सुशासन के 20 वर्ष - “न्याय से समृद्धि तक”

सुशासन के 20 वर्ष - “न्याय से समृद्धि तक”

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 20 जनवरी ::
 
वर्ष 2005 बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है। यह वह वर्ष था जब राज्य ने पहली बार अपने अतीत से अलग भविष्य की ओर देखने का साहस किया था। उस परिवर्तन की नींव 12 जुलाई 2005 को शुरू हुई नीतीश कुमार की “न्याय यात्रा” से पड़ी। यह यात्रा केवल सत्ता परिवर्तन का अभियान नहीं था, बल्कि बिहार के सामाजिक-राजनीतिक मनोविज्ञान को झकझोरने वाली चेतना थी।

उस समय बिहार जिस दौर से गुजर रहा था, उसे शब्दों में बांधना कठिन है। अपराध, अपहरण, जातीय हिंसा और प्रशासनिक अराजकता राज्य की पहचान बन चुकी थी। सरकारी दफ्तरों में आम आदमी का प्रवेश लगभग असंभव था। पुलिस थानों में न्याय नहीं, बल्कि भय का वातावरण था। स्कूल और अस्पताल नाम मात्र के रह गए थे। सड़कों की हालत ऐसी थी कि गांव-गांव का संपर्क टूट चुका था। पलायन बिहार के युवाओं की नियति बन चुका था।

राजनीतिक रूप से यह लालू-राबड़ी युग का अंतिम चरण था। सामाजिक न्याय की राजनीति ने वंचित वर्गों को राजनीतिक आवाज दी थी, लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था शिथिल पड़ गई। न्याय की अवधारणा सत्ता की ढाल बन गई और शासन की जगह केवल प्रतीकात्मक राजनीति रह गई। जनता के भीतर असंतोष था, लेकिन उसे दिशा देने वाला कोई स्पष्ट विकल्प नहीं दिख रहा था।

इसी पृष्ठभूमि में नीतीश कुमार ने “न्याय यात्रा” की शुरुआत की। यह यात्रा उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक पहल थी, क्योंकि इसमें सत्ता का दावा कम और व्यवस्था पर प्रश्न अधिक था। नीतीश कुमार ने गांव-गांव जाकर केवल भाषण नहीं दिए, बल्कि लोगों से उनके अनुभव सुने, अपहरण की कहानियाँ, जमीन विवाद, पुलिस की बेरुखी, स्कूलों की बदहाली, महिलाओं की असुरक्षा।

इस यात्रा का सबसे बड़ा प्रभाव यह था कि इसने जनता के भीतर यह विश्वास पैदा किया कि बदलाव संभव है। पहली बार लोगों को लगा कि कोई नेता उनके डर को समझ रहा है और समाधान की बात कर रहा है। “न्याय” यहाँ केवल कानूनी शब्द नहीं था, बल्कि जीवन की मूल सुरक्षा का वादा था, रात में चैन की नींद, सड़क पर निर्भय चलना, और अपने हक की बात कहने का साहस।

नीतीश कुमार ने इस यात्रा में किसी वर्ग विशेष को नहीं, बल्कि पूरे समाज को संबोधित किया। उन्होंने सामाजिक न्याय की भावना को नकारा नहीं, बल्कि उसे कानून के राज से जोड़ा। उनका संदेश स्पष्ट था कि बिना कानून-व्यवस्था के सामाजिक न्याय भी टिक नहीं सकता है। यह एक वैचारिक मोड़ था, जिसने बिहार की राजनीति को नई दिशा दी।

“न्याय यात्रा” ने विपक्ष की राजनीति को भी असहज कर दिया। यह पहली बार था जब लालू-राबड़ी शासन को केवल भ्रष्टाचार या परिवारवाद के आधार पर नहीं, बल्कि आम आदमी की असुरक्षा और अपमान के आधार पर चुनौती दी गई। नीतीश कुमार का सवाल सीधा था कि क्या बिहार का नागरिक सुरक्षित है?

इस प्रश्न ने जनता के मन में गहरी जगह बनाई। यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे एक वैकल्पिक शासन मॉडल की रूपरेखा उभरने लगी। जहाँ राज्य का पहला दायित्व नागरिक की सुरक्षा हो। यह सोच चुनावी घोषणापत्र से कहीं अधिक प्रभावी थी, क्योंकि यह लोगों के रोजमर्रा के अनुभव से जुड़ी थी।

2005 का चुनाव इसी मनोविज्ञान की परिणति था। जनता ने बदलाव के पक्ष में मतदान किया। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और उन्होंने सबसे पहले वही किया, जिसकी घोषणा “न्याय यात्रा” में की थी, अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, पुलिस व्यवस्था में सुधार, त्वरित न्याय की पहल और प्रशासनिक अनुशासन।

इस सत्ता परिवर्तन का ऐतिहासिक महत्व यह था कि यह केवल सरकार बदलने का क्षण नहीं था, बल्कि राज्य की प्राथमिकताओं के बदलने का क्षण था। अब राजनीति का केंद्र जातीय संतुलन से हटकर कानून-व्यवस्था और विकास की ओर बढ़ने लगा।

“न्याय यात्रा” इस परिवर्तन की वैचारिक आधारशिला थी। इसने साबित किया कि बिहार की जनता केवल पहचान की राजनीति नहीं चाहती है, बल्कि सम्मान और सुरक्षा भी चाहती है। यह यात्रा बिहार के लिए एक मनोवैज्ञानिक मुक्ति थी, डर से बाहर निकलने की शुरुआत।

आज, जब दो दशक बाद “समृद्धि यात्रा” शुरू हो रही है, तो उसकी जड़ें उसी “न्याय यात्रा” में हैं। क्योंकि बिना न्याय के समृद्धि संभव नहीं होती है। 2005 में नीतीश कुमार ने बिहार को यह सिखाया कि पहले जीने का अधिकार चाहिए, फिर सपने देखने का हौसला। “न्याय यात्रा” ने बिहार को खड़ा होना सिखाया और “समृद्धि यात्रा” का उद्देश्य अब उसे उड़ान देना है।

2005 में सत्ता संभालते ही नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, बिहार को भय और अव्यवस्था के माहौल से बाहर निकालना। “न्याय यात्रा” के दौरान जो वादे किए गए थे, उनकी पहली कसौटी कानून-व्यवस्था थी। राज्य की छवि उस समय “क्राइम कैपिटल” जैसी बन चुकी थी। अपहरण उद्योग, संगठित अपराध, माफिया राज और जातीय हिंसा आम जीवन का हिस्सा बन चुका था। आम नागरिक की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता थी।

नीतीश कुमार ने शासन की पहली प्राथमिकता “लॉ एंड ऑर्डर” को बनाया। सत्ता संभालते ही अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू हुई। फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए, पुलिस व्यवस्था में सुधार हुआ, और राजनीतिक संरक्षण पाने वाले अपराधियों पर भी हाथ डाला गया। यह कदम आसान नहीं था, क्योंकि इससे सत्ता के भीतर और बाहर दोनों जगह विरोध पैदा हुआ। लेकिन यही वह निर्णायक क्षण था जिसने बिहार की दिशा बदल दी।

कुछ ही वर्षों में राज्य में अपहरण के मामलों में भारी गिरावट आई। सड़कों पर भय का वातावरण कम होने लगा। पहली बार लोगों ने महसूस किया कि पुलिस अब केवल कागज पर नहीं है, बल्कि जमीन पर भी काम कर रही है। यह परिवर्तन केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक मनोविज्ञान में बदलाव था, लोगों का आत्मविश्वास लौटने लगा।

कानून-व्यवस्था के इस सुदृढ़ीकरण ने विकास के लिए आवश्यक वातावरण तैयार किया। बिना सुरक्षा के न तो निवेश आता है और न ही शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी व्यवस्थाएँ फल-फूल सकती हैं। नीतीश कुमार की समझ यही थी कि न्याय केवल अदालतों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में सुरक्षा के रूप में दिखना चाहिए।

सुशासन का दूसरा स्तंभ था, प्रशासनिक अनुशासन। वर्षों से बिहार की नौकरशाही जड़ता और भ्रष्टाचार की गिरफ्त में थी। फाइलें महीनों नहीं, वर्षों तक अटकी रहती थीं। नीतीश कुमार ने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि काम नहीं तो कुर्सी नहीं। समयबद्ध निर्णय, योजनाओं की निगरानी और जिलों में सीधे हस्तक्षेप ने प्रशासन को सक्रिय बनाया।

मुख्यमंत्री स्वयं जिलों का दौरा कर योजनाओं की समीक्षा करने लगे। यह परंपरा आगे चलकर “समीक्षा यात्रा” जैसी पहलों में बदली। अधिकारियों के लिए यह नया अनुभव था कि मुख्यमंत्री सीधे गांव में खड़े होकर उनसे सवाल कर रहे हैं। इससे शासन में जवाबदेही की संस्कृति बनी।

कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधार के साथ-साथ सामाजिक न्याय की अवधारणा को भी नया रूप दिया गया। सामाजिक न्याय केवल आरक्षण या राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसे बुनियादी सुविधाओं से जोड़ा गया। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और बिजली। ये सभी सामाजिक न्याय के औजार बने।

नीतीश कुमार की सरकार ने विशेष रूप से महिलाओं और वंचित वर्गों पर ध्यान केंद्रित किया। लड़कियों के लिए साइकिल योजना, पोशाक योजना, छात्रवृत्तियाँ, इन पहलों ने न केवल स्कूलों में नामांकन बढ़ाया, बल्कि सामाजिक सोच को भी बदला। ग्रामीण इलाकों में पहली बार लड़कियों को स्वतंत्र रूप से स्कूल जाते देखा गया। यह एक मूक क्रांति थी।

पंचायती राज में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर नीतीश कुमार ने सत्ता के विकेंद्रीकरण को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा। लाखों महिलाएँ पहली बार निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनीं। इससे गांवों में सत्ता की भाषा बदली। घरेलू दायरे से बाहर निकलकर महिलाएँ सार्वजनिक जीवन में आईं।

दलित और महादलित समुदायों के लिए विशेष योजनाएँ शुरू की गईं। महादलित आयोग, आवास योजनाएँ, शिक्षा में विशेष सहायता। इन सभी का उद्देश्य यह था कि सामाजिक न्याय केवल भाषणों में नहीं, बल्कि जीवन की परिस्थितियों में दिखे।

सुशासन के इन बीस वर्षों में बिहार ने यह अनुभव किया है कि शासन का अर्थ केवल सत्ता चलाना नहीं है, बल्कि समाज को दिशा देना है। कानून-व्यवस्था से लेकर शिक्षा और महिला सशक्तिकरण तक, हर क्षेत्र में एक साझा सूत्र दिखाई देता है। राज्य अब केवल शासक नहीं, बल्कि सहभागी बनना चाहता है।

आलोचक यह कहते रहे हैं कि बिहार अब भी विकास की दौड़ में पीछे है। यह आंशिक रूप से सच भी है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बिहार की शुरुआती स्थिति इतनी कमजोर थी कि उसे संभालना ही एक बड़ी उपलब्धि थी। जिस राज्य में लोग शाम ढलते ही घरों में कैद हो जाते थे, वहाँ आज रात की सड़कों पर जीवन दिखाई देता है। यह परिवर्तन केवल भौतिक नहीं है, बल्कि मानसिक है।

सुशासन का सबसे बड़ा परिणाम यही रहा कि बिहार का आत्मविश्वास लौटना। लोग अब राज्य को छोड़ने को मजबूरी नहीं, बल्कि विकल्प मानने लगे हैं। प्रशासन से संवाद संभव हुआ है। शिकायत दर्ज कराना अब जोखिम नहीं है, बल्कि अधिकार बन रहा है। इन बीस वर्षों ने बिहार को खड़ा किया है। अब प्रश्न यह है कि क्या यह खड़ा हुआ बिहार दौड़ सकता है? यही प्रश्न “समृद्धि यात्रा” का मूल है।
              -------------

0 Response to "सुशासन के 20 वर्ष - “न्याय से समृद्धि तक”"

एक टिप्पणी भेजें

Ads on article

Advertise in articles 1

advertising articles 2

Advertise under the article