सर्वे के बाद पश्चिम बंगाल में 252 मदरसे हुए बंद, 100 को जारी हुई नोटिस

सर्वे के बाद पश्चिम बंगाल में 252 मदरसे हुए बंद, 100 को जारी हुई नोटिस

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 14 सितम्बर ::

पश्चिम बंगाल में मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। राज्यभर में किए गए सर्वेक्षण के बाद सरकार ने ऐसे 252 मदरसों को बंद करने का आदेश दिया है, जिनके संचालन के लिए जरूरी मंजूरी नहीं थी अथवा वहां आवश्यक बुनियादी सुविधाओं का अभाव पाया गया। इसके अलावा 100 अन्य मदरसों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। सरकार के इस फैसले ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था, संस्थानों की मान्यता और विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। मदरसा शिक्षा मंत्री क्षुद्रिराम टुडू ने इस कार्रवाई की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य किसी धार्मिक या शैक्षणिक संस्था को केवल उसकी पहचान के आधार पर निशाना बनाना नहीं है, बल्कि शिक्षा संस्थानों के संचालन में आवश्यक नियमों और मानकों का पालन सुनिश्चित करना है। सर्वेक्षण के दौरान जिन संस्थानों में आवश्यक अनुमति, आधारभूत ढांचे अथवा निर्धारित शैक्षणिक सुविधाओं की कमी मिली, उनके विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई है।

किसी भी शिक्षा संस्थान की सबसे पहली जिम्मेदारी विद्यार्थियों को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का वातावरण उपलब्ध कराना है। इसके लिए भवन, पर्याप्त कक्ष, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, शिक्षकों की उपलब्धता, पंजीकरण और संबंधित विभागों की आवश्यक मंजूरी जैसे मानक महत्वपूर्ण होते हैं। पश्चिम बंगाल में किए गए सर्वेक्षण के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे मदरसों की पहचान हुई, जो निर्धारित व्यवस्थाओं के अनुरूप नहीं पाए गए। सरकार के अनुसार, 252 संस्थानों को बंद करने का आदेश इसी प्रक्रिया का परिणाम है। वहीं 100 संस्थानों को तत्काल बंद करने के बजाय उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर देते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। यह अंतर महत्वपूर्ण है। नोटिस मिलने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित सभी संस्थान निश्चित रूप से बंद कर दिए जाएंगे। उन्हें सरकार के सामने यह स्पष्ट करने का अवसर मिलेगा कि उनके यहां पाई गई कमियों की वास्तविक स्थिति क्या है और उन्हें दूर करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए है।

भारत में शिक्षा संस्थानों की विश्वसनीयता उनके निर्धारित नियमों और मानकों के पालन से जुड़ी होती है। चाहे संस्थान सामान्य विद्यालय हो, निजी स्कूल हो, कॉलेज हो या मदरसा, विद्यार्थियों के हित में कुछ न्यूनतम मानकों का पालन आवश्यक है। यदि कोई संस्था बिना आवश्यक अनुमति के संचालित हो रही है, तो इससे विद्यार्थियों के शैक्षणिक भविष्य पर सवाल खड़े हो सकते हैं। उन्हें मिलने वाली शिक्षा की मान्यता, आगे की पढ़ाई में प्रवेश और प्रमाणपत्रों की स्वीकार्यता जैसी समस्याएं सामने आ सकती है। इसीलिए सरकार का यह तर्क है कि शिक्षा संस्थानों का नियमित निरीक्षण और सत्यापन होना चाहिए। किसी संस्था का संचालन लंबे समय से हो रहा हो, इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि वह सभी निर्धारित मानकों को पूरा करती है।

मदरसे धार्मिक एवं पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ अनेक स्थानों पर आधुनिक विषयों की शिक्षा भी देते हैं। इनमें पढ़ने वाले विद्यार्थी भी उसी समाज और देश का हिस्सा हैं, जिनके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर भविष्य सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसे में मदरसों से जुड़े किसी भी प्रशासनिक निर्णय को धार्मिक चश्मे से देखने के बजाय विद्यार्थियों के हित, शिक्षा की गुणवत्ता और संस्थागत पारदर्शिता के नजरिए से देखना अधिक उपयोगी होगा। यदि किसी मदरसे में आवश्यक सुविधाएं नहीं हैं, तो वहां पढ़ने वाले बच्चों को उसका नुकसान नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, यदि कोई संस्था नियमों का पालन कर रही है और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करा रही है, तो केवल उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर उसके खिलाफ कार्रवाई भी उचित नहीं मानी जा सकती। यही संतुलन सरकार की कार्रवाई की विश्वसनीयता का आधार बनेगा।

सरकार के फैसले में दो अलग-अलग स्तर दिखाई देते हैं। एक ओर 252 मदरसों को बंद करने का आदेश दिया गया है, वहीं दूसरी ओर 100 संस्थानों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार ने सर्वेक्षण में सामने आई स्थितियों को अलग-अलग श्रेणियों में देखा है। जिन संस्थानों की स्थिति गंभीर रूप से नियमों के विपरीत पाई गई, उनके विरुद्ध बंद करने का निर्णय लिया गया। वहीं जिन संस्थानों के मामले में स्पष्टीकरण या सुधार की गुंजाइश है, उन्हें नोटिस देकर जवाब मांगा गया है। अब महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि इन 100 संस्थानों के जवाबों की जांच किस प्रकार की जाती है। यदि किसी संस्था ने वास्तविक कमियों को दूर करने की क्षमता और इच्छा दिखाई, तो क्या उसे सुधार का अवसर मिलेगा? यदि किसी संस्था के पास आवश्यक दस्तावेज हैं, लेकिन सर्वेक्षण के दौरान वे उपलब्ध नहीं हो पाए, तो क्या उसका पुनः सत्यापन होगा? इन सवालों के जवाब आगे की प्रक्रिया से स्पष्ट होंगे।

किसी भी शिक्षा संस्था को बंद करने का सबसे संवेदनशील पक्ष वहां पढ़ने वाले विद्यार्थी होते हैं। संस्था बंद होने के बाद उन बच्चों की पढ़ाई कहां होगी, उनके शिक्षकों का क्या होगा और उन्हें वैकल्पिक विद्यालय या मदरसा कैसे उपलब्ध कराया जाएगा, इन सवालों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रशासनिक कार्रवाई का खामियाजा बच्चों को न भुगतना पड़े। यदि किसी मदरसे को बंद किया जाता है, तो वहां अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए वैकल्पिक शैक्षणिक व्यवस्था की स्पष्ट योजना होनी चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में सुधार का उद्देश्य विद्यार्थियों की पढ़ाई रोकना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर और सुरक्षित शिक्षा उपलब्ध कराना होना चाहिए।

आज शिक्षा का अर्थ केवल किताब और शिक्षक तक सीमित नहीं है। एक आधुनिक शिक्षण संस्थान में सुरक्षित भवन, प्रकाश और वेंटिलेशन, स्वच्छ पेयजल, छात्र-छात्राओं के लिए उचित शौचालय, बैठने की व्यवस्था और स्वास्थ्य-सुरक्षा जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं। ग्रामीण या आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में चलने वाले संस्थानों के सामने संसाधनों की कमी हो सकती है। लेकिन इसका समाधान यह नहीं है कि बच्चों को न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित रखा जाए। ऐसे संस्थानों को यदि सरकार या संबंधित विभाग से तकनीकी अथवा प्रशासनिक सहायता मिल सकती है, तो उसे उपलब्ध कराने पर भी विचार किया जाना चाहिए। नियमों का पालन आवश्यक है, लेकिन सुधार का रास्ता बंद कर देना हमेशा समाधान नहीं होता है।

पश्चिम बंगाल में मौजूदा कार्रवाई को केवल एक बार की प्रशासनिक कवायद तक सीमित रखने के बजाय सरकार को इसे व्यापक शिक्षा सुधार अभियान का हिस्सा बनाना चाहिए। राज्य में संचालित सभी प्रकार के शैक्षणिक संस्थानों का समय-समय पर सत्यापन हो। उनकी मान्यता, भवन, शिक्षकों, विद्यार्थियों की संख्या, पाठ्यक्रम और आधारभूत सुविधाओं की जानकारी डिजिटल रूप से दर्ज की जाए। इससे भविष्य में फर्जी या अनधिकृत संस्थानों की पहचान आसान होगी। साथ ही, जिन संस्थानों में छोटी-मोटी कमियां हैं, उन्हें निश्चित समय सीमा देकर उन्हें दूर करने का अवसर दिया जा सकता है। इससे प्रशासनिक कार्रवाई के साथ सुधार की प्रक्रिया भी आगे बढ़ेगी।

मदरसा शिक्षा को लेकर देश में लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि धार्मिक एवं पारंपरिक शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों को किस सीमा तक जोड़ा जाए। आज का विद्यार्थी केवल धार्मिक ज्ञान तक सीमित नहीं रह सकता। उसे गणित, विज्ञान, कंप्यूटर, भाषा, सामान्य ज्ञान और बदलती दुनिया के अनुरूप रोजगारपरक शिक्षा की भी आवश्यकता है। मदरसा शिक्षा में आधुनिक विषयों का समावेश विद्यार्थियों को मुख्यधारा के अवसरों से जोड़ने में मदद कर सकता है। इससे वे उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के क्षेत्र में बेहतर तरीके से आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए मदरसों के नियमन का उद्देश्य केवल यह देखना नहीं होना चाहिए कि संस्था के पास अनुमति है या नहीं। व्यापक दृष्टि से यह भी देखा जाना चाहिए कि वहां पढ़ने वाले बच्चों को 21वीं सदी के अनुरूप शिक्षा मिल रही है या नहीं।

252 मदरसों को बंद करने और 100 को नोटिस देने का फैसला निश्चित रूप से गंभीर है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे। किस संस्था में कौन-सी कमी पाई गई, किस नियम का उल्लंघन हुआ, किस आधार पर उसे बंद करने का आदेश दिया गया और संबंधित संस्था को अपना पक्ष रखने का कितना अवसर मिला—इन बिंदुओं की स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होने से भ्रम कम होगा। पारदर्शिता इसलिए भी जरूरी है क्योंकि शिक्षा और धार्मिक संस्थानों से जुड़े मामलों में भावनाएं जल्दी जुड़ जाती हैं। यदि सरकार तथ्यों और निर्धारित नियमों के आधार पर कार्रवाई करती है तथा वही मानक सभी संस्थानों पर लागू करती है, तो उसकी विश्वसनीयता मजबूत होगी।

इस पूरे मामले से एक बड़ा सिद्धांत भी सामने आता है वह है कानून और शिक्षा के मानक किसी संस्था की धार्मिक पहचान देखकर अलग नहीं होने चाहिए। जो नियम एक विद्यालय के लिए आवश्यक हैं, उनका उचित स्वरूप मदरसे पर भी लागू होना चाहिए। जो सुरक्षा मानक विद्यार्थियों के लिए जरूरी हैं, वे हर शिक्षण संस्थान में होने चाहिए। इसी समानता से शिक्षा व्यवस्था में विश्वास पैदा होता है। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि नियमों का उद्देश्य संस्थानों को परेशान करना नहीं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित करना है। जहां कमियां हैं, वहां सुधार कराया जाए और जहां गंभीर अनियमितता है, वहां कानून के अनुसार कठोर कदम उठाए जाएं।

पश्चिम बंगाल सरकार की मौजूदा कार्रवाई ने मदरसा शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है। 252 मदरसों को बंद करने का आदेश और 100 को कारण बताओ नोटिस महज प्रशासनिक आंकड़े नहीं हैं। इनके पीछे हजारों विद्यार्थियों, शिक्षकों और परिवारों का भविष्य जुड़ा हो सकता है। इसलिए आगे की प्रक्रिया में सरकार को तीन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, नियमों का समान अनुपालन, कार्रवाई में पारदर्शिता और विद्यार्थियों की शिक्षा की निरंतरता। यदि अनधिकृत संस्थानों पर कार्रवाई के साथ-साथ वैध संस्थानों को बेहतर बनाने, बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने और आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का अभियान भी चलाया जाता है, तो यह कदम व्यापक शिक्षा सुधार का आधार बन सकता है। अंततः किसी भी शिक्षण संस्था की सफलता उसकी इमारत या नाम से नहीं, बल्कि वहां पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य से तय होती है। मदरसा हो या सामान्य विद्यालय, शिक्षा का मूल उद्देश्य एक ही होना चाहिए, ज्ञान, संस्कार, कौशल और ऐसा भविष्य तैयार करना, जिसमें विद्यार्थी आत्मविश्वास के साथ देश और समाज के विकास में अपना योगदान दे सके। पश्चिम बंगाल में शुरू हुई यह प्रक्रिया तभी सार्थक मानी जाएगी, जब प्रशासनिक कार्रवाई के साथ शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के भविष्य को भी सर्वोच्च प्राथमिकता मिले।
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