बिहार की बदलती राजनीतिक - “कहीं उत्तराधिकार का दांव, कहीं मजबूरी की राजनीति, तो कहीं अवसर की तलाश”

बिहार की बदलती राजनीतिक - “कहीं उत्तराधिकार का दांव, कहीं मजबूरी की राजनीति, तो कहीं अवसर की तलाश”

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 17 अक्टूबर ::

सियासत भी अजब चीज है। कहते हैं कि सियासत की जननी स्वार्थ है। यह स्वार्थ कभी सत्ता का होता है, कभी संगठन का, कभी परिवार का और कभी व्यक्तिगत अस्तित्व का। राजनीति में आदर्श, सिद्धांत और विचारधारा की बातें मंचों से खूब होती हैं, लेकिन जब सत्ता की बिसात पर मोहरे सजते हैं तो सबसे पहले वही देखा जाता है कि किस चाल से अपनी गोटी सुरक्षित रखी जा सकती है। सियासत चाहे घर के आंगन में हो या संयुक्त राष्ट्र के मंच पर, उसका चरित्र बहुत कुछ एक जैसा ही दिखाई देता है। सियासी किश्ती में बैठा हर व्यक्ति पहले अपनी नाव को किनारे लगाने की चिंता करता है। दूसरे की नाव डूबे या तैरे, यह चिंता बाद में आती है। बिहार की वर्तमान राजनीति भी कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश कर रही है। एक ओर लंबे समय तक राजनीतिक मौन साधे रहने वाले लालू प्रसाद यादव हैं, जिनकी राजनीति अब फिर किसी बड़े दांव की ओर बढ़ती हुई दिखाई देती है। दूसरी ओर नीतीश कुमार हैं, जिनके लंबे राजनीतिक जीवन में पहली बार ऐसी परिस्थितियां दिखाई दे रही हैं, जहां कभी जिनके सामने दूसरे नेता बोलने से पहले सौ बार सोचते थे, आज उन्हीं के सामने परिस्थितियां और राजनीतिक समीकरण उनकी आवाज पर अंकुश लगाते हुए प्रतीत होते हैं। और इन दोनों के बीच कांग्रेस, जनसुराज, भाजपा और वाम दल अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन तलाशते नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर बिहार की सियासी तस्वीर ऐसी है जैसे हर खिलाड़ी अपने-अपने स्वार्थ के चूल्हे पर अपनी-अपनी रोटी सेंकने में व्यस्त हो और जनता चूल्हे से उठते धुएं के बीच अपनी जिन्दगी तलाश रही हो।

राजनीति में दोस्ती स्थायी नहीं होती और दुश्मनी भी स्थायी नहीं होती। स्थायी होता है तो केवल हित। आज जो साथी है, वह कल प्रतिद्वंद्वी हो सकता है। आज जिसके खिलाफ भाषण दिया जा रहा है, कल उसी के साथ मंच साझा किया जा सकता है। यही राजनीति की विडंबना भी है और उसकी ताकत भी। बिहार ने इस राजनीतिक चरित्र को बार-बार देखा है। कभी समाजवाद के नाम पर गठजोड़ हुआ, कभी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, कभी विकास के नाम पर और कभी भाजपा विरोध के नाम पर। लेकिन हर बार सत्ता की कुर्सी के आसपास घूमता रहा एक ही प्रश्न किसके हाथ में कितनी ताकत रहेगी? यही प्रश्न आज भी बिहार की राजनीति के केंद्र में है।

लालू प्रसाद बिहार की राजनीति के उन चेहरों में हैं जिन्होंने दशकों तक प्रदेश की राजनीति को अपने अंदाज में प्रभावित किया है। उनकी राजनीति केवल चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने सामाजिक समीकरणों को राजनीतिक हथियार बनाया और लंबे समय तक बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे। लेकिन राजनीति में सबसे कठिन समय वह होता है जब नेता स्वयं सत्ता में नहीं होता है और उसे यह तय करना होता है कि आने वाले समय में उसकी राजनीतिक विरासत किसके हाथ में रहेगी। लालू प्रसाद के राजनीतिक परिवार के संदर्भ में यह प्रश्न हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। अब जब राजनीति में उत्तराधिकार की चर्चा तेज होती है तो स्वाभाविक रूप से परिवार, संपत्ति, संगठन और राजनीतिक विरासत, चारों प्रश्न एक साथ सामने आते हैं।

हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 का मूल उद्देश्य संपत्ति में पुत्रियों को समान अधिकार देना था। लेकिन राजनीति में जब परिवार, उत्तराधिकार और संपत्ति की चर्चाएं एक साथ जुड़ती हैं तो उसका राजनीतिक अर्थ भी निकाला जाने लगता है। लालू परिवार की राजनीति में यह सवाल केवल संपत्ति का नहीं है। यह राजनीतिक उत्तराधिकार का भी है। कौन उत्तराधिकारी होगा? किसके हाथ में पार्टी की कमान होगी? कौन परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे ले जाएगा? और कौन केवल परिवार का सदस्य बनकर रह जाएगा? यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आने वाले समय में बिहार की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। लालू यादव लंबे समय तक चुप रहे हो, लेकिन राजनीति में चुप्पी का अर्थ हमेशा निष्क्रियता नहीं होता है। कई बार सियासी चुप्पी सबसे बड़ी तैयारी होती है।

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का नाम लंबे समय तक स्थिरता, रणनीति और राजनीतिक संतुलन का पर्याय रहा है। उन्होंने कई बार ऐसे राजनीतिक फैसले लिए जिनसे यह साबित हुआ कि वे परिस्थिति के अनुसार, अपनी राजनीतिक दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं। एक समय था जब बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की अनुमति के बिना कई बड़े फैसले संभव नहीं माने जाते थे। लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा सत्य यही है कि समय किसी का स्थायी नहीं होता है। आज वही नीतीश कुमार ऐसे राजनीतिक दौर में दिखाई दे रहे हैं जहां उनके सामने परिस्थितियां पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल है। कभी वे गठबंधन की धुरी थे। आज गठबंधन की राजनीति में उन्हें अपने सहयोगियों के साथ संतुलन साधना पड़ रहा है। कभी दूसरे नेता उनके राजनीतिक निर्णयों के सामने अपनी रणनीति तय करते थे। आज कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि परिस्थितियां उनके निर्णयों की सीमाएं निर्धारित कर रही है। यही कारण है कि उनके राजनीतिक जीवन का अंतिम चरण अब केवल सत्ता में बने रहने का प्रश्न नहीं है, बल्कि राजनीतिक विरासत और प्रभाव बचाए रखने की चुनौती भी बन गया है।

विधान परिषद चुनावों को अक्सर विधानसभा चुनावों की तुलना में कम महत्व दिया जाता है। लेकिन राजनीति को समझने वालों के लिए विधान परिषद के चुनाव कई बार आने वाले राजनीतिक मौसम की दिशा बता देते हैं। पटना स्नातक सीट का चुनाव भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह केवल एक सीट का चुनाव नहीं है। इसके परिणाम और उसके आसपास बने राजनीतिक समीकरण यह संकेत देते हैं कि किस दल का प्रभाव किस वर्ग में कितना है और किस नेता की राजनीतिक पकड़ कितनी बची है। नीतीश कुमार के राजनीतिक प्रभाव को समझने के लिए ऐसे चुनावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। राजनीति में कभी-कभी छोटी सीट बड़े सवाल पूछती है और पटना स्नातक सीट ने भी कई बड़े प्रश्न सामने खड़े किए हैं।

बिहार की राजनीति के दो वरिष्ठ चेहरों को यदि राजनीतिक महाभारत के संदर्भ में देखा जाए तो लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों अपने-अपने समय के राजनीतिक भीष्म पितामह जैसे दिखाई देते हैं। यौवन और राजनीतिक उत्कर्ष के दिनों में दोनों की राजनीतिक छवि ऐसी थी कि उनके इर्द-गिर्द पूरी राजनीतिक बिसात घूमती थी। लेकिन समय की विडंबना देखिए। जो कभी ध्रुवतारा थे, वे आज अपने ही बनाए राजनीतिक आकाश में बदलते नक्षत्रों को देखते हुए दिखाई दे रहे हैं। महाभारत में भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर लेटे थे। राजनीति में भी एक समय आता है जब पुराने योद्धा सत्ता के रणक्षेत्र में सक्रिय होने के बावजूद नई पीढ़ी की चालों से घिर जाते हैं। राजनीतिक बाण बाहर से कम और भीतर से अधिक लगते हैं। अपनों की महत्वाकांक्षा, उत्तराधिकार की लड़ाई, संगठन की कमजोरी और बदलते सामाजिक समीकरण, ये सभी किसी भी बड़े नेता के लिए राजनीतिक बाण बन सकते हैं। आज बिहार की राजनीति में यही दृश्य दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस कभी बिहार की राजनीति की प्रमुख शक्ति हुआ करती थी। आज उसकी स्थिति ऐसी है कि वह स्वयं अपने राजनीतिक अस्तित्व को लेकर संघर्ष करती दिखाई देती है। विधान परिषद चुनावों ने भी पार्टी की कमजोरियों को उजागर किया है। राजनीति में केवल इतिहास के सहारे वर्तमान नहीं चलता है। पुराना जनाधार तभी राजनीतिक पूंजी बनता है जब संगठन उसे वोट में बदलने की क्षमता रखता हो। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है। नेतृत्व का संकट, संगठन की कमजोरी, कार्यकर्ताओं का उत्साह, क्षेत्रीय दलों पर निर्भरता और स्पष्ट राजनीतिक रणनीति का अभाव, इन सबका असर चुनावी परिणामों में दिखाई देता है। आज बिहार में कांग्रेस की स्थिति कई बार ऐसी प्रतीत होती है जैसे वह किसी दूसरे के बनाए मंच पर अपनी भूमिका तलाश रही हो और राजनीति में जो पार्टी अपनी भूमिका स्वयं तय नहीं करती, उसकी भूमिका दूसरे तय कर देते हैं।

राजद को बिहार की राजनीति का बड़ा स्तंभ माना जाता है। लेकिन बड़ा स्तंभ होने और पूरे भवन का मालिक होने में अंतर होता है। राजद के भीतर भी नेतृत्व, उत्तराधिकार और भविष्य की राजनीति को लेकर कई प्रश्न हैं। लालू प्रसाद की राजनीतिक विरासत बहुत बड़ी है। लेकिन किसी भी राजनीतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना आसान नहीं होता है। जनता भावनाओं से जुड़ सकती है, लेकिन चुनाव में वोट देने के समय वह नेतृत्व, संगठन, स्थानीय समीकरण और भविष्य की उम्मीद भी देखती है। इसलिए राजद के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी पुरानी सामाजिक-राजनीतिक पूंजी को नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के साथ कैसे जोड़ता है। राजनीति में कोई भी व्यक्ति या परिवार हमेशा के लिए अपरिहार्य नहीं होता है। समय का पहिया घूमता है और सत्ता की भाषा बदल जाती है।

प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जनसुराज ने बिहार की राजनीति में एक अलग तरह का प्रयोग शुरू किया है। यह प्रयोग परंपरागत दलों से अलग राजनीतिक भाषा और संगठन खड़ा करने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। जनसुराज के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए है कि बिहार में बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग विकल्प तलाशते रहे हैं। चुनौती इसलिए है कि आंदोलन खड़ा करना और चुनाव जीतना दो अलग-अलग चीजें हैं। सड़कों पर समर्थन और मतदान केंद्रों पर वोट, इन दोनों के बीच बहुत लंबी दूरी होती है। फिर भी राजनीति में कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं जब बिल्ली के भाग से सिकहर टूट पड़ता है। यदि बड़े राजनीतिक दल आपसी संघर्ष में अपनी जमीन कमजोर करते हैं तो तीसरे विकल्प को जगह मिल सकती है। जनसुराज के लिए यही सबसे बड़ा अवसर हो सकता है।

बिहार की राजनीति में भाजपा को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। आज वह भले ही कई मुद्दों पर अपेक्षाकृत शांत दिखाई दे, लेकिन राजनीति में शांति का अर्थ निष्क्रियता नहीं होता है। कई बार सबसे शांत राजनीतिक दल ही सबसे लंबी तैयारी कर रहा होता है। इसे सुप्त ज्वालामुखी की तरह समझा जा सकता है। ऊपर से सब कुछ शांत। अंदर से लगातार हलचल। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन और गठबंधन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना है। बिहार जैसे सामाजिक रूप से जटिल राज्य में केवल चुनावी नारों से राजनीति नहीं चलती है। यहां जातीय समीकरण, सामाजिक समूह, क्षेत्रीय आकांक्षाएं, शहरी मतदाता, युवा, महिलाएं और विभिन्न वर्गों की अपेक्षाएं, सभी को साथ लेकर चलना पड़ता है। भाजपा यदि अपने संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक आधार को लगातार मजबूत करती है तो आने वाले दिनों में उसकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन राजनीति में यह भी याद रखना चाहिए कि ज्वालामुखी कब फटेगा, यह अनुमान लगाना आसान नहीं होता है।

वाम दलों की स्थिति बिहार की राजनीति में लंबे समय से सीमित रही है। कभी बिहार में वाम राजनीति का अपना मजबूत आधार था। भूमि, मजदूर, किसान और सामाजिक न्याय के सवालों ने वाम दलों को एक विशिष्ट पहचान दी थी। लेकिन बदलते समय में उनका राजनीतिक प्रभाव सीमित हुआ है। आज वे कई बार मुख्य राजनीतिक लड़ाई में निर्णायक शक्ति से अधिक सहयोगी शक्ति की भूमिका में दिखाई देते हैं। इसीलिए उनकी स्थिति को बारात के सहबाला से तुलना करना राजनीतिक व्यंग्य की दृष्टि से भले ही कठोर लगे, लेकिन वर्तमान समीकरणों की एक तस्वीर जरूर प्रस्तुत करता है। हालांकि राजनीति में छोटे दलों को कभी कम नहीं आंकना चाहिए। कई बार एक-दो सीटों का छोटा दल सरकार बनाने या गिराने में बड़ी भूमिका निभा देता है।

बिहार की राजनीति में परिवारवाद कोई नया शब्द नहीं है। राजनीति में परिवार की भूमिका लगभग सभी बड़े दलों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती रही है। लेकिन जब राजनीति का केंद्र परिवार बन जाता है तो संगठन धीरे-धीरे परिवार की राजनीतिक संपत्ति में बदलने लगता है। यहीं से उत्तराधिकार का प्रश्न पैदा होता है। कौन अगला नेता? कौन अगला मुख्यमंत्री? कौन पार्टी का राष्ट्रीय चेहरा? कौन प्रदेश का चेहरा? और कौन केवल परिवार का सदस्य? इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति का स्वरूप निर्धारित करेंगे। आज बिहार की राजनीतिक धुरी कहीं न कहीं PP यानि परिवार पार्टी मोड में घूमती हुई दिखाई देती है। ऐसी स्थिति में सरकार को भी अपेक्षाकृत निर्विघ्न तरीके से अपने निर्णय लेने और अपनी कुर्सी मजबूत करने का अवसर मिल जाता है।

लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष सत्ता को जवाबदेह बनाता है। लेकिन जब विपक्ष खुद अपने भीतर लड़ने लगे तो सत्ता को सबसे बड़ा लाभ मिलता है। यदि विपक्ष के पास साझा मुद्दा नहीं हो, साझा नेतृत्व नहीं हो और साझा रणनीति नहीं हो तो सरकार पर राजनीतिक दबाव कम हो जाता है। यही कारण है कि बिहार की वर्तमान राजनीतिक स्थिति सत्ता के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल दिखाई देती है। एक तरफ राजद अपने भविष्य और नेतृत्व की राजनीति में उलझा है। दूसरी ओर कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। जनसुराज अपनी जगह बनाने में लगा है। वाम दल सीमित प्रभाव के साथ अपनी भूमिका निभा रहे हैं और भाजपा अपने समय और रणनीति का इंतजार करती दिखाई देती है। ऐसे में सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बाहर से कम और भीतर से अधिक होती है। लेकिन इस पूरी सियासी बाजी में जनता कहां है? यही सबसे बड़ा प्रश्न है। राजनीतिक दल अपनी गोटियां चल रहे हैं। नेता अपनी कुर्सियां बचा रहे हैं। परिवार अपनी राजनीतिक विरासत सुरक्षित कर रहे हैं। नए दल अवसर तलाश रहे हैं। पुराने दल अपना अस्तित्व बचा रहे हैं। लेकिन जनता? जनता के सामने आज भी वही पुराने सवाल है। किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य मिलेगा या नहीं? युवाओं को रोजगार मिलेगा या नहीं? बाढ़ से हर वर्ष तबाह होने वाले गांवों का स्थायी समाधान होगा या नहीं? सुखाड़ में खेतों तक पानी पहुंचेगा या नहीं? शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी या नहीं? स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर होगी या नहीं? सड़क, बिजली, सिंचाई और रोजगार की समस्याओं का समाधान होगा या नहीं? इन सवालों का उत्तर चुनावी मंचों के भाषणों से नहीं, जमीन पर काम से मिलेगा।

राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं है। सत्ता का अंतिम उद्देश्य जनता की सेवा होना चाहिए। लेकिन जब राजनीति का केंद्र सत्ता और सत्ता का केंद्र परिवार बन जाए तो जनता धीरे-धीरे राजनीतिक विमर्श के किनारे चली जाती है। आज बिहार के सामने सबसे बड़ा खतरा यही है। यदि सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी गोटियां सेंकने में व्यस्त रहेंगे तो जनता की थाली ठंडी हो सकती है। एक तरफ बाढ़ की मार है। दूसरी तरफ सूखे की आग है। कहीं किसान परेशान है। कहीं युवा रोजगार के लिए भटक रहा है। कहीं परिवार पलायन की मजबूरी से जूझ रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता केवल चुनाव के समय याद करने वाली भीड़ नहीं है। जनता ही लोकतंत्र की वास्तविक मालिक है।

लालू प्रसाद हो या नीतीश कुमार, भाजपा हो या कांग्रेस, राजद हो या जनसुराज, वाम दल हो या कोई अन्य राजनीतिक शक्ति, हर किसी के सामने एक ही कसौटी है। क्या वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से ऊपर बिहार को रख सकते हैं? यदि हां, तो राजनीति सार्थक है। यदि नहीं, तो यह केवल सत्ता का खेल बनकर रह जाएगी। सियासत की किश्ती में बैठे सभी यात्रियों को यह समझना होगा कि दूसरे की किश्ती डुबोकर अपनी किश्ती हमेशा सुरक्षित नहीं रखी जा सकती है। क्योंकि नदी एक ही है। लहरें एक ही हैं और तूफान आया तो सभी किश्तियां उसकी चपेट में आएंगी।

बिहार की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां पुराने योद्धा अपनी विरासत बचाने में लगे हैं, नए खिलाड़ी अपना मैदान तलाश रहे हैं और सत्ता अपने वर्तमान को मजबूत करने में व्यस्त है। लालू प्रसाद की राजनीति के सामने उत्तराधिकार का प्रश्न है। नीतीश कुमार के सामने राजनीतिक विरासत और प्रभाव का प्रश्न है। कांग्रेस के सामने अस्तित्व और संगठन का प्रश्न है। राजद के सामने अगली पीढ़ी का प्रश्न है। जनसुराज के सामने विकल्प बनने की चुनौती है। भाजपा के सामने संगठन और सामाजिक विस्तार का सवाल है। वाम दलों के सामने अपने सीमित प्रभाव को बनाए रखने की चुनौती है और इन सबके ऊपर सबसे बड़ा प्रश्न है बिहार की जनता का भविष्य क्या होगा? 

सियासत की बिसात पर राजा, वजीर, हाथी, घोड़े और प्यादे अपनी-अपनी चाल चलते रहेंगे। कोई किसी को मात देगा, कोई किसी से समझौता करेगा, कोई नई चाल चलेगा और कोई पुराने मोहरे को हटाकर नया मोहरा सामने लाएगा। लेकिन अंततः लोकतंत्र की असली ताकत राजनीतिक दलों के कार्यालयों में नहीं, जनता की उंगली पर लगी स्याही में होती है। इसलिए नेताओं को याद रखना होगा कि सियासत स्वार्थ से शुरू हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र की मंजिल जनहित ही होनी चाहिए। वरना सत्ता के चूल्हे पर सेंकी गई राजनीतिक रोटियां चाहे जितनी स्वादिष्ट क्यों न लगे, यदि जनता की थाली खाली रह गई तो इतिहास उन रोटियों का हिसाब जरूर मांगेगा और इतिहास का हिसाब किसी गठबंधन, किसी परिवार, किसी नेता या किसी राजनीतिक दल की सुविधा के अनुसार नहीं चलता है। वह केवल परिणाम देखता है कि किसने सत्ता पाई और उससे भी बड़ा सवाल, सत्ता पाकर जनता के लिए क्या किया।
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