राजनीतिक वार हो - बिहार की अस्मिता पर प्रहार नहीं

राजनीतिक वार हो - बिहार की अस्मिता पर प्रहार नहीं

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 24 सितम्बर ::

राजनीति में विरोधियों के निर्णय, नीतियों, कार्यशैली और शासन के तौर-तरीकों पर सवाल उठाना लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी नेता, सरकार या राजनीतिक दल आलोचना से ऊपर नहीं हो सकता है। जनता के सामने किए गए वादों, लिए गए फैसलों और उनके परिणामों पर सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार भी है और लोकतंत्र की आवश्यकता भी। लेकिन राजनीतिक आलोचना और क्षेत्रीय अस्मिता को निशाना बनाने के बीच एक महीन रेखा होती है। जब किसी नेता की राजनीतिक नीति पर हमला करते-करते उसके प्रदेश, वहां की पहचान, भाषा, संस्कृति या आम लोगों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है, तब बात केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहती है। तब वह सार्वजनिक विमर्श की मर्यादा, क्षेत्रीय सम्मान और सामाजिक संवेदनशीलता का प्रश्न बन जाती है। बिहार इस संदर्भ में लंबे समय से एक आसान राजनीतिक निशाना बनता रहा है। बिहार की प्रशासनिक कमियों, बेरोजगारी, पलायन, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य और औद्योगिक पिछड़ेपन पर सवाल उठाना पूरी तरह जायज है। लेकिन इन समस्याओं को आधार बनाकर बिहार और बिहारियों के बारे में सामान्यीकृत या अपमानजनक धारणा बनाना न तो तथ्यपरक है और न ही लोकतांत्रिक बहस की स्वस्थ परंपरा।

किसी भी राज्य की सरकार ने यदि कोई गलत नीति अपनाई है तो उस पर सवाल होना चाहिए। बिहार में कानून-व्यवस्था की समस्या है तो चर्चा होनी चाहिए। रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं हैं तो सरकार से जवाब मांगा जाना चाहिए। उद्योगों की कमी है तो निवेश और औद्योगिक नीति पर बहस होनी चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में कमियां हैं तो आंकड़ों के आधार पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन इनमें से किसी भी समस्या का समाधान बिहार के आम नागरिक को कटघरे में खड़ा करने से नहीं निकलता है। बिहार की राजनीतिक व्यवस्था और बिहार के समाज में अंतर समझना आवश्यक है। सरकारें आती-जाती हैं, मुख्यमंत्री बदलते हैं, दल सत्ता में आते और जाते हैं, नीतियां बदलती हैं, लेकिन बिहार की पहचान इन राजनीतिक परिवर्तनों से कहीं बड़ी है। एक प्रदेश को उसकी सरकार से अलग करके देखने की राजनीतिक परिपक्वता आवश्यक है। यदि किसी सरकार की नीतियां असफल है तो उसके लिए सरकार जिम्मेदार है। यदि किसी नेता का निर्णय गलत है तो उस नेता से सवाल होना चाहिए। लेकिन किसी नेता की गलती का भार उस प्रदेश के करोड़ों नागरिकों पर डाल देना तर्कसंगत नहीं हो सकता है।

हाल के राजनीतिक विवादों में तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से जुड़े बयान को लेकर बिहार में जिस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली है, उसने एक पुराने प्रश्न को फिर सामने ला दिया है कि क्या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में क्षेत्रीय पहचान को भी निशाना बनाया जाना चाहिए? रेवंत रेड्डी का नाम इस तरह के विवादों में पहली बार सामने नहीं आया है। उनके बयानों को लेकर पहले भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विवाद हुए हैं। ऐसे मामलों में किसी बयान की आलोचना उसके वास्तविक शब्दों, संदर्भ और राजनीतिक परिस्थिति के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या किसी नेता की राजनीतिक आलोचना करते हुए पूरे प्रदेश को उसके साथ जोड़ देना उचित है? यदि किसी राजनीतिक नेता की कार्यशैली पर आपत्ति है तो उस पर चर्चा कीजिए। यदि उनकी सरकार की नीति गलत लगती है तो उसके आंकड़े सामने रखिए। यदि उनके किसी बयान से असहमति है तो तथ्य और तर्क के साथ जवाब दीजिए। लोकतंत्र में यही स्वस्थ राजनीतिक संघर्ष है।

बिहार की अस्मिता पर राजनीतिक टिप्पणी का इतिहास केवल किसी एक दल, राज्य या नेता तक सीमित नहीं रहा है। अलग-अलग समय में देश के विभिन्न राजनीतिक नेताओं के बयान बिहार और बिहारियों को लेकर विवादों का कारण बनते रहे हैं। बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे तक, करुणानिधि से लेकर पंजाब के नेताओं तक, दक्षिण भारत के कुछ नेताओं से लेकर उत्तर भारत के विभिन्न राजनीतिक चेहरों तक, समय-समय पर बिहारियों के बारे में कही गई टिप्पणियों ने राजनीतिक विवाद पैदा किए हैं। राहुल गांधी से जुड़े पुराने बयानों को लेकर भी बिहार में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं होती रही है। इसी तरह चन्नी, मारन, सुप्रिया, स्टालिन, गोयल, नाइक सहित अलग-अलग राजनीतिक व्यक्तियों के बयानों या राजनीतिक रुख को लेकर भी बिहार और बिहारियों की पहचान पर बहस हुई है। यहां किसी व्यक्ति के बयान को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करने के बजाय उसके मूल संदर्भ और वास्तविक शब्दों को देखना जरूरी है। लोकतांत्रिक बहस का स्तर तभी ऊंचा रहेगा जब राजनीतिक असहमति तथ्यों के आधार पर हो, न कि सामूहिक पहचान पर टिप्पणी के आधार पर।

बिहार की चर्चा में एक विडंबना यह भी है कि कभी-कभी बिहार के ही कुछ राजनीतिक नेता या सार्वजनिक चेहरे राज्य की कमियों को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि आलोचना और आत्महीनता के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। बिहार की समस्याओं को छिपाना भी गलत है और उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बिहार की सामूहिक छवि बनाना भी। यदि बिहार में बेरोजगारी है तो उसका समाधान खोजिए। यदि पलायन है तो रोजगार के अवसर पैदा कीजिए। यदि शिक्षा में कमी है तो विद्यालय और विश्वविद्यालय मजबूत कीजिए। यदि उद्योग नहीं हैं तो निवेश का वातावरण तैयार कीजिए। यदि प्रशासनिक व्यवस्था कमजोर है तो उसमें सुधार कीजिए। लेकिन बिहार की समस्या का समाधान बिहार को ही समस्या बताने में नहीं है। अपने घर की कमियों को स्वीकार करना आत्महीनता नहीं है, बल्कि सुधार की पहली सीढ़ी है। मगर अपने ही घर की हर कमी को इस तरह प्रस्तुत करना कि बाहर वाला पूरे घर को ही निकृष्ट समझने लगे, यह आत्ममंथन नहीं कहा जा सकता है।

बिहार की पहचान केवल गरीबी, पलायन या बेरोजगारी के आंकड़ों से तय नहीं होती है। यह वह भूभाग है जिसने भारतीय इतिहास, दर्शन, राजनीति, शिक्षा और आध्यात्मिक परंपरा को गहराई से प्रभावित किया है। वैशाली की लोकतांत्रिक परंपरा, पाटलिपुत्र का राजनीतिक इतिहास, नालंदा और विक्रमशिला की ज्ञान परंपरा, बोधगया की आध्यात्मिक विरासत, राजगीर की ऐतिहासिक स्मृतियां, चंपारण का सत्याग्रह, ये सभी बिहार की पहचान का हिस्सा है। बिहार के लोगों ने देश के हर हिस्से में जाकर अपनी मेहनत से जीवन बनाया है। मुंबई हो या दिल्ली, पंजाब हो या गुजरात, दक्षिण भारत के औद्योगिक शहर हों या देश के महानगर—बिहारी श्रमिक, इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी, कारोबारी, विद्यार्थी और पेशेवर विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देते रहे हैं। इसलिए किसी राज्य की वर्तमान प्रशासनिक कमजोरी को उसके नागरिकों की योग्यता का प्रमाण मान लेना तथ्य और तर्क दोनों की दृष्टि से अनुचित है।

बिहार से बड़े पैमाने पर पलायन एक वास्तविक सामाजिक-आर्थिक चुनौती है। इस पर गंभीर बहस होनी चाहिए। लेकिन प्रवासी बिहारी को केवल मजबूरी का प्रतीक मानना भी अधूरा दृष्टिकोण है। जो व्यक्ति अपने गांव या शहर से हजारों किलोमीटर दूर जाकर काम करता है, वह केवल बिहार की समस्या का हिस्सा नहीं है; वह देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाला नागरिक भी है। बिहार को ऐसे अवसर चाहिए कि उसका युवा रोजगार के लिए मजबूर होकर बाहर न जाए। लेकिन जो बिहारी देश के दूसरे हिस्सों में काम कर रहा है, उसके श्रम और योगदान का सम्मान भी उतना ही जरूरी है।

राजनीति में शब्द केवल शब्द नहीं होते हैं। एक नेता का बयान हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचता है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में भाषा की जिम्मेदारी सामान्य नागरिक की तुलना में अधिक होती है। नेता के शब्द समर्थकों के लिए नारा और विरोधियों के लिए हथियार बन सकते हैं। यही कारण है कि राजनीतिक संवाद में संयम लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। किसी नेता को कठघरे में खड़ा करना हो तो उसके फैसले सामने रखिए। उसके चुनावी वादे सामने रखिए। उसके शासन के आंकड़े सामने रखिए। उसके बयान का तथ्यात्मक खंडन कीजिए। इससे लोकतांत्रिक बहस मजबूत होगी। लेकिन यदि बहस में पूरा प्रदेश और उसकी जनता खींच ली गई तो मुद्दा पीछे छूट जाता है और पहचान की राजनीति आगे आ जाती है।

बिहार के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। रोजगार, उद्योग, शहरीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बाढ़, आधारभूत संरचना और प्रशासनिक क्षमता, हर क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता है। लेकिन इन समस्याओं को राजनीतिक उपहास का विषय बनाने के बजाय राष्ट्रीय विकास के एजेंडे का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। यदि देश को विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ना है तो बिहार जैसे बड़े और युवा राज्य की आर्थिक क्षमता को मजबूत करना होगा। बिहार को केवल श्रमिक देने वाला राज्य नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाला राज्य बनाना होगा। इसके लिए राजनीति को भी बिहार की समस्याओं पर गंभीर बहस करनी होगी। कौन-सी सरकार क्या कर रही है, किस नीति का क्या परिणाम निकला, निवेश क्यों नहीं आया, रोजगार क्यों नहीं बढ़ा, इन सवालों पर चुनाव और संसद से लेकर विधानसभा तक चर्चा होनी चाहिए।

राजनीतिक दलों की सरकारें पांच वर्ष के लिए आती हैं। नेता चुनाव हारते-जीतते हैं। गठबंधन बदलते हैं। विचारधाराओं का प्रभाव बढ़ता-घटता है। लेकिन प्रदेश की पहचान पीढ़ियों से बनती है। आज जो दल सत्ता में है, वह कल विपक्ष में हो सकता है। आज जो नेता लोकप्रिय है, वह कल राजनीतिक परिदृश्य से बाहर हो सकता है। लेकिन बिहार रहेगा, बिहार की संस्कृति रहेगी और बिहार के करोड़ों लोग अपनी पहचान के साथ खड़े रहेंगे। इसलिए बिहार की अस्मिता को किसी दल या नेता की राजनीतिक संपत्ति समझना भूल होगी। बिहार भाजपा का नहीं है, जदयू का नहीं है, राजद का नहीं है, कांग्रेस का नहीं है और किसी एक नेता का भी नहीं है। बिहार बिहारियों का है और उससे भी व्यापक अर्थ में भारत का अभिन्न हिस्सा है।

राजनीतिक आलोचना लोकतंत्र को मजबूत करती है। सवाल सत्ता को जवाबदेह बनाते हैं। विरोध नीतियों को बेहतर बनाने का अवसर देता है। लेकिन आलोचना तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति के राजनीतिक निर्णय पर केंद्रित हो, उसकी क्षेत्रीय पहचान को अपमानित करने पर नहीं। बिहार को भी अपने भीतर झांकना होगा। राजनीतिक नेतृत्व को अपनी कमियों का जवाब देना होगा। जनता को भी सरकारों से सवाल पूछने होंगे। लेकिन इसके साथ बिहारियों को अपने आत्मसम्मान की रक्षा भी करनी होगी। बिहार की नीतियों पर सवाल कीजिए। बिहार की सरकारों से जवाब मांगिए। बिहार के नेताओं की आलोचना कीजिए। बिहार की व्यवस्था में सुधार की मांग कीजिए। लेकिन बिहार और बिहारियों को ही समस्या बताने की राजनीति से बचिए। क्योंकि सरकार की आलोचना लोकतंत्र है, लेकिन पूरे प्रदेश की पहचान को कटघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक बहस को संकीर्ण बनाता है।

राजनीति में विरोधी बदले जा सकते हैं, सरकारें बदली जा सकती हैं, नीतियां बदली जा सकती हैं और सत्ता का समीकरण भी बदल सकता है। मगर किसी प्रदेश की अस्मिता कोई अस्थायी राजनीतिक पद नहीं है, जिसे चुनावी सुविधा के अनुसार स्वीकार या अस्वीकार किया जाए। इसलिए राजनीतिक संघर्ष अपनी जगह हो, लेकिन बिहार की अस्मिता अपनी जगह। यही मर्यादा बिहार के नेताओं पर भी लागू होती है और बिहार के बाहर के नेताओं पर भी। जो बात हम अपने प्रदेश के लिए सम्मानजनक मानते हैं, वही सम्मान हमें दूसरे प्रदेशों के लिए भी रखना चाहिए। क्योंकि भारत की शक्ति उसकी विविधता में है और किसी एक प्रदेश का अपमान अंततः उस भारतीय विविधता को ही कमजोर करता है।
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