11 सितंबर - एक ओर विवेकानंद का ‘विश्वबंधुत्व’, दूसरी ओर आतंकवाद का भयावह चेहरा
जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 11 सितम्बर ::
इतिहास की कुछ तारीखें केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं होती है। वे अपने भीतर पूरी सभ्यता के लिए संदेश, चेतावनी और आत्ममंथन का अवसर लेकर आती हैं। 11 सितंबर भी ऐसी ही एक तारीख है, जो मानवता के सामने दो बिल्कुल विपरीत तस्वीरें प्रस्तुत करती है। एक तस्वीर वर्ष 1893 की है, जब भारत के युवा संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका की धरती पर खड़े होकर दुनिया को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व का संदेश दिया। दूसरी तस्वीर वर्ष 2001 की है, जब उसी अमेरिका की धरती ने आतंकवाद की ऐसी भयावह त्रासदी देखी, जिसने पूरी दुनिया को हिला दिया। एक घटना मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, तो दूसरी मनुष्य के भीतर छिपी नफरत और विनाशकारी मानसिकता का भयावह परिणाम दिखाती है। एक ओर अध्यात्म, प्रेम, स्वीकार्यता और सहिष्णुता है, तो दूसरी ओर कट्टरता, हिंसा, घृणा और विनाश। इसलिए 11 सितंबर केवल इतिहास को याद करने की तारीख नहीं है, बल्कि यह पूछने का दिन भी है कि आखिर मानव सभ्यता किस रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती है?
11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ था। इसी मंच से स्वामी विवेकानंद ने भारत की सनातन आध्यात्मिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हुए दुनिया के सामने भारतीय चिंतन की उदारता को रखा। उनका संबोधन केवल एक धार्मिक भाषण नहीं था। उसमें मानवता को जोड़ने वाली वह दृष्टि थी, जो कहती है कि सत्य तक पहुंचने के रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन मनुष्य का अंतिम लक्ष्य शांति, सत्य और कल्याण होना चाहिए। उनके संबोधन की शुरुआत “अमेरिकावासी बहनों और भाइयों” जैसे आत्मीय संबोधन से हुई और यही संबोधन तत्कालीन श्रोताओं के मन को छू गया। स्वामी विवेकानंद की दृष्टि किसी एक समुदाय, संप्रदाय या देश तक सीमित नहीं थी। वह भारतीय दर्शन की उस परंपरा से निकली थी, जिसमें समूची पृथ्वी को परिवार के रूप में देखने का भाव मिलता है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का मूल यही है कि संसार विभाजन का नहीं, संबंध का विषय है। मनुष्य की पहचान केवल उसकी भाषा, पूजा-पद्धति, जाति, क्षेत्र या राष्ट्र से नहीं हो सकती। सबसे बड़ी पहचान उसकी मानवता है।
भारत की आध्यात्मिक परंपरा ने कभी यह नहीं कहा कि सत्य पर किसी एक व्यक्ति, समुदाय या विचार का एकाधिकार है। भारतीय चिंतन में विविधता को संघर्ष का कारण नहीं, बल्कि अस्तित्व की स्वाभाविक सुंदरता माना गया है। स्वामी विवेकानंद इसी विचार को लेकर दुनिया के सामने उपस्थित हुए थे। उनका संदेश था कि धार्मिक विविधता को लेकर संघर्ष करने के बजाय एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए। सहिष्णुता से आगे बढ़कर स्वीकार्यता का भाव पैदा होना चाहिए। सहिष्णुता का अर्थ कई बार यह होता है कि हम दूसरे को सहन कर रहे हैं। लेकिन स्वीकार्यता उससे कहीं आगे की अवस्था है, जहां हम दूसरे की भिन्नता का सम्मान करते हैं। यही वह विचार है जिसकी आज की दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता है।
ठीक 108 वर्ष बाद, 11 सितंबर 2001 को अमेरिका ने इतिहास की सबसे भयावह आतंकवादी घटनाओं में से एक का सामना किया। न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और वॉशिंगटन के पेंटागन पर हुए आतंकवादी हमलों ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। हजारों निर्दोष लोगों की जान गई। परिवार उजड़ गए। शहर की पहचान बदल गई और दुनिया की सुरक्षा तथा आतंकवाद के प्रति सोच भी हमेशा के लिए प्रभावित हुई। वह दिन केवल अमेरिका का दुख नहीं था। वह पूरी मानवता के लिए एक चेतावनी थी कि जब विचारधारा के नाम पर नफरत को बढ़ाया जाता है, जब कट्टरता को विवेक पर हावी होने दिया जाता है और जब निर्दोष मनुष्यों को दुश्मन मान लिया जाता है, तब उसका परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है। 11 सितंबर 2001 ने दुनिया को आतंकवाद का वह चेहरा दिखाया, जिसमें इंसान की जिन्दगी की कीमत विचारधारा से कम कर दी जाती है।
11 सितंबर की दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो इतिहास का एक गहरा संदेश सामने आता है। 1893 का 11 सितंबर कहता है कि मनुष्य को जोड़ो। 2001 का 11 सितंबर चेतावनी देता है कि नफरत को मत बढ़ने दो। एक तरफ स्वामी विवेकानंद का संदेश था कि विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के बीच संवाद और सम्मान होना चाहिए। दूसरी तरफ आतंकवादी हिंसा ने दिखाया कि कट्टरता और घृणा जब चरम पर पहुंचती है तो वह मानव जीवन को भी साधन समझने लगती है। एक घटना ने दुनिया को आध्यात्मिक शक्ति दिखाई। दूसरी घटना ने दुनिया को हिंसक मानसिकता की विनाशकारी शक्ति दिखाई। एक ने सभ्यता को ऊंचा उठाने का रास्ता बताया, दूसरी ने सभ्यता के सामने आत्मविनाश का खतरा खड़ा कर दिया।
दुनिया के इतिहास में युद्ध हुए, साम्राज्य बने और टूटे, सीमाएं बदली, राजनीतिक व्यवस्थाएं बदली। लेकिन हर युग ने अंततः यही साबित किया कि हिंसा स्थायी शांति नहीं दे सकती है। नफरत कुछ समय के लिए भीड़ को उन्माद दे सकती है, लेकिन समाज को स्थायी शांति नहीं दे सकती है। कट्टरता किसी व्यक्ति को अपने विचार में अडिग बना सकती है, लेकिन उससे मानवता मजबूत नहीं होती है। हिंसा डर पैदा कर सकती है, लेकिन सम्मान नहीं। आतंक लोगों को झुका सकता है, लेकिन दिल नहीं जीत सकता है। इसलिए किसी भी सभ्य समाज का अंतिम लक्ष्य केवल आर्थिक विकास या सैन्य शक्ति नहीं हो सकता। उसके साथ मानवीय चेतना का विकास भी जरूरी है।
आज दुनिया तकनीक के मामले में पहले से कहीं अधिक आगे है। मनुष्य अंतरिक्ष तक पहुंच चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता नई संभावनाएं खोल रही है। संचार ने महाद्वीपों की दूरियां कम कर दी है। लेकिन एक सवाल अभी भी खड़ा है कि क्या तकनीकी प्रगति के साथ हमारी मानवीय चेतना भी उतनी ही आगे बढ़ी है? यदि विज्ञान आगे बढ़ता जाए लेकिन मनुष्य के भीतर नफरत बढ़ती जाए, तो विकास अधूरा है। यदि संचार के साधन बढ़ जाएं लेकिन समाजों के बीच संवाद घट जाए, तो प्रगति अधूरी है। यदि हथियार आधुनिक होते जाएं लेकिन मनुष्य के भीतर शांति की इच्छा कमजोर होती जाए, तो सभ्यता खतरे में है। इसीलिए आज स्वामी विवेकानंद के संदेश को नए संदर्भ में समझने की जरूरत है। उनका संदेश केवल 1893 के शिकागो के लिए नहीं था। वह 21वीं सदी के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” को यदि केवल एक संस्कृत वाक्य या समारोहों में बोले जाने वाले शब्द के रूप में देखा जाए तो उसका वास्तविक अर्थ अधूरा रह जाएगा। यह वास्तव में जीवन-दृष्टि है। इसका अर्थ है कि दूसरे का सुख मेरे सुख से अलग नहीं है। दूसरे का दुख भी अंततः मानवता का दुख है। जब किसी दूसरे देश में निर्दोष लोग आतंकवाद का शिकार होते हैं, तो वह केवल उस देश की समस्या नहीं रह जाती है। जब किसी समाज में नफरत फैलती है, तो उसका असर सीमाओं के पार भी पहुंचता है। आज दुनिया इतनी जुड़ी हुई है कि किसी एक हिस्से की अस्थिरता दूसरे हिस्से को प्रभावित कर सकती है। इसलिए मानवता को अपने हित को व्यापक बनाना होगा। सबके कल्याण में अपना कल्याण देखने की दृष्टि ही भविष्य की वास्तविक सुरक्षा है।
धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना है। किसी भी आस्था को यदि मनुष्य के भीतर करुणा, संयम, सत्य और सेवा की भावना पैदा करनी चाहिए, तो उसका परिणाम हिंसा और घृणा कैसे हो सकता है? समस्या धर्म में नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर पैदा की जाने वाली कट्टर मानसिकता में है। जब धर्म आध्यात्मिक साधना से राजनीतिक या हिंसक हथियार बन जाता है, तब उसकी मूल आत्मा कमजोर पड़ जाती है। भारत की परंपरा ने सदियों से विविधताओं के साथ जीने की कला दिखाई है। यहां अनेक मत, पंथ, पूजा-पद्धतियां और विचारधाराएं साथ-साथ विकसित हुईं। इसलिए 11 सितंबर का संदेश हमें याद दिलाता है कि आस्था व्यक्ति को ऊंचा उठाए, दूसरे को नीचा दिखाने का हथियार न बने।
आतंकवाद के विरुद्ध सुरक्षा बलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कठोर कानून, खुफिया तंत्र, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सुरक्षा व्यवस्था जरूरी हैं। लेकिन आतंकवाद की जड़ें केवल हथियारों से समाप्त नहीं होती है। उसके पीछे पनपने वाली कट्टर मानसिकता, घृणा, असहिष्णुता, झूठे प्रचार और मानव-विरोधी विचारों का भी मुकाबला करना पड़ता है। यदि एक पीढ़ी को नफरत सिखाई जाएगी तो अगली पीढ़ी हिंसा की भाषा बोल सकती है। इसके विपरीत यदि बच्चों को विविधता का सम्मान, संवाद, संवेदना और मानवता सिखाई जाएगी तो समाज अधिक सुरक्षित होगा। इसलिए आतंकवाद के विरुद्ध सबसे लंबी लड़ाई मनुष्य के मन में लड़ी जाने वाली लड़ाई है।
इतिहास का उद्देश्य केवल तारीखें याद रखना नहीं है। इतिहास हमें यह बताता है कि मनुष्य ने क्या किया और उसके परिणाम क्या हुए। 11 सितंबर की दोनों घटनाएं हमें यही अवसर देती हैं। 1893 हमें बताता है कि एक व्यक्ति अपने शब्दों से पूरी दुनिया के मन में सम्मान पैदा कर सकता है। 2001 हमें बताता है कि कुछ लोगों की नफरत और हिंसा कितनी बड़ी मानवीय त्रासदी पैदा कर सकती है। एक तरफ शब्दों की शक्ति है। दूसरी तरफ बारूद की शक्ति। एक तरफ संवाद है। दूसरी तरफ विनाश। एक तरफ मनुष्य को परिवार मानने की दृष्टि है। दूसरी तरफ मनुष्य को शत्रु मानने की मानसिकता। अब चुनाव मानवता को करना है कि वह किस रास्ते पर आगे बढ़ेगी।
दुनिया को केवल सहिष्णुता नहीं, बल्कि पारस्परिक स्वीकार्यता की आवश्यकता है। हम अलग हो सकते हैं, लेकिन शत्रु होना आवश्यक नहीं है। हमारी पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती है, लेकिन मानवता एक हो सकती है। हमारी भाषाएं अलग हो सकती है, लेकिन भावनाएं समान हो सकती है। हमारे राष्ट्र अलग हो सकते हैं, लेकिन पृथ्वी साझा है। हमारे विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन संवाद का पुल बनाया जा सकता है। यही वह दृष्टि है जो 1893 के विवेकानंद को 2001 की त्रासदी के बाद और भी प्रासंगिक बना देती है।
11 सितंबर हमें इतिहास की दो तस्वीरें दिखाता है। पहली तस्वीर कहती है कि प्रेम करो, संवाद करो, विविधता का सम्मान करो और मानवता को परिवार समझो। वहीं दूसरी तस्वीर चेतावनी देती है कि नफरत को बढ़ने मत दो, कट्टरता को विवेक पर हावी मत होने दो और हिंसा को किसी भी उद्देश्य का साधन मत बनने दो। इन दोनों तस्वीरों के बीच ही आज की दुनिया का भविष्य छिपा है। मनुष्य के पास विज्ञान है, शक्ति है, संसाधन हैं और तकनीक है। अब उसे यह तय करना है कि इन शक्तियों का उपयोग निर्माण के लिए करेगा या विनाश के लिए। यदि हम स्वामी विवेकानंद के संदेश से प्रेरणा लेते हैं तो 11 सितंबर विश्वबंधुत्व, सहिष्णुता और शांति का प्रतीक बन सकता है और यदि हम 2001 की त्रासदी से सीख लेते हैं तो यह तारीख हमें हमेशा चेताती रहेगी कि नफरत की आग कभी केवल दूसरों को नहीं जलाती बल्कि अंततः वह पूरी मानवता को अपनी चपेट में ले सकती है। इसलिए 11 सितंबर को केवल दो ऐतिहासिक घटनाओं की तारीख के रूप में नहीं, बल्कि मानवता के आत्ममंथन के दिन के रूप में देखना चाहिए। एक रास्ता विवेकानंद का है- प्रेम, अध्यात्म, संवाद और विश्वबंधुत्व का। दूसरा रास्ता कट्टरता और हिंसा का है- नफरत, भय और विनाश का। इतिहास ने दोनों रास्ते हमारे सामने रख दिए हैं। अब फैसला हमारा है। क्योंकि इंसानियत का भविष्य नफरत से नहीं, आपसी सम्मान, स्वीकार्यता, करुणा और शांति से ही सुरक्षित रह सकता है और शायद यही 11 सितंबर की सबसे बड़ी सीख है।
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