सरकार की हनक का इम्तिहान होता है - जब कमजोर की गरिमा खतरे में होता है

सरकार की हनक का इम्तिहान होता है - जब कमजोर की गरिमा खतरे में होता है

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 23 सितम्बर ::

इंसानियत का पहला धर्म कमजोर की रक्षा करना है उसकी बेइज्जती करना नहीं। किसी समाज की सभ्यता का वास्तविक परिचय उसकी ऊंची इमारतों, चमकती सड़कों या आर्थिक विकास के आंकड़ों से नहीं मिलता है, बल्कि इस बात से मिलता है कि वहां कमजोर, महिला, बच्चा, बुजुर्ग और असहाय व्यक्ति कितना सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता है। जिस समाज में किसी कमजोर की असहायता को उसकी कमजोरी समझकर उसके सम्मान पर हमला किया जाता है, वहां विकास के तमाम दावे अधूरे रह जाते हैं। सरकार का प्रथम कर्तव्य भी यही है कि वह हर परिस्थिति में नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करे और अपराध की प्रवृत्ति पर प्रभावी लगाम लगाए। यह अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है कि सरकार समाज के प्रत्येक व्यक्ति के मन से बुराई या अपराध की सोच को पूरी तरह मिटा देगी। मनुष्य के भीतर की प्रवृत्तियां अनेक सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों से बनती है। लेकिन शासन की व्यवस्था इतनी प्रभावी अवश्य होनी चाहिए कि अपराध करने से पहले व्यक्ति को कानून का भय हो, पीड़ित को न्याय का भरोसा हो और समाज को यह विश्वास हो कि अपराधी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून उसके ऊपर है।

अपराध होने के बाद कार्रवाई करना शासन की जिम्मेदारी का एक हिस्सा है, लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी अपराध की परिस्थितियों को हतोत्साहित करना है। कानून का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है जब अपराधी के मन में यह स्पष्ट हो कि अपराध करने के बाद बच निकलना आसान नहीं होगा। सरकार किसी व्यक्ति के मन में पैदा होने वाली हर आपराधिक कल्पना पर पहरा नहीं बैठा सकती है। लेकिन कानून का ऐसा वातावरण जरूर बनाया जा सकता है जिसमें आपराधिक सोच कार्रवाई का रूप लेने से पहले ही कमजोर पड़ जाए। यही सरकार की हनक का वास्तविक अर्थ है। हनक का मतलब भय का शासन नहीं है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि पुलिस की शक्ति का मनमाना इस्तेमाल हो। लोकतांत्रिक शासन में हनक का अर्थ है- कानून की निश्चितता, त्वरित कार्रवाई, निष्पक्ष जांच, प्रभावी अभियोजन और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुरूप कठोर दंड। जब अपराधी को कानून का डर होता है तो समाज सुरक्षित महसूस करता है। जब पीड़ित को न्याय का भरोसा होता है तो समाज में विश्वास पैदा होता है। और जब अपराधी राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक प्रभाव के कारण बच निकलता है तो केवल एक मामला नहीं बिगड़ता है, बल्कि कानून के प्रति नागरिकों का विश्वास भी कमजोर होता है।

सभ्य समाज का सबसे क्रूर और विभत्स स्वरूप तब सामने आता है जब महिलाओं और बच्चों की गरिमा पर हमला होता है। महिला या बच्चे के खिलाफ अपराध केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ किया गया अपराध नहीं है। यह उस सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है, जो अपने सबसे संवेदनशील वर्गों की रक्षा करने का दावा करती है। विशेष रूप से सार्वजनिक स्थानों पर किसी महिला या बच्चे को अपमानित करना, उसके साथ हिंसा करना या उसकी असहाय स्थिति का वीडियो बनाकर उसे सार्वजनिक करना केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। यह मानवीय संवेदना की परीक्षा भी है। यहां समाज को भी अपने भीतर झांकने की आवश्यकता है। आखिर किसी व्यक्ति में इतना दुस्साहस कहां से आता है कि वह किसी महिला या बच्चे की गरिमा को रौंदने का प्रयास करे? क्या उसे लगता है कि आसपास खड़े लोग केवल तमाशा देखेंगे? क्या उसे विश्वास होता है कि वीडियो बनने के बाद भी मामला दब जाएगा? क्या उसे यह भरोसा रहता है कि कुछ दिनों बाद सब भूल जाएंगे? इन सवालों के उत्तर केवल पुलिस की कार्रवाई में नहीं है, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना में भी छिपे हैं।

जमुई की घटना इसी व्यापक चिंता की एक बानगी के रूप में सामने आई है। घटना का वीडियो सामने आने के बाद जिस तरह मामला सार्वजनिक चर्चा में आया, उसने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है कि यदि वीडियो वायरल नहीं होता तो क्या होता? यह सवाल किसी एक सरकार या किसी एक अधिकारी को कठघरे में खड़ा करने से अधिक महत्वपूर्ण है। यह हमारी पूरी व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए। कितनी ऐसी घटनाएं हैं जिनका कोई वीडियो नहीं बनता? कितनी घटनाओं के पीड़ित सामाजिक दबाव में चुप रह जाते हैं? कितने मामलों में परिवार बदनामी के डर से शिकायत करने से पीछे हट जाता है? और कितने अपराध ऐसे होते हैं, जिनकी जानकारी पुलिस या प्रशासन तक पहुंचने से पहले ही वे किसी अंधेरी गुफा में दफन हो जाते हैं? यही वह बिंदु है जहां शासन व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा होती है। किसी घटना के वायरल होने के बाद सक्रिय होना आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। आदर्श स्थिति तो यह होगी कि पीड़ित को न्याय पाने के लिए घटना को सोशल मीडिया पर वायरल कराने की जरूरत ही न पड़े। उसे विश्वास हो कि थाने का दरवाजा उसके लिए खुला है, प्रशासन उसकी बात सुनेगा और कानून उसके साथ खड़ा होगा।

आज मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने एक बड़ा बदलाव किया है। पहले जिन घटनाओं की जानकारी सीमित लोगों तक रहती थी, अब वे कुछ ही मिनटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। इससे प्रशासन पर जवाबदेही का दबाव बढ़ा है और कई मामलों में पीड़ितों की आवाज भी सामने आई है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि वायरल वीडियो न्याय व्यवस्था का विकल्प नहीं है। वीडियो किसी घटना को सामने ला सकता है, लेकिन दोष तय करने का काम जांच और न्यायिक प्रक्रिया का है। वीडियो के आधार पर समाज में आक्रोश पैदा हो सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय कानून और अदालत की प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए। इसी तरह किसी पीड़ित की गरिमा की रक्षा के नाम पर उसका वीडियो बार-बार प्रसारित करना भी संवेदनशीलता के विपरीत हो सकता है। महिला और बच्चे की पहचान तथा निजता की रक्षा करना समाज, मीडिया और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की भी जिम्मेदारी है। हमें अपराध के खिलाफ आवाज उठानी है, लेकिन पीड़ित को दोबारा सार्वजनिक अपमान का सामना नहीं कराना है।

राजनीति में नेताओं के बयान केवल शब्द नहीं होते हैं। जब कोई सरकार नागरिकों की सुरक्षा को लेकर बड़े और स्पष्ट दावे करती है तो जनता स्वाभाविक रूप से उन दावों को जमीन पर देखना चाहती है। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ओर से कानून-व्यवस्था को लेकर पूर्व में दिए गए उस कड़े बयान का भी अब इसी संदर्भ में परीक्षण होना स्वाभाविक है, जिसमें उन्होंने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर बेहद आत्मविश्वासपूर्ण बात कही थी और यहां तक कहा था कि यदि रात में कोई नागरिक घूमने निकले और किसी ने उसे छू दिया तो वह इस्तीफा दे देंगे। राजनीतिक बयान का उद्देश्य यदि अपराधियों में कानून का भय पैदा करना था, तो यह एक मजबूत संदेश था। लेकिन ऐसे बयानों की असली परीक्षा किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस या मंच पर नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं के सामने होती है। जमुई की घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब सवाल केवल यह नहीं है कि अपराधी कौन हैं और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी। सवाल यह भी है कि सरकार अपने घोषित संकल्प को कितनी गंभीरता से जमीन पर लागू करती है। क्या जांच निष्पक्ष और प्रभावी होगी? क्या पीड़ित को सुरक्षा और सम्मान मिलेगा? क्या दोषियों तक कानून पहुंचेगा? क्या राजनीतिक या सामाजिक प्रभाव से ऊपर उठकर कार्रवाई होगी? क्या ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पुलिसिंग व्यवस्था में ठोस सुधार होंगे? इन सवालों के जवाब ही किसी सरकार की वास्तविक प्रतिबद्धता को स्पष्ट करेंगे।

राजनीतिक बयान में इस्तीफे की बात प्रभावशाली हो सकती है, लेकिन सुशासन की स्थायी कसौटी किसी एक घटना के बाद किसी व्यक्ति का इस्तीफा नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण है जिसमें अपराध होने की संभावना कम हो और अपराध होने पर न्याय सुनिश्चित हो। लोकतंत्र में जवाबदेही का अर्थ केवल राजनीतिक पद छोड़ देना नहीं है। जवाबदेही का अर्थ है घटना की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार लोगों पर कानूनी कार्रवाई, पीड़ित को सहायता, संबंधित प्रशासनिक तंत्र की समीक्षा और भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति रोकने के उपाय। यदि किसी मामले में पुलिस या प्रशासन की लापरवाही सामने आती है तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया तो उसके विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए और यदि अपराधी कानून तोड़ता है तो उसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत दंडित किया जाना चाहिए। यही संस्थागत जवाबदेही है और यही लोकतांत्रिक शासन की ताकत भी।

जनता को केवल यह सुनने की आवश्यकता नहीं है कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा। जनता यह देखना चाहती है कि अपराधियों को वास्तव में कानून के सामने खड़ा किया जा रहा है। राजनीतिक हवाबाजी कुछ समय के लिए तालियां जरूर बटोर सकती है, लेकिन कानून-व्यवस्था तालियों से नहीं चलती। उसके लिए पुलिसिंग, खुफिया तंत्र, त्वरित प्रतिक्रिया, संवेदनशील अधिकारी, सक्षम अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान आवश्यक है। सरकार यदि अपराधियों को संदेश देना चाहती है तो सबसे प्रभावी संदेश यही होगा कि कानून निश्चित रूप से लागू होगा। अपराधी के लिए यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए कि अपराध करने से पहले सौ बार सोचो, क्योंकि कानून से बचना आसान नहीं होगा और पीड़ित के लिए संदेश इससे भी स्पष्ट होना चाहिए कि डरो मत, व्यवस्था तुम्हारे साथ खड़ी है।

हर अपराध के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना आसान है, लेकिन समाज को अपनी भूमिका पर भी विचार करना होगा। जब किसी कमजोर व्यक्ति के साथ अन्याय होता है तो आसपास खड़े लोग क्या करते हैं? क्या वे हस्तक्षेप करते हैं? क्या वे पुलिस को सूचना देते हैं? क्या वे पीड़ित की मदद करते हैं? या मोबाइल निकालकर वीडियो बनाना ही उनकी पहली प्रतिक्रिया बन जाती है? आज तकनीक ने हमें गवाह बना दिया है, लेकिन इंसानियत हमें मददगार बनने की जिम्मेदारी देती है। यदि किसी महिला या बच्चे के साथ सार्वजनिक स्थान पर दुर्व्यवहार हो रहा है तो सभ्य समाज की पहली प्रतिक्रिया वीडियो बनाना नहीं, बल्कि सुरक्षित तरीके से सहायता करना और पुलिस को सूचना देना होनी चाहिए। बेशक, अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है। लेकिन कम-से-कम पुलिस, आपातकालीन सेवा या आसपास के जिम्मेदार लोगों को सूचना देना नागरिक कर्तव्य का हिस्सा है।

जमुई की घटना को केवल एक स्थानीय अपराध के रूप में देखकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी। ऐसी घटनाएं शासन व्यवस्था को अपनी कमियों को पहचानने का अवसर देती है। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए संवेदनशील पुलिसिंग, शिकायतों पर त्वरित प्रतिक्रिया, सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी, पीड़ित सहायता तंत्र और कानून के प्रति जागरूकता को मजबूत करना जरूरी है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सोशल मीडिया पर अपराध का वीडियो सामने आने के बाद कार्रवाई शुरू होने के बजाय शिकायत और सूचना मिलते ही कार्रवाई शुरू हो। सरकार का लक्ष्य यह होना चाहिए कि कोई घटना वायरल होने का इंतजार न करे। किसी पीड़ित को अपनी पीड़ा साबित करने के लिए इंटरनेट की जरूरत न पड़े। किसी महिला को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए कैमरे के सामने आने की मजबूरी न हो। किसी बच्चे को न्याय पाने के लिए भीड़ की अदालत का सहारा न लेना पड़े।

कुछ समय पहले नागरिक सुरक्षा को लेकर दिए गए कड़े शब्दों ने जनता के बीच एक अपेक्षा पैदा की थी। अब जमुई जैसी घटना उस अपेक्षा की वास्तविक परीक्षा है। यह परीक्षा केवल मुख्यमंत्री या सरकार की नहीं है। यह पुलिस प्रशासन की भी है, राजनीतिक व्यवस्था की भी है, समाज की भी है और हम सबकी भी है। यदि सरकार अपने दावों को जमीन पर उतारती है, तो उसका सबसे बड़ा प्रमाण किसी भाषण में नहीं है, बल्कि उस महिला, उस बच्चे और उस कमजोर नागरिक के चेहरे पर दिखाई देगा जिसे यह भरोसा होगा कि उसके साथ अन्याय होने पर व्यवस्था उसके साथ खड़ी होगी। सरकार को यह साबित करना होगा कि अपराधी का दुस्साहस कानून की ताकत से बड़ा नहीं है और समाज को यह साबित करना होगा कि किसी कमजोर की बेइज्जती मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना पर हमला है।

सरकार की असली हनक किसी मंच से बोले गए कठोर शब्दों में नहीं होती है। उसकी हनक तब दिखाई देती है जब अपराधी अपराध करने से पहले कानून के बारे में सोचता है, जब पीड़ित बिना भय के थाने पहुंचता है, जब पुलिस बिना दबाव के कार्रवाई करती है और जब अदालत के सामने मामला मजबूत साक्ष्यों के साथ पहुंचता है। इंसानियत का पहला धर्म कमजोर की रक्षा करना है। शासन का पहला धर्म नागरिक की सुरक्षा है। कानून का पहला उद्देश्य न्याय है। और सभ्य समाज की पहली पहचान यह है कि वहां किसी महिला, बच्चे या कमजोर व्यक्ति की गरिमा को कुचलने की अनुमति नहीं होती। जमुई की घटना को इसलिए केवल एक अपराध की खबर बनकर समाप्त नहीं होना चाहिए। इसे व्यवस्था के लिए चेतावनी, समाज के लिए आत्ममंथन और सरकार के लिए अपनी घोषणाओं को धरातल पर साबित करने का अवसर बनना चाहिए।  उम्मीद यही होनी चाहिए कि सुरक्षा को लेकर कुछ समय पूर्व बोले गए कड़े शब्द केवल राजनीतिक हवाबाजी साबित न हों। वे जमुई जैसी घटनाओं से सीख लेकर ऐसी ठोस व्यवस्था में बदलें, जहां अपराधी के मन में अपराध की सोच पैदा होने से पहले ही कानून का भय पैदा हो जाए। क्योंकि आखिरकार किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि अपराध होने के बाद उसने कितनी बड़ी कार्रवाई की, बल्कि यह है कि उसके शासन में आम नागरिक को अपराध होने से पहले ही सुरक्षा का भरोसा कितना मजबूत मिला। कमजोर की रक्षा हो, पीड़ित की गरिमा बचे, अपराधी को कानून का भय हो और सरकार का दावा जमीन पर दिखाई दे, यही सुशासन की वास्तविक कसौटी है।
            -------------

0 Response to "सरकार की हनक का इम्तिहान होता है - जब कमजोर की गरिमा खतरे में होता है"

एक टिप्पणी भेजें

Ads on article

Advertise in articles 1

advertising articles 2

Advertise under the article