आरक्षण की राजनीति - सामाजिक न्याय की लड़ाई या सियासी नूराकुश्ती?

आरक्षण की राजनीति - सामाजिक न्याय की लड़ाई या सियासी नूराकुश्ती?

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 03 सितम्बर ::

भारतीय लोकतंत्र में आरक्षण केवल एक संवैधानिक प्रावधान नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक शक्ति के बीच चलने वाली एक लंबी बहस का केंद्र रहा है। संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत मिले आरक्षण की व्यवस्था संविधान लागू होने के बाद से लगातार चर्चा में रही है। लेकिन इस चर्चा का बड़ा हिस्सा अक्सर वास्तविक सामाजिक न्याय से अधिक राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है। आरक्षण के सवाल पर आंदोलन हुए, सरकारें बदली, राजनीतिक समीकरण बने और बिगड़े तथा विभिन्न सामाजिक समूहों ने अपने हिस्से की राजनीतिक और सामाजिक हिस्सेदारी के लिए सड़कों पर संघर्ष किया। आरक्षण की इस यात्रा को समझने के लिए हमें संविधान लागू होने से बहुत पहले के भारत में लौटना होगा। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की मांग धीरे-धीरे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनने लगी थी। 1882 में गठित हंटर आयोग के सामने ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारकों ने शिक्षा और सामाजिक अवसरों में वंचित वर्गों की हिस्सेदारी का प्रश्न उठाया। यही वह दौर था, जब सामाजिक बराबरी की लड़ाई ने संस्थागत स्वरूप लेना शुरू किया।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का सबसे बड़ा माध्यम माना। उन्होंने उन वर्गों के लिए शिक्षा की वकालत की जिन्हें सदियों से उससे दूर रखा गया था। दक्षिण भारत में पेरियार ने सामाजिक समानता और जातिगत वर्चस्व के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। साहूजी महाराज ने अपने शासन में पिछड़े वर्गों के लिए अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। इन प्रयासों की परिणति डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में एक व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण के रूप में सामने आई। आंबेडकर के लिए आरक्षण किसी वर्ग को स्थायी विशेषाधिकार देना नहीं था, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समाज को समान अवसर उपलब्ध कराने का एक माध्यम था। उनका मूल प्रश्न था, यदि सदियों से सामाजिक व्यवस्था ने किसी वर्ग को अवसरों से वंचित रखा है तो केवल कागज पर समानता घोषित कर देने से वास्तविक समानता कैसे स्थापित होगी? यही विचार संविधान में सामाजिक न्याय की व्यापक अवधारणा का आधार बना।

1932 का पूना पैक्ट आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए समझौते ने अनुसूचित जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल को नई दिशा दी। पूना पैक्ट को केवल गांधी और आंबेडकर के बीच मतभेद के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके केंद्र में यह सवाल था कि वंचित समाज को राजनीतिक शक्ति और प्रतिनिधित्व किस प्रकार दिया जाए। यही प्रश्न आगे चलकर स्वतंत्र भारत में आरक्षण व्यवस्था के व्यापक विमर्श का हिस्सा बना। 1950 में संविधान लागू हुआ और समानता के साथ-साथ सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति-जनजातियों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए। इसके बाद आरक्षण संविधान, न्यायपालिका और राजनीति, तीनों के बीच लगातार बहस का विषय बना रहा।

आरक्षण का इतिहास केवल संसद और अदालतों का इतिहास नहीं है। यह सड़कों पर हुए आंदोलनों का भी इतिहास है। गुजरात में आरक्षण विरोधी आंदोलनों से लेकर मंडल आयोग के बाद देशव्यापी उथल-पुथल तक, आरक्षण ने भारतीय समाज की अंतर्विरोधी संरचना को कई बार सामने ला दिया। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के फैसले ने भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का निर्णय सामाजिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से ऐतिहासिक था, लेकिन इसके खिलाफ व्यापक विरोध भी हुआ। छात्र आंदोलनों से लेकर राजनीतिक संघर्ष तक, देश ने आरक्षण के प्रश्न को लेकर तीखा दौर देखा। मंडल के बाद भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय की राजनीति मजबूत हुई। कई राजनीतिक दलों का सामाजिक आधार ही पिछड़े, दलित और वंचित समूहों की राजनीतिक लामबंदी पर खड़ा हुआ। यहां से आरक्षण केवल प्रशासनिक नीति नहीं रहा, बल्कि चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण औजार भी बन गया।

आरक्षण की राजनीति का सबसे दिलचस्प पक्ष यह है कि समय के साथ इसका स्वरूप बदलता गया। कभी आरक्षण के खिलाफ आंदोलन करने वाले समूह बाद में स्वयं आरक्षण की मांग लेकर सामने आए। 2006 में ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ जैसे आंदोलनों ने आरक्षण व्यवस्था की आलोचना करते हुए मेरिट और समान अवसर का सवाल उठाया। दूसरी ओर पाटीदार, जाट, मराठा और गुर्जर जैसे प्रभावशाली सामाजिक समूहों ने अलग-अलग समय में आरक्षण की मांग को लेकर बड़े आंदोलन किए। यह बदलाव बताता है कि आरक्षण का प्रश्न केवल सामाजिक पिछड़ेपन तक सीमित नहीं है। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या, शिक्षा में प्रतिस्पर्धा, आर्थिक अवसरों की कमी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आकांक्षा ने इसे और जटिल बना दिया है। आज स्थिति यह है कि समाज का कोई भी बड़ा समूह स्वयं को अवसरों की दौड़ में पीछे महसूस करता है तो उसकी पहली राजनीतिक मांगों में आरक्षण प्रमुखता से सामने आता है।

वर्तमान विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ‘आरक्षण के भीतर न्याय’ का प्रश्न है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग कोई एकरूप सामाजिक समूह नहीं हैं। इन वर्गों के भीतर भी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में भारी अंतर है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आरक्षण का लाभ क्या सभी उपवर्गों तक समान रूप से पहुंच रहा है? क्या अपेक्षाकृत मजबूत समूह लगातार इसका अधिक लाभ उठा रहे हैं और सबसे कमजोर तबके पीछे छूट रहे हैं? यहीं से ‘क्रीमी लेयर’, उप-वर्गीकरण और लाभ के समान वितरण जैसे प्रश्न सामने आते हैं। यदि आरक्षण का उद्देश्य सबसे वंचित व्यक्ति को आगे लाना है तो यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि व्यवस्था का लाभ वास्तव में उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसके लिए इसकी आवश्यकता सबसे अधिक है। लेकिन यही सवाल राजनीति के लिए भी सबसे संवेदनशील है, क्योंकि किसी एक समूह के हिस्से में बदलाव दूसरे समूह की राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है।

आज आरक्षण का प्रश्न एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के दो बिहारी मंत्री इस मुद्दे पर आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। बयानबाजी इतनी तीखी हो चुकी है कि मामला एक-दूसरे से इस्तीफा मांगने तक पहुंच गया है। यह स्थिति सामान्य राजनीतिक मतभेद से आगे जाती दिखाई देती है। दोनों नेताओं का अपना-अपना सामाजिक आधार है और दोनों के लिए आरक्षण का मुद्दा केवल नीतिगत प्रश्न नहीं है, बल्कि राजनीतिक पहचान और सामाजिक प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि इन बयानों को केवल व्यक्तिगत विवाद मान लेना शायद राजनीतिक तस्वीर को अधूरा देखना होगा। इसके पीछे अपने-अपने सामाजिक आधार को साधने, दलित राजनीति में प्रभाव बढ़ाने और आने वाले राजनीतिक संघर्षों के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश भी हो सकती है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में आरक्षण के भीतर न्याय की लड़ाई है? या फिर यह एनडीए के भीतर चल रही ऐसी सियासी नूराकुश्ती है जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने सामाजिक वोट बैंक को संदेश देना चाहते हैं?

राजनीति में मुद्दे केवल मुद्दे नहीं रहते। वे संदेश बन जाते हैं। आरक्षण का मुद्दा भी यही करता है। एक नेता जब आरक्षण के किसी पहलू पर आवाज उठाता है तो उसका संदेश केवल संसद या सरकार तक नहीं जाता है। वह संदेश गांवों, जातीय संगठनों और सामाजिक समूहों तक पहुंचता है। इसी तरह दूसरा नेता जब उसका विरोध करता है तो वह भी अपने सामाजिक आधार को एक अलग संदेश देता है। इसलिए वर्तमान विवाद को केवल ‘कौन सही और कौन गलत’ के प्रश्न में बांधना आसान है, लेकिन वास्तविक राजनीति उससे कहीं अधिक जटिल है। संभव है दोनों नेता अपने-अपने तरीके से सामाजिक न्याय की बात कर रहे हो। यह भी संभव है कि दोनों अपने राजनीतिक भविष्य और सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हों। राजनीति में दोनों बातें एक साथ भी सच हो सकती हैं।

पहली नजर में लगता है कि गठबंधन के दो वरिष्ठ नेताओं का सार्वजनिक रूप से भिड़ना एनडीए के लिए नुकसानदेह हो सकता है। विपक्ष को सरकार के खिलाफ हमला करने का मौका मिलता है और गठबंधन के भीतर मतभेद का संदेश जाता है। लेकिन राजनीति में हर सार्वजनिक टकराव नुकसान का कारण नहीं होता है। कई बार नियंत्रित असहमति गठबंधन के भीतर विभिन्न सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व का एहसास कराती है। यदि एक नेता एक सामाजिक वर्ग की चिंता सामने रखता है और दूसरा दूसरे वर्ग की, तो दोनों अपने-अपने आधार को यह संदेश दे सकते हैं कि उनकी आवाज सत्ता के भीतर मौजूद है। ऐसी स्थिति में अंतिम परिणाम नुकसान के बजाय राजनीतिक लाभ भी हो सकता है। विशेषकर बिहार जैसे सामाजिक रूप से अत्यंत विविध राज्य में जातीय और सामाजिक समीकरण चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए आरक्षण को लेकर होने वाली हर बड़ी राजनीतिक बयानबाजी का चुनावी प्रभाव भी स्वाभाविक रूप से देखा जाएगा।

विपक्ष के सामने इस विवाद को सरकार की विफलता के रूप में पेश करने का अवसर है। वह कह सकता है कि सत्ता पक्ष के भीतर ही आरक्षण के सवाल पर एकराय नहीं है। लेकिन विपक्ष के लिए भी यह मुद्दा उतना सरल नहीं है। आरक्षण पर किसी एक वर्ग के पक्ष में बहुत आगे जाने पर दूसरा वर्ग नाराज हो सकता है। इसलिए विपक्ष को भी शब्दों का चयन बहुत सावधानी से करना होगा। आरक्षण का मुद्दा अब केवल ‘आरक्षण समर्थक बनाम आरक्षण विरोधी’ की पुरानी बहस नहीं रह गया है। आज बहस का बड़ा हिस्सा है ‘किसे कितना लाभ’, ‘किस वर्ग को कितना प्रतिनिधित्व’ और ‘आरक्षण के भीतर किसका हिस्सा कितना’ जैसे सवालों पर केंद्रित है।

पिछले कई दशकों में सरकारें बदली, राजनीतिक दल बदले और चुनावी नारों का स्वरूप बदला, लेकिन आरक्षण का मूल सवाल आज भी कायम है, ऐतिहासिक वंचना को वास्तविक अवसर में कैसे बदला जाए? आरक्षण को अनंतकाल तक चलने वाली व्यवस्था के रूप में देखने के बजाय इसे सामाजिक न्याय के लक्ष्य से जोड़कर देखना आवश्यक है। जब तक शिक्षा, रोजगार, आर्थिक अवसर और सामाजिक सम्मान में वास्तविक समानता स्थापित नहीं होती, तब तक आरक्षण की आवश्यकता पर बहस समाप्त नहीं हो सकती। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि आरक्षण राजनीतिक हथियार न बने। किसी भी दल या नेता को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता का आधार है।

आज दो बिहारी केंद्रीय मंत्रियों के बीच आरक्षण को लेकर चल रहा विवाद अनेक सवाल खड़े करता है। क्या यह आरक्षण के भीतर वास्तविक न्याय की लड़ाई है? क्या यह सामाजिक प्रतिनिधित्व की गंभीर चिंता है? क्या यह एनडीए के भीतर अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की रणनीति है?मक्या यह दलित और पिछड़े वर्गों के बीच अपनी जगह बनाने की प्रतिस्पर्धा है? क्या यह आने वाले चुनावों के सामाजिक समीकरणों को साधने की कवायद है? या फिर यह ऐसी जुबानी नूराकुश्ती है जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों को राजनीतिक संदेश दे रहे हैं? इन सवालों के उत्तर अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि आरक्षण की राजनीति में सिद्धांत और चुनावी रणनीति अक्सर एक-दूसरे से अलग नहीं होते हैं। सामाजिक न्याय की भाषा के भीतर राजनीतिक गणित भी चलता है और राजनीतिक गणित के भीतर सामाजिक न्याय का सवाल भी मौजूद रहता है। इसलिए असली कसौटी बयान नहीं, परिणाम होना चाहिए। यदि इस विवाद से आरक्षण के लाभ का अधिक न्यायपूर्ण वितरण, वंचितों की वास्तविक हिस्सेदारी, शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसर तथा सामाजिक प्रतिनिधित्व मजबूत होता है तो इसे सार्थक राजनीतिक संघर्ष कहा जा सकता है।

लेकिन यदि कुछ दिनों की बयानबाजी, इस्तीफे की मांग और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बाद सब कुछ वहीं लौट जाता है, तो फिर यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि सामाजिक न्याय केवल सियासी मंच का एक और हथियार बन गया। आरक्षण का सवाल बहुत गंभीर है। इसे न तो केवल वोट बैंक की नजर से देखा जा सकता है और न केवल मेरिट की संकीर्ण परिभाषा में बांधा जा सकता है। असली मुद्दा है, जिसे इतिहास ने पीछे छोड़ा है, उसे आगे आने का वास्तविक अवसर मिले। बाकी राजनीति है और राजनीति में सवाल अनेक होते हैं, जवाब अक्सर सबको पहले से पता होता है।
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