सत्ता विरोध के चार स्तंभ - “असंतोष, अन्याय, आकांक्षा और आत्महित”
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 18 अक्टूबर ::
सृष्टि के आरंभ से ही मनुष्य और सत्ता के बीच एक स्वाभाविक तनाव रहा है। जहां सत्ता है, वहां उसके निर्णयों से असहमति भी होगी और जहां असहमति होगी, वहां विरोध की संभावना भी बनी रहेगी। असंतोष, अन्याय, आकांक्षा और आत्महित, ये चार ऐसे स्तंभ हैं, जिन पर सत्ता के खिलाफ विरोध, आंदोलन और कभी-कभी बगावत की पूरी इमारत खड़ी होती रही है। मानव इतिहास में विरोध कोई नई घटना नहीं है। इतिहासकार 1152 ईसा पूर्व प्राचीन मिस्र में फिरौन रामसेस तृतीय के शासनकाल के दौरान श्रमिकों द्वारा किए गए विरोध को संगठित श्रम-विरोध के शुरुआती दर्ज उदाहरणों में गिनते हैं। उस समय मजदूरों की शिकायत मूलभूत जरूरतों और पारिश्रमिक से जुड़ी थी। उन्होंने काम रोककर अपनी मांग सरकार तक पहुंचाई। वहां से शुरू हुआ विरोध का कारवां आज हजारों वर्षों बाद भी थमा नहीं है। केवल उसके स्वरूप बदल गए हैं। कभी मजदूर सड़कों पर उतरते हैं, कभी किसान, कभी छात्र, कभी कर्मचारी, कभी राजनीतिक दल और कभी पूरा समाज किसी मुद्दे को लेकर सत्ता के सामने खड़ा हो जाता है।
आज भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भारत, फ्रांस, स्पेन, पाकिस्तान, फिलिस्तीन, इजरायल, चिली, लीबिया, ब्रिटेन, अमेरिका, नाइजीरिया, कोसोवो, स्वीडन, पुर्तगाल और अर्जेंटीना जैसे देशों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर विरोध और आंदोलन देखने को मिलते हैं। हर देश की परिस्थिति अलग है, हर आंदोलन की वजह अलग है, लेकिन इन सबके बीच एक चिंता समान दिखाई देती है कि संवाद की जगह टकराव बढ़ता जा रहा है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है अपनी बात कहने की स्वतंत्रता, असहमति व्यक्त करने का अधिकार, सत्ता से सवाल पूछने की क्षमता और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने का अवसर। यदि किसी लोकतंत्र में नागरिक सरकार की नीतियों पर सवाल नहीं उठा सकते, निर्णयों का विरोध नहीं कर सकते और अपनी शिकायत सार्वजनिक रूप से नहीं रख सकते, तो उस व्यवस्था को लोकतांत्रिक कहने में कठिनाई होगी। इसलिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। सरकार को यह समझना चाहिए कि हर प्रदर्शन सरकार गिराने की साजिश नहीं होता है। हर आलोचक देश-विरोधी नहीं होता है। हर असहमति व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह नहीं होती है। इसी तरह प्रदर्शनकारियों को भी यह समझना होगा कि सरकार से असहमति का अधिकार उन्हें कानून तोड़ने, सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करने, आम नागरिकों का रास्ता रोकने या हिंसा करने का अधिकार नहीं देता है। लोकतंत्र में अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं।
समस्या तब शुरू होती है, जब असहमति संवाद की शुरुआत करने के बजाय अहंकार का हथियार बन जाती है। प्रदर्शनकारी सोचता है कि “मेरी बात हर हाल में मानी जाए।” सरकार सोचती है कि “सड़क पर दबाव बनाकर कोई फैसला नहीं कराया जा सकता है।” दोनों अपने-अपने स्थान पर अड़ जाते हैं। धीरे-धीरे बातचीत का रास्ता बंद होता है और टकराव का रास्ता खुल जाता है। यहीं से लोकतांत्रिक असहमति राजनीतिक संघर्ष में बदलने लगती है। फिर प्रदर्शन का उद्देश्य समाधान खोजने से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन बन जाता है। सरकार अपनी शक्ति दिखाती है और आंदोलनकारी अपनी संख्या। सरकार प्रशासनिक ताकत दिखाती है और प्रदर्शनकारी सड़क की ताकत। सरकार कहती है कि कानून सर्वोपरि है और प्रदर्शनकारी कहते हैं कि जनता की आवाज सर्वोपरि है। दोनों बातें अपने-अपने स्थान पर सही हो सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र का प्रश्न यह है कि इन दोनों के बीच पुल कौन बनाएगा?
किसी आंदोलन का लंबे समय तक चलना अपने आप में उसकी सफलता का प्रमाण नहीं है। कई बार आंदोलन इसलिए लंबा चलता है क्योंकि दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं होते। समय बीतता रहता है, समाज प्रभावित होता रहता है, अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है और अंत में जिस मुद्दे से आंदोलन शुरू हुआ था, वह भी कहीं पीछे छूट जाता है। लंबा आंदोलन सरकार को झुका सकता है, लेकिन क्या वह समस्या का स्थायी समाधान भी देता है? यह सबसे बड़ा प्रश्न है। किसी सरकार को मजबूरी में फैसला बदलने के लिए विवश कर देना और किसी समस्या का संस्थागत समाधान निकालना, दोनों अलग बातें हैं। मजबूरी में लिया गया निर्णय भविष्य में फिर विवाद पैदा कर सकता है। लेकिन संवाद के माध्यम से तैयार किया गया समाधान लंबे समय तक टिक सकता है। इसलिए लोकतंत्र का उद्देश्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीता और कौन झुका। असल उद्देश्य होना चाहिए कि समस्या का समाधान हुआ या नहीं?
शांतिपूर्ण आंदोलन में नैतिक शक्ति होती है। जब नागरिक अनुशासन के साथ अपनी मांग रखते हैं, सरकार पर भी उन्हें सुनने का नैतिक दबाव बनता है। लेकिन जब आंदोलन हिंसा में बदलता है, तो मूल मुद्दा पीछे चला जाता है। फिर चर्चा होने लगती है कि कितनी बसें जली? कितने वाहन टूटे? कितने पुलिसकर्मी घायल हुए? कितनी दुकानें बंद हुई? कितनी संपत्ति नष्ट हुई? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि जिस मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था, उसका क्या हुआ? हिंसा अक्सर आंदोलन की वैध मांग को कमजोर कर देती है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता की सहानुभूति पाने के लिए केवल आक्रोश पर्याप्त नहीं होता है, संयम भी चाहिए। आक्रोश आवाज देता है, लेकिन संयम उस आवाज को विश्वसनीय बनाता है।
दूसरी तरफ सरकारों को भी यह समझना होगा कि हर प्रदर्शन को कानून-व्यवस्था की समस्या मान लेना समाधान नहीं है। सड़क पर उतरना अक्सर उस असंतोष का अंतिम सार्वजनिक रूप होता है, जो पहले किसी कार्यालय, विभाग, जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक व्यवस्था या राजनीतिक मंच पर व्यक्त हो चुका होता है। यदि लोग बार-बार अपनी शिकायत लेकर सामने आ रहे हैं तो सरकार को यह पूछना चाहिए कि समस्या की जड़ कहां है। क्या संवाद के दरवाजे बंद हैं? क्या प्रशासन नागरिकों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं ले रहा? क्या निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है? क्या जनता को लगता है कि उसकी बात सुनी नहीं जा रही? लोकतंत्र में सरकार की शक्ति केवल बहुमत से नहीं आती है। सरकार की वास्तविक ताकत जनता के विश्वास से आती है। इसलिए सत्ता के लिए आलोचना सुनना कमजोरी नहीं, परिपक्वता है।
जिस तरह सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए, उसी तरह प्रदर्शनकारियों को भी अपने तरीके पर विचार करना चाहिए। यदि आपकी मांग न्यायपूर्ण है तो उसे हिंसा की जरूरत क्यों है? यदि जनता आपके साथ है तो सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की आवश्यकता क्यों है? यदि आपका मुद्दा मजबूत है तो विरोधी की आवाज दबाने की जरूरत क्यों है? यदि आप लोकतंत्र बचाने निकले हैं तो लोकतांत्रिक मर्यादा क्यों टूटे? इन प्रश्नों का उत्तर आंदोलन को अधिक नैतिक और प्रभावी बना सकता है। लोकतंत्र में आंदोलन का मूल्य केवल भीड़ की संख्या से नहीं तय होता है। कई बार छोटी संख्या में लोग भी शांतिपूर्ण और तार्किक तरीके से ऐसा प्रभाव पैदा कर देते हैं, जो हजारों लोगों की उग्र भीड़ नहीं कर पाती।
विरोध कब राजनीतिक हथियार बन जाता है? यहीं से एक दूसरा और गंभीर प्रश्न सामने आता है। क्या हर विरोध वास्तव में उस मुद्दे के लिए होता है, जिसके नाम पर वह किया जा रहा है? राजनीति में यह सवाल हमेशा प्रासंगिक रहा है। किसी मुद्दे की वास्तविक पीड़ा और राजनीतिक अवसरवाद के बीच अंतर करना आसान नहीं होता। जनता की वास्तविक समस्या को राजनीतिक दल अपने हित में इस्तेमाल कर सकते हैं। कोई आंदोलन किसी वास्तविक शिकायत से शुरू हो सकता है, लेकिन बाद में उसके भीतर राजनीतिक हित प्रवेश कर सकते हैं। तब मुद्दा बदल जाता है। जो आंदोलन पहले किसी नीति के विरोध में था, वह धीरे-धीरे सरकार विरोधी अभियान बन जाता है। जो अभियान किसी निर्णय के खिलाफ था, वह सत्ता परिवर्तन का राजनीतिक मंच बन सकता है। यह लोकतंत्र में असंभव नहीं है। राजनीतिक दलों का काम ही राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करना है। लेकिन समस्या तब होती है, जब जनता की genuine समस्या केवल सत्ता संघर्ष का माध्यम बन जाए।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां विरोध की परंपरा बहुत पुरानी है। स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं अन्याय के विरुद्ध जन-असहमति और जन-संघर्ष का विराट उदाहरण रहा है। लेकिन उस संघर्ष में भी सत्याग्रह, अहिंसा, त्याग और नैतिक दबाव जैसे तत्व महत्वपूर्ण थे। आज परिस्थितियां बदल गई हैं। सोशल मीडिया ने विरोध को तत्काल बना दिया है। एक घटना कुछ मिनटों में देशभर में चर्चा का विषय बन सकती है। कोई बयान वायरल हो सकता है, कोई वीडियो आंदोलन का चेहरा बन सकता है और कोई नारा हजारों लोगों को जोड़ सकता है। लेकिन यही तकनीक अफवाह, आधी जानकारी और राजनीतिक उकसावे को भी उतनी ही तेजी से फैलाती है। अब आंदोलन केवल सड़क पर नहीं होता है। वह मोबाइल स्क्रीन पर भी होता है। हैशटैग भीड़ बनाते हैं, वीडियो भावनाएं पैदा करते हैं और डिजिटल प्रचार राजनीतिक वातावरण बदल देता है। इसलिए आज के लोकतंत्र में विरोध का चरित्र पहले से कहीं अधिक जटिल हो गया है।
भारत में विरोध की राजनीति को लेकर सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि क्या हर सड़क आंदोलन वास्तव में जनहित की लड़ाई है या कभी-कभी चुनावी असफलता के बाद सत्ता तक पहुंचने का दूसरा रास्ता भी बन जाता है? लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने का सबसे वैध रास्ता चुनाव है। यदि किसी राजनीतिक दल को लगता है कि जनता सरकार से असंतुष्ट है, तो उसे जनता के बीच जाना चाहिए। यदि नीति गलत है, तो उसका विकल्प प्रस्तुत करना चाहिए। यदि सरकार विफल है, तो आंकड़ों और तथ्यों के साथ उसे जनता के सामने बेनकाब करना चाहिए। यदि जनता सहमत होगी तो वोट के माध्यम से सत्ता बदलेगी। लेकिन जब चुनावी मैदान में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती और उसके बाद सड़क को सत्ता परिवर्तन का मुख्य माध्यम बनाने की कोशिश होती है, तब लोकतंत्र की मूल भावना पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि हर विरोध को केवल चुनावी राजनीति का विस्तार मान लेना भी उचित नहीं होगा। जनता की वास्तविक शिकायतें होती हैं और उन्हें सम्मानपूर्वक सुनना लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व है। लेकिन राजनीतिक विरोध और जनहित के आंदोलन के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
लोकतंत्र में न सत्ता सर्वोच्च है, न सड़क। सर्वोच्च है तो संविधान। सरकार संविधान के भीतर रहकर शासन करती है और नागरिक संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के भीतर रहकर विरोध करते हैं। यही संतुलन लोकतंत्र को बचाता है। यदि सरकार कहे कि बहुमत मिल गया, इसलिए अब कोई सवाल नहीं पूछ सकता तो यह लोकतांत्रिक अहंकार है। यदि आंदोलनकारी कहे कि हम सड़क पर हैं, इसलिए सरकार को हमारी हर मांग माननी ही होगी तो यह भी लोकतांत्रिक अहंकार है। बहुमत शासन का अधिकार देता है, मनमानी का नहीं और विरोध का अधिकार आवाज देता है, अराजकता का नहीं।
टकराव में तत्काल जीत संभव है, लेकिन स्थायी समाधान मुश्किल होता है। सरकार आंदोलन दबा सकती है। प्रदर्शनकारी सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर कर सकते हैं। राजनीतिक दल एक-दूसरे को कमजोर कर सकते हैं। लेकिन समस्या वहीं रह सकती है। यही कारण है कि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में बातचीत सबसे महत्वपूर्ण हथियार है। बातचीत में समय लगता है। बातचीत में दोनों पक्षों को कुछ सुनना पड़ता है। बातचीत में कभी अपनी मांग का कुछ हिस्सा छोड़ना पड़ता है। बातचीत में अहंकार को पीछे रखना पड़ता है। लेकिन यही लोकतंत्र की सुंदरता है। संवाद में कोई पूरी तरह हारता नहीं और कोई पूरी तरह जीतता नहीं है, समाधान जीतता है। लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता है। उसके पीछे लोकतांत्रिक संस्कार भी जरूरी है। सरकार में सुनने का संस्कार। विपक्ष में स्वीकार करने का संस्कार। प्रदर्शनकारियों में संयम का संस्कार। मीडिया में तथ्य का संस्कार और जनता में विवेक का संस्कार। इनमें से कोई एक भी कमजोर हुआ तो लोकतांत्रिक संवाद धीरे-धीरे शोर में बदलने लगता है।
दुनिया में विरोध हमेशा रहेगा। यह जरूरी भी है। क्योंकि समाज स्थिर नहीं है। आकांक्षाएं बदलती है, आर्थिक परिस्थितियां बदलती है, तकनीक बदलती है, पीढ़ियां बदलती है और उनके सवाल भी बदलते हैं। इसलिए लोकतंत्र में विरोध को समाप्त करने की कोशिश गलत होगी। जरूरत विरोध को समाप्त करने की नहीं, बल्कि विरोध को संवाद में बदलने की है। सरकारें अगर हर विरोध को दुश्मनी मानेगी तो दूरी बढ़ेगी। विपक्ष अगर हर सरकारी निर्णय को देश-विरोधी या लोकतंत्र-विरोधी बताने लगेगा तो राजनीतिक विमर्श कमजोर होगा। प्रदर्शनकारी यदि हर मांग को अंतिम सत्य मानेंगे तो समझौते की गुंजाइश खत्म होगी। मीडिया यदि हर प्रदर्शन को सनसनी में बदल देगा तो समाज में तनाव बढ़ेगा और जनता यदि हर वायरल संदेश को सत्य मान लेगी तो लोकतंत्र भावनाओं का शिकार बन सकता है।
लोकतंत्र की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी बड़ी भीड़ सड़क पर उतरी। न ही केवल इस आधार पर कि सरकार ने कितनी कठोर कार्रवाई की। लोकतंत्र की असली परीक्षा यह है कि विवाद अंततः कहां पहुंचा। क्या सरकार ने बात सुनी? क्या आंदोलनकारियों ने शांतिपूर्ण मर्यादा बनाए रखी? क्या विपक्ष ने वैकल्पिक रास्ता प्रस्तुत किया? क्या मीडिया ने तथ्यपरक भूमिका निभाई? क्या न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं ने अपना काम किया? और सबसे अंत में क्या समाधान निकला? यदि इन सवालों का उत्तर हां है, तो लोकतंत्र मजबूत है।
सत्ता को चुनौती देना लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन सत्ता को बदलने का अंतिम फैसला जनता करती है। सरकारों को याद रखना चाहिए कि सत्ता स्थायी नहीं है। विपक्ष को याद रखना चाहिए कि हर असहमति जनता की सहमति नहीं होती है। प्रदर्शनकारियों को याद रखना चाहिए कि सड़क जनता की भी है। मीडिया को याद रखना चाहिए कि उत्तेजना से ज्यादा महत्वपूर्ण तथ्य है और जनता को याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में भावनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण विवेक है। विरोध की आवाज लोकतंत्र को जीवित रखती है, लेकिन लगातार टकराव लोकतंत्र को थका देता है।
हजारों वर्ष पहले मिस्र के मजदूरों ने अपनी आवाज उठाई थी। उस समय न आधुनिक लोकतंत्र था, न सोशल मीडिया, न टीवी चैनल और न संसद जैसी आधुनिक संस्थाएं। फिर भी मनुष्य ने अपनी पीड़ा सत्ता तक पहुंचाने का रास्ता खोज लिया। आज हमारे पास विरोध के कहीं अधिक लोकतांत्रिक और संस्थागत माध्यम हैं। फिर भी यदि हम संवाद के बजाय टकराव चुनते हैं, तो यह आधुनिक लोकतंत्र की विडंबना होगी। असंतोष को आवाज चाहिए, लेकिन आवाज को विवेक चाहिए। अन्याय के खिलाफ संघर्ष चाहिए, लेकिन संघर्ष को मर्यादा चाहिए। आकांक्षाओं को सम्मान चाहिए, लेकिन आकांक्षा को संवैधानिक रास्ता चाहिए और आत्महित को भी यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र केवल ‘मैं’ से नहीं, ‘हम’ से चलता है। इसलिए दुनिया के किसी भी देश में होने वाले आंदोलन को केवल भीड़ और पुलिस के संघर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उसके पीछे की पीड़ा को समझना चाहिए, लेकिन उसके नाम पर होने वाली हिंसा को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
भारत में भी विरोध लोकतंत्र का अधिकार है और रहेगा। सरकार की आलोचना भी लोकतंत्र का अधिकार है और रहेगी। लेकिन लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि विरोध संवाद का दरवाजा खोले, टकराव का नहीं। क्योंकि किसी सरकार को मजबूर करके झुकाया जा सकता है, किसी आंदोलन को दबाया जा सकता है, किसी पक्ष को तत्काल विजेता घोषित किया जा सकता है, लेकिन यदि मूल समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो संघर्ष की अगली जमीन तैयार हो जाती है। यही कारण है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी जीत किसी सरकार की, किसी विपक्ष की या किसी आंदोलन की नहीं होती है। सबसे बड़ी जीत उस समाधान की होती है, जो संविधान के भीतर मिले, समाज को जोड़े और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक और बड़ा संघर्ष पैदा न करे। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विरोध को खत्म करने की नहीं, विरोध की भाषा बदलने की कोशिश करें। नारा रहे, लेकिन संवाद के साथ। आक्रोश रहे, लेकिन अनुशासन के साथ। असहमति रहे, लेकिन सम्मान के साथ। सरकार मजबूत रहे, लेकिन संवेदनशीलता के साथ। विपक्ष मजबूत रहे, लेकिन जिम्मेदारी के साथ और जनता जागरूक रहे, लेकिन विवेक के साथ। तभी लोकतंत्र केवल चुनाव की व्यवस्था नहीं रहेगा, बल्कि असहमति से सहमति और संघर्ष से समाधान तक पहुंचने वाली जीवंत व्यवस्था बना रहेगा। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है जहां सत्ता से सवाल पूछा जा सकता है, लेकिन सवाल का जवाब अंततः सड़क के टकराव से नहीं, संविधान की चौखट पर संवाद से खोजा जाता है।
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