, बल्कि उसका संगठनात्मक चरित्र है। भाजपा ने स्वयं को व्यक्ति-केन्द्रित पार्टी बनने से बचाया है। जहाँ कांग्रेस नेतृत्व को पूजा की वस्तु बनाती रही, वहीं भाजपा नेतृत्व को उत्तरदायित्व मानती है। भाजपा की राजनीति का मूल मंत्र रहा है बूथ स्तर पर पकड़, कार्यकर्ता का सम्मान और विचारधारा की स्पष्टता। यही कारण है कि हार के बाद भी भाजपा बिखरती नहीं है, बल्कि और सघन होती जाती है।

2004 की हार से “इंडिया शाइनिंग” का भ्रम टूटा, अटल युग का समापन हुआ और पार्टी ने माना कि वह जनता से कट गई थी।  2009 की हार के बाद नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तन, संगठन का पुनर्गठन और नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय भूमिका मिली। 2018 विधानसभा झटके ने रणनीति बदली, कल्याणकारी योजनाओं पर फोकस और स्थानीय नेतृत्व को तरजीह दिया गया। 2024 लोकसभा परिणाम ने गठबंधन राजनीति की पुनर्खोज, संवाद की भाषा में नरमी और अहंकार के बजाय यथार्थ दिखाया। भाजपा हर हार को राजनीतिक प्रयोगशाला में बदल देती है।

कांग्रेस आज भी यह मानने को तैयार नहीं है कि नेहरू-गांधी युग समाप्त हो चुका है। उसकी राजनीति अब तीन भ्रमों में जी रही है इतिहास का भ्रम, वंश का भ्रम और स्वाभाविक सत्ता का भ्रम। कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट है नेतृत्व पर सवाल पूछना अपराध, जमीनी नेता हाशिये पर और सोशल मीडिया को जनसंवाद मान लेना। यही कारण है कि हर चुनाव के बाद कांग्रेस “हम नैरेटिव जीत गए” का राग अलापती रहती है। कांग्रेस आज भी वही राग मल्हार अलाप रही है। हार को नैतिक जीत कहना। जनता को “भ्रमित” बताना। मीडिया, ईवीएम और संस्थाओं को दोष देना। लेकिन हार पर आत्मचिंतन? वह तो पार्टी शब्दकोश से गायब हो चुका है।

वर्ष 2025 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विपक्ष का संकट व्यक्ति-आधारित राजनीति है। अरविंद केजरीवाल तो आंदोलन से अहंकार तक है  उनका मानना है कि “मैं अलग हूँ” का भ्रम, सत्ता में आते ही सत्ता की भाषा और जवाबदेही से पलायन। वहीं,  तेजस्वी यादव विरासत का बोझ है, इसलिए सामाजिक समीकरणों पर अंधा भरोसा, युवाओं की आकांक्षा से दूरी और विकास के बजाय प्रतीक। अन्य क्षेत्रीय नेता जाति और समुदाय को स्थायी मान लेना। मतदाता को स्थिर समझना और समय के साथ न बदलना। यही नियती बना हुआ है। 

सबसे बड़ा परिवर्तन भारतीय मतदाता में आया है। आज का मतदाता सरकार से सवाल करता है। लाभ और नीति दोनों देखता है और पहचान से आगे प्रदर्शन चाहता है, जो दल यह नहीं समझ पाया, वह 2025 में इतिहास बन गया। विपक्ष की सबसे बड़ी भूल रही है बहुसंख्यक समाज को या तो दुश्मन समझना या जागीर। जबकि सच्चाई यह है कि बहुसंख्यक समाज विविध है, वह स्थायी वोट बैंक नहीं है, वह सम्मान चाहता है, उपदेश नहीं। भाजपा ने इस मनोविज्ञान को समझा, लेकिन विपक्ष ने नहीं। वर्ष 2025 की राजनीति में मिथ्या सबसे बड़ा हथियार बना। झूठे नैरेटिव, अधूरी सच्चाइयाँ, भावनात्मक अतिशयोक्ति, लेकिन जनता ने अंततः यथार्थ को चुना।

राजनीति में यदि कोई भाव सबसे विनाशकारी है, तो वह है “अहंकार”। जब नेता स्वयं को विचारधारा से बड़ा, जनता से ऊपर और आलोचना से परे, समझने लगता है, तब उसका पतन तय हो जाता है। 2025 इसका प्रमाण है।  अब प्रश्न यह है कि क्या वर्ष 2026 में विपक्ष बदलेगा? संभावनाएँ हैं, पर इच्छाशक्ति नहीं दिखती। यदि वही नेतृत्व, भाषा, रणनीति और अहंकार, बरकरार रहा तो परिणाम वही होंगे। असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी राज्यों में सांस्कृतिक रूप से विविध, वैचारिक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक रूप से निर्णायक होगा और यहाँ के परिणाम लोक सभा चुनाव 2029 की नींव रखेगा।

वर्ष 2026 की राजनीति का मूल प्रश्न यही है कि क्या दल जनता से सीखेंगे या जनता को सिखाते रहेंगे?जो सीखेंगे, वही टिकेंगे। जो नहीं सीखेंगे, वे इतिहास के पन्नों में एक असफल प्रयोग बनकर रह जाएंगे। वर्ष 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव सामान्य प्रांतीय चुनाव नहीं हैं। यह चुनाव वास्तव में 2024 लोकसभा के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा,  2025 में विपक्ष की पराजय के बाद आत्मबोध का अवसर और 2029 की राष्ट्रीय राजनीति की भूमि-तैयारी हैं। असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी, इन पाँच राज्यों का राजनीतिक चरित्र अलग-अलग है, लेकिन संदेश एक होगा।

असम आज पूर्वोत्तर राजनीति का केंद्र बन चुका है। यहाँ भाजपा की स्थिति स्पष्ट है। अवैध घुसपैठ पर स्पष्ट रुख, नागरिकता, पहचान और सुरक्षा का मुद्दा, बुनियादी ढाँचे में दृश्य परिवर्तन और नेतृत्व में स्पष्टता। भाजपा यहाँ केवल चुनाव नहीं, बल्कि राज्य की परिभाषा गढ़ रही है। वहीं विपक्ष की चुनौती है। कांग्रेस अब भी 1980–90 के असम में अटकी है, जातीय और भाषाई संतुलन को लेकर भ्रम में है और कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं है। यदि विपक्ष वही पुराना विमर्श दोहराता रहा, तो असम में उसका पतन और गहरा होगा।

केरल को लंबे समय तक “वामपंथ का गढ़” कहा जाता रहा है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। युवा वर्ग वैचारिक नारों से ऊब चुका है, रोजगार, निवेश और अवसर की मांग हो रही है और खाड़ी मॉडल पर निर्भरता सीमित हो रही है।  वामपंथ और कांग्रेस दोनों एक-दूसरे की जगह नहीं ले पा रहे है। भाजपा का धीमा लेकिन स्थिर विस्तार हो रहा है और पहचान की राजनीति से बाहर आने की जरूरत है।  2026 में केरल एक आश्चर्यजनक मोड़ दे सकता है।

तमिलनाडु की राजनीति दशकों से द्रविड़ पहचान के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन नई पीढ़ी भावनात्मक भाषण नहीं, ठोस नीति चाहती है। हिन्दी-विरोध अब वैसा प्रभाव नहीं डालता है। राष्ट्र और राज्य के बीच संतुलन की मांग बढ़ रही है। भाजपा की चुनौती सीमित संगठन है लेकिन वैचारिक प्रवेश हो चुका है। DMK और विपक्ष सत्ता में रहते हुए अहंकार, केंद्र-विरोध ही मुख्य एजेंडा और स्थानीय प्रशासन पर सवाल खड़ा करता है। 2026 यहाँ धीरे बदलाव का संकेत देगा। पुडुचेरी का चुनाव हमेशा राष्ट्रीय राजनीति का सूक्ष्म संकेत देता है। गठबंधन राजनीति का प्रयोग। स्थानीय बनाम केंद्रीय प्रभाव और प्रशासन बनाम राजनीति, यहाँ परिणाम सीटों से ज्यादा संदेश देगा।

यदि 2026 का कोई एक राज्य राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेगा, तो वह है पश्चिम बंगाल। ममता बनर्जी का मॉडल व्यक्तिवादी सत्ता है। केंद्र-विरोध को राज्यहित बताना है और प्रशासन पर पार्टी का नियंत्रण रखना है। लेकिन हिंसा और अराजकता से जनता थक रही है। रोजगार और उद्योग का संकट और सांस्कृतिक टकराव है। विपक्ष की स्थिति में कांग्रेस लगभग अप्रासंगिक और वामपंथ स्मृति बन चुका है। भाजपा एकमात्र विकल्प के रूप में उभर रही है। यदि विपक्ष आत्ममंथन नहीं करता है, तो बंगाल में 2025 जैसा परिणाम
दोहराया जा सकता है।

अब विपक्ष के सामने तीन ही रास्ते हैं पहला नेतृत्व परिवर्तन- वंश नहीं, योग्यता और प्रतीक नहीं, परिणाम। दूसरा वैचारिक स्पष्टता- विरोध मात्र नीति नहीं बल्कि सकारात्मक एजेंडा जरूरी। तीसरा जनता से संवाद- उपदेश नहीं, सहभागिता और आरोप नहीं, समाधान। यदि यह नहीं हुआ, तो विपक्ष केवल चुनावी उपस्थिति बनकर रह जाएगा। इतिहास गवाह है कि जिसने स्वयं को जनता से ऊपर समझा, जिसने सत्ता को स्थायी माना और जिसने आलोचना को अपमान समझा, वह सत्ता से ही नहीं, इतिहास से भी बाहर हो गया है। 2025 इसका नवीनतम उदाहरण है। राजनीति यदि सेवा है, तो उसमें विनम्रता अनिवार्य है। लेकिन यदि राजनीति आत्मप्रदर्शन, वैचारिक दंभ और नैतिक श्रेष्ठता का दावा बन जाए, तो उसका अंत तय है। वर्ष 2026 किसी दल के लिए उत्सव का नहीं, चेतावनी का वर्ष है। जो समझेगा, वह बचेगा। जो नहीं समझेगा, वह 2029 से पहले ही इतिहास हो जाएगा।

2026 के चुनाव यह तय करेगा कि भारतीय राजनीति आत्ममंथन करेगी या आत्मविनाश। लोकतंत्र संवाद चुनेगा या दंभ और जनता निर्णायक बनेगी या केवल दर्शक संकेत स्पष्ट हैं। अब निर्णय दलों को करना है। भारतीय लोकतंत्र कोई जड़ प्रणाली नहीं है। यह एक जीवित चेतना है, जो समय, समाज और परिस्थितियों के साथ स्वयं को निरंतर बदलती रहती है। जो दल यह मान लेते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनाव है। जनता केवल मतदाता है और सत्ता स्थायी उपलब्धि है। वे लोकतंत्र की आत्मा को ही नकार देते हैं। वर्ष 2026 इसी आत्मा की परीक्षा है।

भारतीय राजनीति आज जिस सबसे बड़े मोड़ पर खड़ी है, वह है सत्ता बनाम सेवा। यदि राजनीति सत्ता है तो अहंकार स्वाभाविक है, तो विरोधी शत्रु है और तो जनता केवल संख्या है। यदि राजनीति सेवा है तो विनम्रता अनिवार्य है, तो आलोचना अवसर है और तो जनता सर्वोच्च है। 2025–26 ने स्पष्ट कर दिया है कि जनता अब सत्ता की राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी। अक्सर कहा जाता है कि “राजनीति में नैतिकता संभव नहीं।” यह कथन अधूरा है। सच यह है कि राजनीति में उपदेशात्मक नैतिकता नहीं चलती है लेकिन व्यवहारिक नैतिकता अनिवार्य है। जो दल कहते कुछ हैं, करते कुछ। बोलते सत्य हैं, व्यवहार में झूठ और आदर्श की बात करते हैं, आचरण में अहंकार रखते हैं वे जनता की नजर में गिरते हैं। 2025 में यही हुआ।

भारतीय मतदाता को लंबे समय तक भावुक, भ्रमित, जातिगत और स्थिर मान लिया गया है। लेकिन 2024–25 ने यह भ्रम तोड़ दिया। आज की जनता प्रश्न पूछती है, तुलना करती है, विकल्प तलाशती है और आवश्यकता पड़े तो प्रयोग भी करती है। जो दल इस जनता को “मास” समझेगा, वह स्वयं इतिहास का “पास्ट” बन जाएगा। विपक्ष के सामने अब कोई चौथा रास्ता नहीं है। या तो पुनर्जन्म नेतृत्व में परिवर्तन, विचार में स्पष्टता, संगठन में लोकतंत्र और जनता से वास्तविक संवाद करना होगा।  या विसर्जन वही चेहरे, वही नाराज़गी, वही आरोप और वही पराजय। इतिहास गवाह है कि राजनीति में रिक्त स्थान कभी खाली नहीं रहता है। यदि विपक्ष नहीं सुधरेगा, तो जनता नया विकल्प गढ़ लेगी।

यदि 2026 के संकेतों को जोड़ें, तो 2029 की संभावित तस्वीर उभरती है एक मजबूत केंद्र लेकिन अधिक सतर्क जनता, कमजोर लेकिन बदलने को मजबूर विपक्ष और राजनीति में विचार से अधिक प्रदर्शन की मांग 2029 का भारत नारों से नहीं, नतीजों से वोट करेगा। लोकतंत्र में अहंकार आत्महत्या है। जिस दिन नेता यह मान ले कि “मेरे बिना कुछ नहीं”, उसी दिन जनता उसे यह दिखा देती है “तेरे बिना भी सब चलेगा।”

वर्ष 2026 नेताओं के लिए परीक्षा है, दलों के लिए चेतावनी है, जनता के लिए अवसर है, यह वर्ष तय करेगा कि राजनीति आत्ममंथन करेगी या इतिहास खुद को दोहराएगा।
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